Rajouri News: परिवार की डोर हो रही कमजोर, माैत को गले लगा रहे किशोर; राजोरी में आत्महत्याएं बनी चिंता का कारण
राजोरी जिले में बीते दो महीनों में किशोरों की आत्महत्या के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है, जिनमें से अधिकांश नाबालिग हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पारिवारिक संवाद की कमी, पढ़ाई का दबाव और डिजिटल अलगाव इसके प्रमुख कारण हैं।
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माता-पिता की डांट और मोबाइल देखने से रोकने जैसे मामलों में किशोरों के आत्महत्या कर लेने जैसे मामले बढ़ते जा रहे हैं। जिले में किशोरों की आत्महत्या के मामले भी चौंकाने वाले हैं। मार्च और अप्रैल के आंकड़े डराते हैं। पिछले दो महीनों के भीतर जिले में सामने आए आत्महत्या के 10 मामलों में से आठ नाबालिगों से जुड़े हैं। इनमें से तीन छात्र नाैवीं कक्षा के थे। जम्मू संभाग के राजोरी जिले में किशोरों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है।
मानसिक संकेतों को न करें नजरअंदाज
इन मामलों में हैरान करने वाली बात यह है कि अधिकतर परिवारों ने इसे महज एक दुर्घटना मानकर चुप्पी साध ली। उन्होंने न तो कोई पुलिस शिकायत दर्ज कराई और न ही बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित कोई पूर्व जानकारी साझा की।विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को भी अपने बच्चे के व्यवहार को नोटिस करना चाहिए।
खासतौर पर बच्चा जब कम बोलने लग जाए, उदास रहने लगे, तो उस पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत होती है। अगर बच्चा कम सो रहा है, कम खाना खा रहा है तो भी सतर्क हो जाएं। इस मामले में हुई एक रिसर्च के अनुसार, 80 मामलों में बच्चे मरना नहीं चाहते थे, लेकिन जब उन्हें किसी का सपोर्ट नहीं मिलता तो वे यह घातक कदम उठाते हैं। इंटरनेट की दुनिया ने उन्हें समय से पहले बड़ा बना दिया है।
मां-बाप की टोटा-टाकीपैदा कर रही अवसाद
सरकारी अस्पताल सरवाल जम्मू के डॉ. रामेश्वर सिंह मन्हास का कहना है कि आजकल बच्चे सोशल मीडिया से बहुत प्रभावित हैं। उनका ज्यादातर वक्त मोबाइल के साथ बीतता है। वहीं, मां-बाप पढ़ाई को लेकर हर वक्त टोका-टाकी करते हैं या दबाव बनाते हैं। इससे बच्चे अवसाद में चले जाते हैं या खुद को अकेला समझने लगते हैं।
यह एक घातक संकेत है। अगर बच्चा किसी चीज को लेकर डिप्रेशन में है या खोया सा है, तो उससे प्यार से बात करें। पढ़ाई को लेकर भी ज्यादा प्रेशर न बनाएं। किशोरों में संवादहीनता और डिजिटल व्यस्तता एक खतरनाक मानसिक स्थिति को जन्म दे रही है। आज माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। उनकी भावनात्मक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के करीबी दोस्तों, शिक्षकों और स्कूल के माहौल की जानकारी रखें।
हार्मोनल बदलाव और मूड स्विंग बन रहे मानसिक तनाव की वजह
बच्चों और खास तौर पर टीनएजर्स की बात करें तो उन पर अलग प्रेशर है। हार्मोनल बदलाव, मूड स्विंग जैसी चीजों के चलते वे कई बार डिप्रेशन में आ जाते हैं। ऐसे में मोबाइल के इस्तेमाल या किसी और बात के लिए उन्हें परिवार से ताने मिलते हैं, जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर पाते और आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं।
आत्महत्या करने से पहले किशोर अक्सर कुछ संकेत देते हैं - जैसे व्यवहार में अचानक बदलाव, चुप्पी, गुप्त संदेश, जोखिम भरा आचरण जिन्हें अक्सर किशोरावस्था का स्वाभाविक व्यवहार मानकर टाल दिया जाता है। ऐसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए।- प्रो. विश्वरक्षा, विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र, जम्मू विश्वविद्यालय।
माता-पिता को चाहिए बच्चों के साथ संवाद और स्नेह का वातावरण बनाना
किशोरावस्था में बच्चों के बदलते व्यवहार को ध्यान में रखते हुए माता पिता को उनकी मनोदशा समझनी चाहिए। घर में बच्चों को समय देकर उनसे दोस्ती जैसा माहौल पैदा करके उनके मन को समझने की आवश्यकता है। स्कूलों में भी बच्चों के लिए एक ऐसे शिक्षक की जरूरत है जो उनके साथ दोस्ताना माहौल में रहे और उनके मन की बात को समझे, क्योंकि किसी भी व्यक्ति में आत्महत्या का विचार एकदम से नहीं आता है।
बच्चे जब अकेले, गुमसुम और खोए खोए से रहने लगें तो सतर्क हो जाएं। समाज, परिवार और संस्थाओं को मिलकर एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां किशोर खुद को सुना,समझा और सुरक्षित महसूस करें। अगर आप या आपके आसपास कोई मानसिक तनाव से जूझ रहा है तो कृपया चुप न रहें। मनोवैज्ञानिक सहायता लें। आप अकेले नहीं हैं।डॉ. परवेज आलम, मनोचिकित्सक, जीएमसी राजोरी
क्यों आत्महत्या कर रहे हैं किशोर?
विशेषज्ञों के अनुसार, किशोरों में आत्महत्या के पीछे कई जटिल कारक हो सकते हैं: - घर-परिवार में बातचीत की कमी और अकेलापन- शैक्षणिक दबाव और अपेक्षाएं
- सोशल मीडिया पर तुलना और वर्चुअल दबाव- साइबरबुलिंग और व्यक्तिगत संबंधों में असफलता
- अवसाद, तनाव और आत्म पहचान का संकट
ये हो सकता है समाधानस्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना
परिवारों में खुली बातचीत और विश्वास का माहौल बनानाकिशोरों के व्यवहार में परिवर्तन को गंभीरता से लेना
समय रहते मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से परामर्श लेनासहकर्मी सहायता ग्रुपों और ऑनलाइन हेल्पलाइनों की उपलब्धता बढ़ाना
आत्महत्या के कारण: -
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं (54%) - नकारात्मक या दर्दनाक पारिवारिक मुद्दे (36%) - शैक्षणिक तनाव (23%) - समाज और जीवनशैली कारक (20%) - हिंसा (22%) - आर्थिक संकट (9.1%) - भावनात्मक संबंध (9%) - घरेलू हिंसा और लैंगिक भेदभाव
राज्यवार आत्महत्या दर: - महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में आत्महत्या के 50% से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं।
पुदुचेरी में सबसे अधिक आत्महत्या दर 36.8 प्रति 100,000 लोगों पर दर्ज की गई।-
तमिलनाडु और केरल में भी आत्महत्या दर अधिक देखी गई है।
जिला स्तर पर आत्महत्या दर: - जबलपुर (मध्य प्रदेश) और कोल्लम (केरल) में आत्महत्या की दर क्रमशः 45.1 और 40.5 प्रति 100,000 लोगों की रिपोर्ट की गई है