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सरला भट हत्याकांड : आरोपियों की ब्रेन मैपिंग व नार्को एनालिसिस से कोर्ट का इन्कार
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-एसआईए ने याचिका में दावा किया था कि संदिग्ध जांच में सहयोग नहीं कर रहे
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। 1990 के सरला भट हत्याकांड में श्रीनगर में एनआईए अधिनियम के तहत नामित अदालत ने राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) की याचिका खारिज कर दी है। एजेंसी ने संदिग्धों का नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और झूठ पकड़ने वाले टेस्ट कराने की अनुमति मांगी थी।
अदालत ने कहा, दशकों पुरानी जांच में रही कमियों को भरने के लिए पुलिस के कहने पर इस तरह दखल देने वाले तरीकों की अनुमति नहीं दे सकते। पुलिस थाना नगीन में दर्ज एफआईआर की जांच एसआईए कश्मीर कर रही है। एजेंसी ने दावा किया था कि संदिग्ध जांच में सहयोग नहीं कर रहे। सच सामने लाने, असल दोषियों की पहचान, हत्या का मकसद साबित करने और भौतिक सबूतों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है।
संदिग्धों ने विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह याचिका 35 से 36 साल बाद दायर की गई है। जांच में चूक की भरपाई के लिए उन्हें ऐसी प्रक्रिया से नहीं गुजारा जा सकता। उनमें से कई लोग बुजर्ग हो चुके हैं। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और तंत्रिका संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं। ऐसे में ये टेस्ट जोखिम भरे हो सकते हैं। यह जीवन व गरिमा के अधिकार और शारीरिक अखंडता के अधिकार का उल्लंघन कर सकते हैं।
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इस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का उद्दाहरण देते हुए कहा कि ऐसे टेस्ट संविधान के अनुच्छेद 20(3) और 21 के तहत प्राप्त सांविधानिक गारंटियों का उल्लंघन करेंगे। ऐसे तरीकों को जांच में एक सामान्य शॉर्टकट के तौर पर या संदिग्धों द्वारा कथित तौर पर सहयोग न करने की समस्या से निपटने के लिए अनुमति नहीं दी जा सकती।
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जांच की सुविधा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं
कोर्ट ने कहा, यह याचिका किसी ऐसे आरोपी की ओर से नहीं आई थी जो जांच के उचित कानूनी चरण पर स्वेच्छा से ऐसे टेस्ट करवाने के लिए तैयार हो, बल्कि यह याचिका स्वयं जांच एजेंसी ने दायर की थी। इसका मकसद उस जांच को फिर से शुरू करना या मजबूत करना था जो तीन दशकों से भी अधिक समय से किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। इतनी देर के बाद इन टेस्ट से मिलने वाले किसी भी सुराग को वेरिफाई करना या उसकी पुष्टि करना मुश्किल होगा। कोर्ट ने एसआईए की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि जांच की सुविधा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।
यह है मामला : अभियोजन के मुताबिक, सरला भट अनंतनाग की 27 साल की कश्मीरी पंडित नर्स थीं। इनकी पोस्टिंग श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में थी। अप्रैल 1990 में उन्हें पुलिस का मुखबिर होने के आरोप में हॉस्टल से अगवा कर लिया गया था। बाद में श्रीनगर में उनकी लाश मिली थी।
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। 1990 के सरला भट हत्याकांड में श्रीनगर में एनआईए अधिनियम के तहत नामित अदालत ने राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) की याचिका खारिज कर दी है। एजेंसी ने संदिग्धों का नार्को एनालिसिस, ब्रेन मैपिंग और झूठ पकड़ने वाले टेस्ट कराने की अनुमति मांगी थी।
अदालत ने कहा, दशकों पुरानी जांच में रही कमियों को भरने के लिए पुलिस के कहने पर इस तरह दखल देने वाले तरीकों की अनुमति नहीं दे सकते। पुलिस थाना नगीन में दर्ज एफआईआर की जांच एसआईए कश्मीर कर रही है। एजेंसी ने दावा किया था कि संदिग्ध जांच में सहयोग नहीं कर रहे। सच सामने लाने, असल दोषियों की पहचान, हत्या का मकसद साबित करने और भौतिक सबूतों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है।
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संदिग्धों ने विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह याचिका 35 से 36 साल बाद दायर की गई है। जांच में चूक की भरपाई के लिए उन्हें ऐसी प्रक्रिया से नहीं गुजारा जा सकता। उनमें से कई लोग बुजर्ग हो चुके हैं। हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और तंत्रिका संबंधी समस्याओं से पीड़ित हैं। ऐसे में ये टेस्ट जोखिम भरे हो सकते हैं। यह जीवन व गरिमा के अधिकार और शारीरिक अखंडता के अधिकार का उल्लंघन कर सकते हैं।
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इस पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों का उद्दाहरण देते हुए कहा कि ऐसे टेस्ट संविधान के अनुच्छेद 20(3) और 21 के तहत प्राप्त सांविधानिक गारंटियों का उल्लंघन करेंगे। ऐसे तरीकों को जांच में एक सामान्य शॉर्टकट के तौर पर या संदिग्धों द्वारा कथित तौर पर सहयोग न करने की समस्या से निपटने के लिए अनुमति नहीं दी जा सकती।
जांच की सुविधा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं
कोर्ट ने कहा, यह याचिका किसी ऐसे आरोपी की ओर से नहीं आई थी जो जांच के उचित कानूनी चरण पर स्वेच्छा से ऐसे टेस्ट करवाने के लिए तैयार हो, बल्कि यह याचिका स्वयं जांच एजेंसी ने दायर की थी। इसका मकसद उस जांच को फिर से शुरू करना या मजबूत करना था जो तीन दशकों से भी अधिक समय से किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। इतनी देर के बाद इन टेस्ट से मिलने वाले किसी भी सुराग को वेरिफाई करना या उसकी पुष्टि करना मुश्किल होगा। कोर्ट ने एसआईए की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि जांच की सुविधा मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकती।
यह है मामला : अभियोजन के मुताबिक, सरला भट अनंतनाग की 27 साल की कश्मीरी पंडित नर्स थीं। इनकी पोस्टिंग श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में थी। अप्रैल 1990 में उन्हें पुलिस का मुखबिर होने के आरोप में हॉस्टल से अगवा कर लिया गया था। बाद में श्रीनगर में उनकी लाश मिली थी।