जम्मू-कश्मीर: खून जमा देने वाली ठंड में रात भर पहरा दे रहे वीडीसी सदस्य, राजोरी हमले के बाद पुंछ में गश्त तेज
ढांगरी में आतंकी हमले के बाद पुंछ के गांवों की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। वीडीसी सदस्य रात भर गांवों में पहरा दे रहे हैं। एलओसी के पास बसे गांवों में खासकर गश्त की जा रही है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
पुंछ जिले भर में कई दिनों से पड़ रही भारी ठंड, जिसमें बिस्तर से शरीर का कोई अंग बाहर रह जाए। तो वह भी सर्दी से अकड़ जाता है। ऐसी खून जमा देने वाली ठंड में जिले के भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा पर स्थित गांव जलास के वीडीसी सदस्य रात भर घरों से बाहर खुले आसमान के नीचे हाथों में थ्री नॉट थ्री बंदूकें थामे पहरा दे रहे हैं। वह गश्त करते और नाके लगा रहें हैं ताकि पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र से नापाक मंसूबे लिए कोई आतंकी गांव में राजोरी के ढांगरी की तरह की वारदात को अंजाम न दे सके।
सर्द रातों में रात भर जागकर पहरा देने वाले इन वीडीसी सदस्यों के बुलंद हौसले और पहाड़ से मनोबल के पीछे बस एक ही जज्बा है कि उनके गांव के घरों में बच्चे, महिलाएं एवं बुजुर्ग पूरी तरह सुरक्षित रहें, कोई दुश्मन उनकी तरफ आंख उठा कर देखने की हिम्मत न कर सके। राजोरी आतंकी हमले के बाद करीब डेढ़ दशक के बाद फिर से बंदूकें थामे अपनों की सुरक्षा के लिए रात पर जागने वाले इन वीडीसी सदस्यों के साथ संवाद न्यूज एजेंसी ने एक रात बिताने का फैसला किया और रात को घुप अंधेरे में खुद को सर्दी से बचाने के लिए सभी उपाय कर गांव जलास में कदम रखा, तो बाहर निकलते ही ऐसा लगने लगा मानों किसी बड़े से फ्रिज में प्रवेश कर लिया हो।
एक तरफ गांव जलास के बीच में बहते नाले और गांव से मात्र पांच सौ मीटर की दूरी पर पुलस्त नदी के उस पार स्थित पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र की तरफ से पुलस्त नदी से आती ठंडी हवाएं। गांव को ओर ठंडा कर रही थी। ऐसे में गांव के दर्जनों वीडीसी सदस्य एक स्थान पर हथियारों के साथ इकट्ठे खड़े नजर आए। शायद वह वहां से गांव में गश्त शुरू करने वाले थे। वीडीसी सदस्यों ने सर्व प्रथम दो कतारों में अपनी बंदूकों को ताने गश्त शुरू की तो वह गांव की मुख्य सड़क से होते हुए पूरी मुस्तैदी के साथ आगे बढ़ने लगे।
पक्की सड़क से गांव का चक्कर लगाने के बाद वी डी सी सदस्य गांव की पगडंडियों से होते हुए नाले के पास पहुंचे। जहां उन्होंने एक दूसरे से दूरी बनाते हुए सेना के जवानों की तरह छुप कर मोर्चा संभालते हुए एंबुश लगाकर नाले की तरफ बंदूकों का रुख करते हुए इस बात का इंतजार शुरू कर दिया कि कहीं कोई आतंकी नाले के रास्ते गांव की तरफ बढ़ने का प्रयास तो नहीं कर रहा है। काफी समय वैसे ही एंबुश में बिताने और नाले की तरफ सब कुछ सामान्य पाने के बाद वहां से एक साथ पीछे लौटना शुरू कर दिया।
एक बार फिर गांव में घरों के आसपास खेतों में गीली मिट्टी के बीच एक दूसरे से निर्धारित दूरी पर मोर्चा संभालते हुए गांव की पहरेदारी शुरू कर दी। इस दौरान आसमान से भारी मात्रा में गिरने वाला पाला वीडीसी सदस्यों की जैकेटों और टोपियों पर पानी के रूप में साफ दिखाई दे रहा था। पाला गिरने से सुन्न पड़ रही हाथों की उंगलियों को कुछ समय आपस में रगड़ कर गर्म करने के बाद फिर उंगलियों को बंदूक के ट्रैगर पर टिकाते हुए इन वीडीसी सदस्यों के चेहरों पर शिकन तक नहीं पड़ रही थी और न ही कहीं ऐसा आभास हो रहा था, कि वह किसी मजबूरी में यह सब सहन कर रहे हों।
इन वीडीसी सदस्यों से जब संवाद न्यूज एजेंसी ने बात की, तो उनका कहना था कि हम नियंत्रण रेखा के पास रहते हैं। जहां पाकिस्तान कई दशक से अपनी नापाक हरकतों को अंजाम देता आ रहा है। ऐसे में हमारी सेना, बीएसएफ, सीआरपीएफ एवं पुलिस के साथ ही भी मुस्तैद है। हम किसी आतंकी को गांव में घुसने नहीं देंगे। अगर कोई घुसने की कोशिश करेगा तो वह जिंदा वापस नहीं जाएगा। हम रात भर जागकर इसलिए ठंड में खुले आसमान के नीचे रहते हैं कि हमारे घरों में बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग बेखौफ होकर चैन की नींद सो सकें।
हमने पहले भी सुरक्षाबलों के साथ मिल कर जिले से आतंकवाद को समाप्त किया था और अब फिर उसे जड़ से समाप्त करेंगे। हम यहां राजोरी जैसा नहीं होने देंगे। यह पूछे जाने पर कि आपके सामने क्या चैलेंज है। इस पर वीडीसी सदस्यों का कहना था कि चैलेंज कोई नहीं, बस थोड़ी ठंड है। सरकार हमें इन थ्री नॉट थ्री बंदूकों के स्थान पर स्वचालित बंदूकें दे दे। हम इतना चाहते हैं। शाम छह बजे खाना खाकर अपनों की सुरक्षा के लिए हथियार थामे घरों से बाहर निकलने वाले यह वीडीसी सदस्य सुबह पांच बजे घरों में लौटते हैं, और तीन घंटों की नींद के बाद अपने काम धंधे पर निकल जाते हैं।