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Kathua News: नौकरी नहीं मिली तो फूलों की खेती से महकाया भविष्य
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संवाद न्यूज एजेंसी
बनी। सीमित संसाधनों और रोजगार के अभाव के बीच पहाड़ी उपमंडल बनी के युवा सतीश शर्मा ने फूलों की खेती में सफलता की इबादत लिखी है। एमए और बीएड करने के बाद सरकारी नौकरी के इंतजार में समय गंवाने के बजाय उन्होंने फूलों की व्यावसायिक खेती (फ्लोरीकल्चर) की राह चुनी। आज उनकी यह पहल युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडी और विपणन व्यवस्था न होने के कारण यह सफलता दूरदराज के बाजारों और परिवहन की भारी चुनौतियों से जूझ रही है।
नौकरी के प्रयास विफल होने के बाद सतीश ने शुरुआत में घर के पास सब्जियां और फल उगाए, लेकिन उन्होंने जल्द ही फूलों की खेती शुरू की। पिछले तीन वर्षों से वह महज एक कनाल जमीन पर मैरीगोल्ड (गेंदा) और नारंगी किस्म के फूलों की सफल पैदावार कर रहे हैं। इस उद्यम से उन्हें सामान्य दिनों में 8,000 से 10,000 रुपये प्रति माह की आय हो रही है। नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे धार्मिक पर्वों पर जब मंदिरों और सजावट के लिए मांग बढ़ती है, तब गेंदे के दाम 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाते हैं। सामान्य दिनों में भी वह रोजाना 2 से 3 किलो फूल बेच लेते हैं। वहीं, बनी में स्थानीय पुष्प मंडी का न होना एक बड़ी समस्या है। फूल बेहद संवेदनशील उपज हैं, जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इस कारण किसानों को अपनी उपज लेकर 150 से 170 किलोमीटर दूर कठुआ और पड़ोसी राज्य पंजाब के पठानकोट की मंडियों का रुख करना पड़ता है। पहाड़ी रास्तों पर लंबी दूरी तय करने में समय तो बर्बाद होता ही है, साथ ही परिवहन खर्च से किसानों के मुनाफे कम हो जाता है। इसके अलावा अचानक आने वाले तूफान और मौसम की मार से नाजुक फसल को नुकसान का जोखिम हमेशा बना रहता है।
कटरा और जम्मू तक पहुंच के लिए मिले सरकारी वाहन की सुविधा
बनी की आबोहवा फूलों की खेती के लिए बेहद मुफीद है, लेकिन बाजार तक सीधी पहुंच के बिना युवा इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कदम बढ़ाने से हिचक रहे हैं। सतीश शर्मा ने कृषि व बागवानी विभाग से फूल उत्पादकों के लिए विशेष परिवहन व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि माता वैष्णो देवी के आधार शिविर कटरा और जम्मू में फूलों की साल भर भारी मांग रहती है। यदि विभाग की ओर से सप्ताह में नियमित अंतराल पर कम से कम तीन क्विंटल उपज ढोने के लिए सरकारी या रियायती वाहन उपलब्ध कराया जाए, तो पहाड़ी क्षेत्र के किसानों को सीधा बड़ा बाजार मिल सकेगा। पूर्व में जिले में संचालित परिवहन योजना को पुनर्जीवित करने से न केवल किसानों की आय दोगुनी हो सकती है, बल्कि यह क्षेत्र फ्लोरीकल्चर हब के रूप में भी उभर सकता है।
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बनी। सीमित संसाधनों और रोजगार के अभाव के बीच पहाड़ी उपमंडल बनी के युवा सतीश शर्मा ने फूलों की खेती में सफलता की इबादत लिखी है। एमए और बीएड करने के बाद सरकारी नौकरी के इंतजार में समय गंवाने के बजाय उन्होंने फूलों की व्यावसायिक खेती (फ्लोरीकल्चर) की राह चुनी। आज उनकी यह पहल युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी है, लेकिन स्थानीय स्तर पर मंडी और विपणन व्यवस्था न होने के कारण यह सफलता दूरदराज के बाजारों और परिवहन की भारी चुनौतियों से जूझ रही है।
नौकरी के प्रयास विफल होने के बाद सतीश ने शुरुआत में घर के पास सब्जियां और फल उगाए, लेकिन उन्होंने जल्द ही फूलों की खेती शुरू की। पिछले तीन वर्षों से वह महज एक कनाल जमीन पर मैरीगोल्ड (गेंदा) और नारंगी किस्म के फूलों की सफल पैदावार कर रहे हैं। इस उद्यम से उन्हें सामान्य दिनों में 8,000 से 10,000 रुपये प्रति माह की आय हो रही है। नवरात्र, दशहरा और दीपावली जैसे धार्मिक पर्वों पर जब मंदिरों और सजावट के लिए मांग बढ़ती है, तब गेंदे के दाम 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाते हैं। सामान्य दिनों में भी वह रोजाना 2 से 3 किलो फूल बेच लेते हैं। वहीं, बनी में स्थानीय पुष्प मंडी का न होना एक बड़ी समस्या है। फूल बेहद संवेदनशील उपज हैं, जिन्हें लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इस कारण किसानों को अपनी उपज लेकर 150 से 170 किलोमीटर दूर कठुआ और पड़ोसी राज्य पंजाब के पठानकोट की मंडियों का रुख करना पड़ता है। पहाड़ी रास्तों पर लंबी दूरी तय करने में समय तो बर्बाद होता ही है, साथ ही परिवहन खर्च से किसानों के मुनाफे कम हो जाता है। इसके अलावा अचानक आने वाले तूफान और मौसम की मार से नाजुक फसल को नुकसान का जोखिम हमेशा बना रहता है।
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कटरा और जम्मू तक पहुंच के लिए मिले सरकारी वाहन की सुविधा
बनी की आबोहवा फूलों की खेती के लिए बेहद मुफीद है, लेकिन बाजार तक सीधी पहुंच के बिना युवा इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर कदम बढ़ाने से हिचक रहे हैं। सतीश शर्मा ने कृषि व बागवानी विभाग से फूल उत्पादकों के लिए विशेष परिवहन व्यवस्था बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि माता वैष्णो देवी के आधार शिविर कटरा और जम्मू में फूलों की साल भर भारी मांग रहती है। यदि विभाग की ओर से सप्ताह में नियमित अंतराल पर कम से कम तीन क्विंटल उपज ढोने के लिए सरकारी या रियायती वाहन उपलब्ध कराया जाए, तो पहाड़ी क्षेत्र के किसानों को सीधा बड़ा बाजार मिल सकेगा। पूर्व में जिले में संचालित परिवहन योजना को पुनर्जीवित करने से न केवल किसानों की आय दोगुनी हो सकती है, बल्कि यह क्षेत्र फ्लोरीकल्चर हब के रूप में भी उभर सकता है।
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