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Kathua News: डूना-पत्तल बेचकर अपनी अलग पहचान बना रही वार्ड 8 की ‘पुष्पा’

Wed, 07 May 2025 12:55 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ Updated Wed, 07 May 2025 12:55 AM IST
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Pushpa is creating a different identity by selling Duna Pattal
डूना पतल बनाती वार्ड-8 की पुष्पा देवी।  संवाद - फोटो : kathua
- धार्मिक अनुष्ठान के साथ भोजन तक के लिए इस्तेमाल होने वाली परंपरा को बचाने में जुटीं
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- कभी पूरा मोहल्ला करता था यही काम, आज इस काम से जुड़ी इकलौती महिला


कठुआ। शहर के वार्ड 8 की पुष्पा देवी पारंपरिक दोना (डूना) पत्तल बनाकर अलग पहचान बना रही हैं। उनके दोना पत्तल की मांग पूरे शहर में है। मौजूदा समय में यह उनकी आजीविका का साधन बन चुका है।
पुष्पा देवी पारंपरिक कौशल को बनाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। मेहनत और लगन से वे परिवार का पेट पाल रही हैं। साथ ही पारंपरिक कला को जीवित रख रही हैं। मगर बदलते हालात के कारण अब उनके लिए यह काम आसान नहीं है। इसे बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले पलाश के पत्तों की कमी रोजगार के रास्ते में रोड़ा बन रहा है। पारंपरिक दोना और पत्तल बनाने की इस प्रक्रिया में पहले उन्हें पलाश के पत्तों को इकट्ठा करना पड़ता है। वहीं, हर पत्ते को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली अरुंडो (नरकुल) से बनाई जाने वाली तीलियों की उपलब्धता कम होती जा रही हैं। क्षेत्र में हुए औद्योगिक विकास के कारण शहर के जिन स्थानों पर यह मिलता था। आज वहां नई कॉलोनियों के अलावा औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो गई हैं। ऐसे में घर के आसपास मिलने वाली सामग्री के लिए भी उन्हें परेशान होना पड़ता है।
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उन्होंने बताया कि धार्मिक अनुष्ठानों में पलाश के पत्तों से बने दोना और पत्तलों का इस्तेमाल होता है। इस कारण उनके बनाए दोना और पत्तल पूरी तरह से खप जा रहे हैं। अगर पहले की तरह ही इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री मिले तो प्रतिदिन काम करके अच्छा आय अर्जित की जा सकती है।
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पुष्पा देवी की कहानी उन महिलाओं के लिए एक मिसाल है, जो अपने पारंपरिक कौशल को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनकी मेहनत और लगन से वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही हैं और अपनी पारंपरिक कला को जीवित रख रही हैं। हमें उनके काम को प्रोत्साहित करना होगा और उनकी कला को जीवित रखने के लिए समर्थन देना होगा। संवाद

20 साल में सिमट गया डूना पत्तल कारीगरों का काम

20 साल पहले तक शहर के पारलीवंड इलाके के सभी कुम्हार परिवार दोना और पत्तल बनाते थे, जो कठुआ के साथ आसपास के जिलों में भी बिकने के लिए जाता था। मगर समय के साथ आए बदलाव में आज पुष्पा देवी इस रोजगार को करने वाली अकेली बची हैं। इस कारण मशीनों से बनाए जाने वाले दोना और पत्तल रहे हैं, जो कागज या किसी भी पेड़ के पत्तों से बने होने के कारण सस्ते होते हैं। आज नई पीढ़ी तो इससे पूरी तरह से अलग हो चुकी है।

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इलाके में लुप्त होते जा रहे पलाश के पेड़

खूबसूरत संतरी रंग के फूलों से इन दिनों खिलने वाले पलाश के पौधों की एक समय पर कठुआ और आसपास के इलाकों में बहुतायत थी। अब मशीनी पत्तलों दोनों, डिस्पोजेबल बाजार ने इस व्यवसाय से जुड़े लोगों को एक किनारे पर लगा दिया। हालात यह हैं कि एक एक कर परिवारों ने इस व्यवसाय से किनारा कर लिया। पुष्पा देवी क्षेत्र में बचे पलाश के पेड़ों को संरक्षित करने की मांग की।
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