मां के जयकारों से गूंजे मंदिर, दर्शन को करना पड़ा इंतजार

Jammu and Kashmir Bureauजम्मू और कश्मीर ब्यूरो Updated Sun, 18 Oct 2020 01:21 AM IST
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शहर के मुख्य बाजार में माता आशापूर्णी का मंदिर
शहर के मुख्य बाजार में माता आशापूर्णी का मंदिर - फोटो : KATHUA

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कठुआ। शारदीय नवरात्र के पहले दिन शनिवार को सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालु पहुंचने शुरू हो गए। हालांकि इस बार संख्या कम ही रही। जय माता दी के जयकारों से दिन भर माहौल भक्तिमय बना रहा। कोरोना महामारी के बीच सरकार की ओर से जारी नियमों का पालन करते हुए भक्तों ने मां के दर्शन किए। मंदिरों में इस बार लंगर लगने और मेले जैसा माहौल नजर नहीं आया। पैक किया हुआ प्रसाद वितरित किया गया। शहर से सटे माता बाला सुंदरी मंदिर, आशापूर्णी मंदिर में श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए काफी इंतजार करना पड़ा। ऐसा ही हाल जसरोटा स्थित काली माता मंदिर, लखनपुर के किले वाली माता मंदिर परिसर में रहा। जिले के दूरदराज इलाकों में स्थित ऐतिहासिक प्राचीन मंदिरों जोड़ेयां माता, दोले माता मंदिर, शक्ति माता मंदिर बनी, माता वनखंडी महानपुर, चंचलो माता बसोहली में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया। इस दौरान सामाजिक दूरी का ध्यान रखा गया, बिना मास्क मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया। इसके साथ ही सेनिटाइजर का प्रबंध भी किया गया था।
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महिला श्रद्धालुओं ने लगाई साख
माता के प्रथम शैलपुत्री स्वरूप की अराधना के लिए श्रद्धालुओं में उत्साह दिखा। नवरात्र पूजन की शुरूआत में महिला श्रद्धालुओं ने साख लगाई। प्रशासन ने सभी मंदिरों में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए हैं। आगामी दिनों में भी सुरक्षा व्यवस्था रहेगी, ताकि श्रद्धालुओं को कोई परेशानी न आए।
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पालकी में दरबार बिराजीं माता जोड़ेयां
पहले नवरात्र को जोड़ेया माता मंदिर पहुंची निशान यात्रा का श्रद्धालुओं और मंदिर वेलफेयर कमेटी के सदस्यों ने भव्य स्वागत किया। मंदिर और आसपास के पर्वत मां जोडे़यां के जयकारों से गूंज उठे। नवरात्र पर छड़ी यात्रा की परंपरा सामान्य रूप से अधिकांश मंदिरों के लिए निकलती है। लेकिन नवरात्र में जोड़ेयां माता मंदिर की परंपरा इन सब से अलग है। यहां पर हर नवरात्र तड़के माता की निशान यात्रा मंदिर पहुंचती है और हर शाम विधिवत पूजा के बाद वापस लौट जाती ह। यह क्रम पूरे नवरात्र के दौरान जारी रहता है। माता के आभूषण पालकी में सजाकर मंदिर परिसर तक लाए जाते हैं। इस दौरान पारंपरिक बांसुरी और ढोल की थाप पर श्रद्धालु दन्नी गांव से झूमते हुए पहुंचते हैं। सूर्योदय के समय मंदिर पहुंचकर पहले सूर्य नमस्कार किया जाता है। इसके बाद माता का श्रृंगार कर विधिवत पूजा आरंभ होती है।
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मन की मुराद पूरी करती हैं मां आशापूर्णी
पंकज मिश्रा
कठुआ। देश के 51 शक्तिपीठों में से एक मानी जाने वाली मां आशापूर्णी की महिमा निराली है। भक्तों के दुख हरने और सबकी मुरादें पूरी करने वाली मां आशापूर्णा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है। कठुआ के मुख्य बाजार स्थित दशकों पुराने मां आशापूर्णी के मंदिर में यूं तो हर मंगलवार भक्तों का तांता लगता है, लेकिन नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर माथा टेकने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यह मंदिर सदियों पुराना है। यहां माता आशापूर्णी पिंडी रूप में विराजमान हैं। मंदिर में बासी रोटी की प्रथा आज भी चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि पांडवों के अज्ञातवास के दौरान उन्होंने मां आशापूर्णा का आह्वान कर बासी रोटी का व्रत रखा था। इससे उनकी मनोकामना पूरी हुई। मंदिर के पुजारी गायत्री प्रकाश शर्मा ने बताया कि आज भी यह रीत निभाई जाती है। लोग मनोकामना पूर्ति के लिए बासी रोटी का व्रत रखते हैं। मंदिर से जुड़ी एक अन्य दंत कथा के अनुसार भांड जाति के लोग आज भी मंदिर में माता को सौ मीटर से अधिक लंबी चुनरी नवरात्र के दौरान भेंट करते हैं। कठुआ शहर के बीच बाजार की संकरी गलियों में स्थित इस मंदिर का निर्माण 1947 के बाद पंडित छज्जू राम ने किया। उन्होंने मां की पिंडियों को स्थापित करने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। माता आशापूर्णी के मंदिर में शीतला माता की मूर्तियां भी स्थापित की गई हैं।
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