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Srinagar: पांच साल की बच्ची को पिता से लेने पुलिस भेजी, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को लगाई फटकार

Sat, 22 Aug 2026 02:31 PM IST
Nikita Gupta अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर Published by: Nikita Gupta Updated Sat, 22 Aug 2026 02:31 PM IST
सार

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने पांच साल की बच्ची को पिता से लेने के लिए पुलिस भेजने और सर्च वारंट जारी करने पर श्रीनगर फैमिली कोर्ट के रवैये को कानूनी कमी और संवेदनहीनता बताया।

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J&K HC pulls up Family Court for sending police to recover five-year-old girl from father Srinagar
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पांच साल की बच्ची को उसके पिता से लेने के लिए पुलिस भेजने और सर्च वारंट जारी करने के मामले में श्रीनगर की फैमिली कोर्ट के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने इसे कानूनी कमी और संवेदनहीनता का मामला बताया।

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जस्टिस राहुल भारती की एकल पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत शादाब हुसैन मीर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी पिता के पास अपने बच्चे की कस्टडी होना अपने आप में किसी भी तरह से अवैध नहीं माना जा सकता।

समझौते में तय थी बच्ची की कस्टडी
याचिकाकर्ता और उसकी पत्नी ने आपसी समझौते के तहत विवाह समाप्त किया था। समझौते में नाबालिग बेटी की कस्टडी मां को दी गई थी, लेकिन यह भी तय था कि अगर मां दोबारा शादी करती है तो बच्ची की कस्टडी पिता को मिल जाएगी।

मां के दोबारा विवाह करने के बाद पिता बच्ची को अपने साथ ले आया। इसके बाद मां ने श्रीनगर की 4वीं अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत (फैमिली कोर्ट) का रुख किया। 29 जून 2026 को फैमिली कोर्ट ने चनापोरा थाना प्रभारी को सर्च वारंट लागू करने बच्ची को बरामद करने और उसे मां के पास वापस पहुंचाने का आदेश दिया।

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हाईकोर्ट ने कहा- पिता की कस्टडी को अवैध नहीं कह सकते
हाईकोर्ट ने कहा कि पिता 25 जनवरी 2025 को हुए लिखित समझौते के आधार पर बच्ची की देखभाल कर रहा था। समझौते में मां के दोबारा विवाह के बाद कस्टडी पिता को दिए जाने की शर्त स्पष्ट थी। मां के दोबारा विवाह के बाद पिता के पास बच्ची की कस्टडी को पहली नजर में गलत तरीके से हिरासत या अवैध कस्टडी नहीं कहा जा सकता।

बिना पिता का पक्ष सुने जारी हुआ वारंट
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की ओर से पिता का पक्ष सुने बिना एकतरफा सर्च वारंट जारी करने पर भी नाराजगी जताई। जस्टिस भारती ने कहा कि अदालत को मामले के सभी तथ्यों की पूरी तरह जांच करनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एक पिता के घर पुलिस भेजना न्यायिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। यदि बच्ची को सुरक्षित रूप से वापस लाने की जरूरत थी तो स्थानीय पुलिस थाने को सीधे भेजने के बजाय महिला पुलिस सेल या किसी अन्य संवेदनशील माध्यम की मदद ली जा सकती थी।

फैमिली कोर्ट के अधिकार पर भी उठाया सवाल
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस शक्ति पर भी सवाल उठाया जिसके तहत उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 100 के तहत सर्च वारंट जारी किया।

अदालत ने कहा कि बीएनएसएस की धारा 100 के तहत सर्च वारंट जारी करने की शक्ति जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के पास होती है। हाईकोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या फैमिली कोर्ट को फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत बीएनएसएस की धारा 100 के अधिकारों का इस्तेमाल करने का अधिकार है।

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