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Court Order : श्रीनगर के पांच मंदिरों का नियंत्रण प्रशासन के हवाले, बारामुला की एक धर्मशाला भी हुकूमत के हाथ
Wed, 14 Aug 2024 05:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
अमर उजाला नेटवर्क, श्रीनगर
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 14 Aug 2024 05:40 AM IST
सार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में श्रीनगर के बजरंग देव धर्म दास जी मंदिर, बाबा धर्म दास राम जीवनदास ट्रस्ट सत्तू बरबर शाह, बाबा धर्मदास रामजीवन दास ट्रस्ट सत्तू बरबर शाह मंदिर विशंभर नगर सहित दो अन्य मंदिरों का प्रबंधन जिला प्रशासन को अपने हाथ में लेने का आदेश दिया है।
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सांकेतिक तस्वीर
विस्तार
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में श्रीनगर के बजरंग देव धर्म दास जी मंदिर, बाबा धर्म दास राम जीवनदास ट्रस्ट सत्तू बरबर शाह, बाबा धर्मदास रामजीवन दास ट्रस्ट सत्तू बरबर शाह मंदिर विशंभर नगर सहित दो अन्य मंदिरों का प्रबंधन जिला प्रशासन को अपने हाथ में लेने का आदेश दिया है। इसके साथ ही बारामुला के क्रीरी में स्थित एक धर्मशाला की संपत्ति को भी जिला प्रशासन से अपने नियंत्रण में लेने का आदेश दिया है।
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श्रीनगर के बजरंग देव धर्म दास जी मंदिर की परिसंपत्ति विवाद से जुड़ी एक याचिका का निपटारा करते हुए, न्यायमूर्ति संजीव कुमार और एमए चौधरी की पीठ ने श्रीनगर के उपायुक्त को आदेश दिया कि वह राजस्व और अन्य विभागों के अधिकारियों की एक समिति का गठन करें जो इन मंदिरों में दैनिक पूजा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था करे।
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अदालत ने कहा, "निर्विवाद रूप से, मंदिर की संपत्ति देवता में निहित है और इसलिए, इस याचिका का कोई भी पक्ष या कोई अन्य दावा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा, रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके आधार पर यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंच सके कि यह संपत्ति मंदिर को कैसे समर्पित की गई। अदालत ने कहा, किसी विशिष्ट रिकॉर्ड के अभाव में, यह माना जाना चाहिए कि उस समय के महाराजा ने मंदिरों का निर्माण किया और उन्हें भूमि संपत्ति समर्पित की ताकि ऐसी संपत्तियों से अर्जित आय का उपयोग मंदिरों के प्रबंधन और बेहतरी तथा धर्मार्थ के उद्देश्य के लिए किया जा सके।
अदालत ने कहा, जम्मू और कश्मीर में हिंदू मंदिरों में महंत की नियुक्ति तत्कालीन महाराजा काल के दौरान अधिसूचित एलान नंबर 13 दिनांक 3 आसूज 1964 विक्रमी में वर्णित प्रक्रिया द्वारा नियंत्रित होती है। मौजूदा मामले में, अदालत ने कहा, मंदिर की संपत्ति का आखिरी दर्ज मोहतमिम कंकर दास चेला पंडित शत्रुघ्न दास पुजारी था। इसके बाद, अदालत ने कहा, न तो राजस्व रिकॉर्ड में कोई उत्तराधिकार दर्ज है और न ही कंकर दास के उत्तराधिकारी के रूप में वैध रूप से कोई व्यक्ति दर्ज है। अदालत ने कहा, “साधु समाज के विभिन्न संप्रदायों के बीच विवाद रहा है, प्रत्येक व्यक्ति मंदिर की संपत्तियों के प्रबंधन के अधिकार के साथ बाबा कंकर दास के उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा है।"
अदालत ने निर्देश दिया कि मंदिर या उसकी संपत्तियों के संबंध में सभी लंबित सिविल मुकदमों में, सिविल अदालत डिप्टी कमिश्नर/जिला मजिस्ट्रेट को पार्टी प्रतिवादी के रूप में रखेगी ताकि पार्टियों के बीच मिलीभगत से बचा जा सके। उन्होंने कहा, “यह स्थिति तब तक जारी रहेगी जब तक पार्टियों के अधिकारों को सिविल कोर्ट द्वारा निर्णायक रूप से निर्धारित नहीं किया जाता है या केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर की सरकार सभी धर्मार्थ और धार्मिक संस्थानों और बंदोबस्ती के लिए एक उचित कानून नहीं लाती है।
मंदिरों की संपत्तियों की बड़े पैमाने पर लूट हुई
अदालत ने कहा, ऐसा पाया गया कि 1990 के बाद आतंकवाद के चलते मंदिर की संपत्तियों की बड़े पैमाने पर लूट हुई। तथाकथित महंतों और बाबाओं ने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर इन संपत्तियों पर अतिक्रमण कर लिया।