चिनाब नदी पर बन रहा एफिल टावर से भी ऊंचा रेल पुल, 50 किग्रा का विस्फोटक भी इसके आगे है कमजोर!
हर एक पिलर की सुरक्षा का खास इंतजाम किया जा रहा है। 120 साल की आयु वाले इस पुल को देखने के लिए विदेशी सैलानी चिनाब नदी पर पहुंचेंगे। इसके लिए रियासी जिला प्रशासन एक दूरगामी योजना पर काम कर रहा है...
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देश-दुनिया का सबसे ऊंचा मेहराब (आर्क) के आकार में बना रेल पुल, जिसकी लंबाई 1315 मीटर और ऊंचाई 359 मीटर है, उसे देखने के लिए विदेशी सैलानी जम्मू-कश्मीर पहुंचेंगे। रियासी जिले में बक्कल और कौड़ी के बीच चिनाब नदी पर बन रहा यह पुल भारतीय इंजीनियरिंग का एक नायाब मॉडल है। इस परियोजना का क्रियान्वयन कर रहे कोंकण रेलवे के डिप्टी चीफ इंजीनियर आरआर मलिक बताते हैं, डीआरडीओ के साथ मिलकर इसकी सुरक्षा का खाका तैयार किया गया है।
मलिक का कहना है कि सुरक्षा के लिहाज से इस बारे में ज्यादा कुछ सार्वजनिक करना ठीक नहीं होगा, लेकिन इतना कहा जा सकता है कि एफिल टावर से ज्यादा ऊंचे व ब्लास्ट प्रूफ स्टील से बने रेल पुल को आतंकवादी कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकेंगे। अगर उनके पास कोई 40-50 किलोग्राम विस्फोटक टीएनटी है, तो भी वे पुल को क्षतिग्रस्त नहीं कर पाएंगे।
हर एक पिलर की सुरक्षा का खास इंतजाम किया जा रहा है। 120 साल की आयु वाले इस पुल को देखने के लिए विदेशी सैलानी चिनाब नदी पर पहुंचेंगे। इसके लिए रियासी जिला प्रशासन एक दूरगामी योजना पर काम कर रहा है।
पुल की साइट पर मौजूद डिप्टी चीफ इंजीनियर आरआर मलिक ने बताया, हम शुरुआत से ही पुल की सुरक्षा को लेकर खासे सचेत रहे हैं। आतंकी घटनाओं का कोई समय नहीं होता। किसी मानवीय भूल के चलते कभी ऐसा हो जाए कि आतंकी समूह इस पुल के करीब आ जाएं तो भी घबराने की आवश्यकता नहीं है।
पहली बात तो यह है कि वे इतनी भारी मात्रा में टीएनटी यहां तक नहीं ला सकेंगे। अगर वे ले भी आते हैं तो पुल को कुछ नहीं होगा। हां, थोड़ा बहुत नुकसान होने की संभावना बनी रहेगी। कुछ परतें क्षतिग्रस्त हो सकती हैं, लेकिन उससे रेल यातायात बाधित नहीं होगा।
रेल को कम स्पीड पर पुल से गुजारा जा सकता है। पचास किलोग्राम तक का टीएनटी चाहे पुल के ऊपरी हिस्से में लगा हो या नीचे पिलर के आसपास, वह कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पुल के 16 खंभों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किया जाएगा। इसी तरह स्टील के पांच पिलर रहेंगे। अभी यह विचार किया जा रहा है कि हर एक पिलर का अपना एक गेट हो।
चारों तरफ से मजबूत फेंसिंग की जाएगी। हो सकता है कि कंक्रीट का ढांचा भी तैयार करें। मलिक के मुताबिक सिक्योरिटी को लेकर और भी बहुत सी बातें हैं, जिनका खुलासा करना ठीक नहीं होगा। मैं केवल इतना भरोसा दिला सकता हूं कि यह पुल बड़े से बड़ा आतंकी हमला और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा को झेलने की स्थिति में रहेगा।
भूकंप के लिहाज से यह क्षेत्र सिसमिक जोन-4 में आता है। हमने पुल को सिसमिक जोन-5 के हिसाब से तैयार किया है। सात-आठ रिक्टर स्केल पर भूकंप आता है तो भी यह पुल सुरक्षित रहेगा। अगस्त 2022 तक हमारे पास पुल को तैयार करने का समय है। हमारा प्रयास है कि यह पुल उससे पहले ही बनकर तैयार हो जाए।
पर्यटन के लिहाज से विकसित होगा रेल पुल के आसपास का क्षेत्र
रियासी जिला प्रशासन का प्रयास है कि विभिन्न देशों के लोग इस पुल को देखने के लिए जम्मू-कश्मीर आएं। वजह, इस पुल की नदी तल से ऊंचाई 359 मीटर है। एफिल टावर की ऊंचाई 324 मीटर है। खास बात है कि यह पुल 265 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं का सामना कर सकता है। पुल में ऐसी तकनीक लगाई गई है कि कोई भी खतरा होने पर वार्निंग अलार्म खुद ही बजने लगेगा।
ब्रिज के निर्माण में करीब 29 हजार मीट्रिक टन इस्पात लगेगा। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक प्रोजेक्ट, जो कि 345 किमी लंबा है, इसमें अनेक सुरंग भी रहेंगी। कटरा से आगे धरम तक के 100 किमी लंबे ट्रैक में से 52 किमी का रेल मार्ग कोंकण रेलवे बना रहा है।
इसमें से 46.1 (करीब 86 फीसदी) फीसदी रास्ता सुरंगों से होकर गुजरेगा। इस मार्ग पर कुल 17 सुरंग हैं। सबसे लंबी टनल 9.3 किमी की है। रियासी जिले की डीसी अंजू चिब बताती हैं, यह रेल पुल पर्यटन के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा। इसके आसपास के क्षेत्र को पर्यटन के हिसाब से विकसित करने के लिए योजना बना रहे हैं।