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Kathua News: बंदरों से डरकर गेहूं-मक्का उगाना छोड़ा, लेमन ग्रास व अरंडी की खेती की तो खरीदार नहीं मिले
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किसानों द्वारा कंडी क्षेत्र में खाली छोड़ी गई कृषि योग्य भूमि। संवाद
- फोटो : kathua news
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कठुआ। कंडी की 40 हजार हेक्टेयर भूमि पर बंदरों के आतंक से खेती छोड़ चुके किसानों के लिए कृषि विभाग की प्रायोगिक खेती भी काम नहीं आ रही है। पिछले एक दशक में एलोवेरा से लेकर लेमनग्रास और हाल में सबसे बड़े प्रयोग अरंडी की खेती भी औंधे मुंह गिर गई है। क्योंकि फसल तैयार होने के बाद बाजार का न मिलना और खेती के बाद प्रोत्साहन की कमी ने किसानों को इससे मुंह मोड़ने को मजबूर कर दिया।
दरअसल लखनपुर से लेकर जिले की अंतिम सीमा कूटा तक फैले इस क्षेत्र में बंदरों के बढ़ते उत्पात से पिछले 8-10 साल से खेती का सिलसिला बंद होता जा रहा है। हालांकि पहले इस क्षेत्र में गेहूं, मक्की, चना, तिल व उड़द की खेती से किसानों की अच्छी खासी आय होती थी। इसमें वह अपने परिवार के पालन पोषण के अलावा अन्य खर्चों को पूरे करते थे। लेकिन बंदरों की बढ़ती तादाद से सैकड़ों कनाल जमीन कई सालों से खाली पड़ी है। बंदर अब लोगों के घरों में आकर आंगन में लगी सब्जियों को भी उजाड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे।
समस्या के समाधान के लिए कृषि विभाग ने इस अवधि के दौरान कंडी क्षेत्र में लेमन ग्रास, एलोवेरा और अरंडी की प्रायोगिक खेती शुरू करवाई। लेकिन उसके लिए भी बाजार उपलब्ध नही हो पाया। नतीजा यह रहा कि नए किसानों के द्वारा इसे अपनाना तो दूर की बात कृषि विभाग के प्रयोग का हिस्सा रहने वाले किसानों ने भी इससे मुंह मोड़ लिया है।
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हालात ऐसे है कि बरसात पर आश्रित इस क्षेत्र में अब अच्छी बारिश होने के बाद भी बरसात के कोई मायने नहीं रहे हैं। चाहे कितनी भी अच्छी बरसात हो क्षेत्र के किसानों के खेत खाली ही रहते हैं। जबकि एक दशक पूर्व की बात की जाए तो इलाके में बरसात समय पर और अच्छी हो तो किसानों के चेहरे पर रौनक ले आती थी। इस दौरान किसान खेतों में खून पसीना बहाकर दिन रात मेहनत करते हैं, ताकि अच्छी फसल हो और परिवार का जीवन यापन हो सके।
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फसल न होने से इलाके से युवा कर रहे हैं पलायन
इलाके में खेती के लाभकारी न रहने का सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ रहा है। जो रोजी-रोटी के लिए मजबूर होकर देश के अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं। इलाके के लोगों के मुताबिक अगर यह सिलसिला जारी रहा तो भविष्य में जो लोग रोजी-रोटी के लिए अभी बाहर गए हैं वह अपने परिवारों सहित इस इलाके को छोड़ सकते हैं।
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अब जड़ में होने वाली फसलों को मिल रही है प्राथमिकता
कभी मक्की, गेहूं, तिल और चना की अच्छी पैदावार करने वाले इलाके में अब किसानों ने जड़ में होने वाली फसलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। जिसमें आलू, हल्दी, अदरक, शकरकंदी जैसी फसलों को लगाने का प्रचलन शुरू हो रहा है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक चरण में है। क्योंकि क्षेत्र किसान अब नए प्रयोग करने से पहले नई फसलों का भविष्य देखना चाह रहे हैं।
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कोट
क्षेत्र में बंदरों से फसलों का नुकसान इतना ज्यादा है कि इलाके 70 प्रतिशत किसानों ने खेती छोड़ दी है। इस नुकसान से बचने के लिए कृषि विभाग के सुझाव के बाद पांच कनाल भूमि पर लेमनग्रास की खेती की थी। लेकिन तीन साल तक उसका कोई खरीददार न मिलने के बाद पूरी फसल को खुद ही खत्म करना पड़ा। क्योंकि लगातार उसका बढ़ता क्षेत्रफल आसपास की जमीन को भी बंजर बना रहा था।
-भोली सिंह जसरोटिया, किसान सहार
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कृषि विभाग के कहने पर एक कनाल के करीब भूमि पर अरंडी की फसल लगाई थी। जिस समय बीज रोपे गए थे तब विभाग द्वारा इसके कई प्रकार के लाभ बताए गए थे। लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम नही आया। जिसके कारण फसल को हटा देना पड़ा।
-अशोक शर्मा, किसान
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कंडी क्षेत्र में बंदरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने के बाद विभाग ने प्रायोगिक तौर पर एलोवेरा से लेकर लेमनग्रास और अरंडी की खेती करवाई थी। लेकिन किन्ही कारणों से वह इतनी सफल नहीं हो पाई है। अब किसानों को रूट बेस्ड फसलों की ओर मोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें आलू, हल्दी, अदरक जैसी फसल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके परिणाम बेहतर मिल रहे हैं।
-मुरारी डीगरा, जिला कृषि अधिकारी एक्सटेंशन
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दरअसल लखनपुर से लेकर जिले की अंतिम सीमा कूटा तक फैले इस क्षेत्र में बंदरों के बढ़ते उत्पात से पिछले 8-10 साल से खेती का सिलसिला बंद होता जा रहा है। हालांकि पहले इस क्षेत्र में गेहूं, मक्की, चना, तिल व उड़द की खेती से किसानों की अच्छी खासी आय होती थी। इसमें वह अपने परिवार के पालन पोषण के अलावा अन्य खर्चों को पूरे करते थे। लेकिन बंदरों की बढ़ती तादाद से सैकड़ों कनाल जमीन कई सालों से खाली पड़ी है। बंदर अब लोगों के घरों में आकर आंगन में लगी सब्जियों को भी उजाड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे।
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समस्या के समाधान के लिए कृषि विभाग ने इस अवधि के दौरान कंडी क्षेत्र में लेमन ग्रास, एलोवेरा और अरंडी की प्रायोगिक खेती शुरू करवाई। लेकिन उसके लिए भी बाजार उपलब्ध नही हो पाया। नतीजा यह रहा कि नए किसानों के द्वारा इसे अपनाना तो दूर की बात कृषि विभाग के प्रयोग का हिस्सा रहने वाले किसानों ने भी इससे मुंह मोड़ लिया है।
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हालात ऐसे है कि बरसात पर आश्रित इस क्षेत्र में अब अच्छी बारिश होने के बाद भी बरसात के कोई मायने नहीं रहे हैं। चाहे कितनी भी अच्छी बरसात हो क्षेत्र के किसानों के खेत खाली ही रहते हैं। जबकि एक दशक पूर्व की बात की जाए तो इलाके में बरसात समय पर और अच्छी हो तो किसानों के चेहरे पर रौनक ले आती थी। इस दौरान किसान खेतों में खून पसीना बहाकर दिन रात मेहनत करते हैं, ताकि अच्छी फसल हो और परिवार का जीवन यापन हो सके।
फसल न होने से इलाके से युवा कर रहे हैं पलायन
इलाके में खेती के लाभकारी न रहने का सबसे ज्यादा असर युवाओं पर पड़ रहा है। जो रोजी-रोटी के लिए मजबूर होकर देश के अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं। इलाके के लोगों के मुताबिक अगर यह सिलसिला जारी रहा तो भविष्य में जो लोग रोजी-रोटी के लिए अभी बाहर गए हैं वह अपने परिवारों सहित इस इलाके को छोड़ सकते हैं।
अब जड़ में होने वाली फसलों को मिल रही है प्राथमिकता
कभी मक्की, गेहूं, तिल और चना की अच्छी पैदावार करने वाले इलाके में अब किसानों ने जड़ में होने वाली फसलों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। जिसमें आलू, हल्दी, अदरक, शकरकंदी जैसी फसलों को लगाने का प्रचलन शुरू हो रहा है। हालांकि यह अभी प्रारंभिक चरण में है। क्योंकि क्षेत्र किसान अब नए प्रयोग करने से पहले नई फसलों का भविष्य देखना चाह रहे हैं।
कोट
क्षेत्र में बंदरों से फसलों का नुकसान इतना ज्यादा है कि इलाके 70 प्रतिशत किसानों ने खेती छोड़ दी है। इस नुकसान से बचने के लिए कृषि विभाग के सुझाव के बाद पांच कनाल भूमि पर लेमनग्रास की खेती की थी। लेकिन तीन साल तक उसका कोई खरीददार न मिलने के बाद पूरी फसल को खुद ही खत्म करना पड़ा। क्योंकि लगातार उसका बढ़ता क्षेत्रफल आसपास की जमीन को भी बंजर बना रहा था।
-भोली सिंह जसरोटिया, किसान सहार
कृषि विभाग के कहने पर एक कनाल के करीब भूमि पर अरंडी की फसल लगाई थी। जिस समय बीज रोपे गए थे तब विभाग द्वारा इसके कई प्रकार के लाभ बताए गए थे। लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम नही आया। जिसके कारण फसल को हटा देना पड़ा।
-अशोक शर्मा, किसान
कंडी क्षेत्र में बंदरों द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने के बाद विभाग ने प्रायोगिक तौर पर एलोवेरा से लेकर लेमनग्रास और अरंडी की खेती करवाई थी। लेकिन किन्ही कारणों से वह इतनी सफल नहीं हो पाई है। अब किसानों को रूट बेस्ड फसलों की ओर मोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें आलू, हल्दी, अदरक जैसी फसल को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके परिणाम बेहतर मिल रहे हैं।
-मुरारी डीगरा, जिला कृषि अधिकारी एक्सटेंशन