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अध्यात्म ज्ञान से मिलेगी चिंता और दुख से मुक्ति
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भगवत कथा का श्रवण करते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : KATHUA
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हीरानगर। सीमावर्ती गांव देवा चक में श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन जारी है। जिसमें क्षेत्र के काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होकर वहां अध्यात्म ज्ञान हासिल कर रहे हैं। मंगलवार को जारी कथा के छठे दिन कथा व्यास सुभाष शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को जीवन में व्याप्त दुख और चिंता का मूल कारण अज्ञान बताया।
इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस धरा पर जीवन यापन करने वाले हर मनुष्य के अंदर शरीर के न रहने अर्थात मृत्यु का डर, चिंताएं, शोक, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि का कारण अज्ञान है। क्योंकि आज के भौतिक युग में वह डिग्रियां प्राप्त कर यह समझ लेता है कि उसने ज्ञान प्राप्त कर लिया। परंतु वह केवल अपनी विद्या तक सीमित रहता है। उसकी शिक्षा से वह चिंताओं से मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाता। इसका मूल कारण अध्यात्म के प्रति अनभिज्ञता है और यही अज्ञान है। जबकि आध्यात्मिक जीवन से परिचय ही असल ज्ञान है।
शास्त्री जी ने कहा कि इस शरीर का जन्म हुआ है और एक दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसके विपरीत वेद और श्रीमद्भागवत गीता कहती है कि आप कभी नहीं मरेंगे, आप अविनाशी हैं। श्रीमद्भागवत गीता की हम पूजा करते हैं परंतु उसके ज्ञान को स्वीकार नहीं करते हैं। यही हमारा अज्ञान है।
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हमें मानव योनि की प्राप्ति इसलिए होती है कि मुक्ति प्राप्त की जा सके। परंतु प्रश्न यह है कि किस से मुक्ति प्राप्त करनी हैं, क्या विनाशी शरीर से नहीं, हमें तो सिर्फ दुखों, चिंताओं, हानि और मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करनी है। अगर ऐसा चाहते हैं तो अवस्था चाहे जो भी हो गुरु कोई भी हो, संप्रदाय चाहे जो भी हो, अवस्था जवानी की हो अथवा बुढ़ापा हो। हमें अध्यात्म के माध्यम से नित्य जीवन, दिव्य जीवन, शांत जीवन और आनंदमय जीवन को प्राप्त करना है, बस यही ज्ञान है। जिसने इसको समझ लिया जान लिया और अपना लिया उसी का कल्याण है।
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इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस धरा पर जीवन यापन करने वाले हर मनुष्य के अंदर शरीर के न रहने अर्थात मृत्यु का डर, चिंताएं, शोक, ईर्ष्या, राग, द्वेष आदि का कारण अज्ञान है। क्योंकि आज के भौतिक युग में वह डिग्रियां प्राप्त कर यह समझ लेता है कि उसने ज्ञान प्राप्त कर लिया। परंतु वह केवल अपनी विद्या तक सीमित रहता है। उसकी शिक्षा से वह चिंताओं से मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाता। इसका मूल कारण अध्यात्म के प्रति अनभिज्ञता है और यही अज्ञान है। जबकि आध्यात्मिक जीवन से परिचय ही असल ज्ञान है।
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शास्त्री जी ने कहा कि इस शरीर का जन्म हुआ है और एक दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसके विपरीत वेद और श्रीमद्भागवत गीता कहती है कि आप कभी नहीं मरेंगे, आप अविनाशी हैं। श्रीमद्भागवत गीता की हम पूजा करते हैं परंतु उसके ज्ञान को स्वीकार नहीं करते हैं। यही हमारा अज्ञान है।
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हमें मानव योनि की प्राप्ति इसलिए होती है कि मुक्ति प्राप्त की जा सके। परंतु प्रश्न यह है कि किस से मुक्ति प्राप्त करनी हैं, क्या विनाशी शरीर से नहीं, हमें तो सिर्फ दुखों, चिंताओं, हानि और मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करनी है। अगर ऐसा चाहते हैं तो अवस्था चाहे जो भी हो गुरु कोई भी हो, संप्रदाय चाहे जो भी हो, अवस्था जवानी की हो अथवा बुढ़ापा हो। हमें अध्यात्म के माध्यम से नित्य जीवन, दिव्य जीवन, शांत जीवन और आनंदमय जीवन को प्राप्त करना है, बस यही ज्ञान है। जिसने इसको समझ लिया जान लिया और अपना लिया उसी का कल्याण है।