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दुख से मुक्ति का मार्ग है भक्ति
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नगरी स्थित माता बाला सुंदरी के प्रांगण में श्रीमद् भागवत कथा के दौरान प्रवचन करते संत सुभाष शास्?
- फोटो : KATHUA
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कठुआ। नगरी स्थित माता बाला सुंदरी मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। शनिवार को कथावाचक संत सुभाष शास्त्री ने मनुष्य के दुखी रहने का कारण समझाया।
उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि मनुष्य के दुख का कारण उसकी भौतिकवादी सोच है। सोच कहती है कि इस संसार की हर वस्तु, व्यक्ति और पदार्थ को प्राप्त कर लेने के उपरांत सुखी हो जाएंगे। परंतु, ऐसा कभी नहीं होता। क्योंकि, श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार जो दिखे तो सकल विनाशी, अर्थात् इस संसार में दिखने वाली हर चीज का विनाश होता है। और, प्राप्त चीजें जब छूटेंगी तो वही दुख का कारण बन जाएगी।
शास्त्री जी ने कहा कि मन को इस भौतिकता वादी सोच से कैसे हटाया जाए? यह मूल प्रश्न है। और, इस प्रश्न का उत्तर है कि यदि मनुष्य अपने मन को श्री प्रभु के चरणों में लगा दे, अर्थात् भक्ति करना आरंभ कर दे, तो सांसारिक विषयों से विरक्त होकर ही हम परमात्मा की भक्ति को प्राप्त होंगे। यह भक्ति सब दुखों का नाश कर देगी। उपनिषद, पुराण, आदि के श्रवण, महापुरुषों के उपदेश और सत्संग से भक्ति का उदय होता है। इसलिए, हर समय निश्चिंत होकर भगवान का भजन करें। आचार्यों ने एकमत से भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना है। भगवान स्वत: ही प्रकट होकर भक्तों को अनुभव करा देते हैं। फिर सब कष्टों से स्वयं ही छुटकारा मिल जाता है।
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अंत में संत श्री ने समझाया कि हे साधकों, नैतिक जीवन जीते हुए हिंसा का मार्ग छोड़ सत्य, नम्रता, निस्वार्थ और पवित्र भाव के मार्ग पर ही चलें। आपको हर प्राणी में अपने परमात्मा का स्वरूप नजर आएगा। और तब आप परमात्मा की उपेक्षा और शोषण नहीं करेंगे, किसी को प्रताड़ित नहीं करेंगे। आपके भाव से ही हर प्राणी में समभाव रहेगा। प्राणी मात्र से प्रेम कर आप परमात्मा के प्रिय बनेंगे। कथा के समापन पर आरती का आयोजन किया गया।
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उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि मनुष्य के दुख का कारण उसकी भौतिकवादी सोच है। सोच कहती है कि इस संसार की हर वस्तु, व्यक्ति और पदार्थ को प्राप्त कर लेने के उपरांत सुखी हो जाएंगे। परंतु, ऐसा कभी नहीं होता। क्योंकि, श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार जो दिखे तो सकल विनाशी, अर्थात् इस संसार में दिखने वाली हर चीज का विनाश होता है। और, प्राप्त चीजें जब छूटेंगी तो वही दुख का कारण बन जाएगी।
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शास्त्री जी ने कहा कि मन को इस भौतिकता वादी सोच से कैसे हटाया जाए? यह मूल प्रश्न है। और, इस प्रश्न का उत्तर है कि यदि मनुष्य अपने मन को श्री प्रभु के चरणों में लगा दे, अर्थात् भक्ति करना आरंभ कर दे, तो सांसारिक विषयों से विरक्त होकर ही हम परमात्मा की भक्ति को प्राप्त होंगे। यह भक्ति सब दुखों का नाश कर देगी। उपनिषद, पुराण, आदि के श्रवण, महापुरुषों के उपदेश और सत्संग से भक्ति का उदय होता है। इसलिए, हर समय निश्चिंत होकर भगवान का भजन करें। आचार्यों ने एकमत से भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना है। भगवान स्वत: ही प्रकट होकर भक्तों को अनुभव करा देते हैं। फिर सब कष्टों से स्वयं ही छुटकारा मिल जाता है।
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अंत में संत श्री ने समझाया कि हे साधकों, नैतिक जीवन जीते हुए हिंसा का मार्ग छोड़ सत्य, नम्रता, निस्वार्थ और पवित्र भाव के मार्ग पर ही चलें। आपको हर प्राणी में अपने परमात्मा का स्वरूप नजर आएगा। और तब आप परमात्मा की उपेक्षा और शोषण नहीं करेंगे, किसी को प्रताड़ित नहीं करेंगे। आपके भाव से ही हर प्राणी में समभाव रहेगा। प्राणी मात्र से प्रेम कर आप परमात्मा के प्रिय बनेंगे। कथा के समापन पर आरती का आयोजन किया गया।

नगरी स्थित माता बाला सुंदरी के प्रांगण में श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण करते श्रद्धालु, संवाद।- फोटो : KATHUA