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Kathua News: त्योहारी सीजन में दूसरे राज्यों की लैब पर टिकी खाद्य नमूनों की जांच
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जम्मू और श्रीनगर की सरकारी प्रयोगशालाओं में उन्नत परीक्षण का दायरा बेहद सीमित
सभी जिलों से प्रतिमाह भेजे जा रहे हैं औसतन 1000 से ज्यादा सैंपल
सब्सिडी के बावजूद एक सैंपल पर सात से 20 हजार रुपये तक होते हैं खर्च
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। त्योहारी सीजन में जब बाजार मावे, मिठाइयों, खाद्य तेल और बेकरी उत्पादों से पटे पड़े हैं, तब जम्मू-कश्मीर में खाद्य सुरक्षा जांच व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हो रही हैं। प्रदेश की दोनों प्रमुख और आधिकारिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं (जम्मू और श्रीनगर) अपने बेहद सीमित परीक्षण दायरे (लो स्कोप) और तकनीकी रुकावटों के कारण अधिकांश महत्वपूर्ण जांच करने में असमर्थ साबित हो रही हैं। खाद्य पदार्थों के नमूनों को मुकम्मल रासायनिक और माइक्रोबायोलॉजिकल जांच के लिए अन्य राज्यों की मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में भेजा जा रहा है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर हर महीने करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के दिशा-निर्देशों के तहत प्रदेश के सभी 20 जिलों में तैनात प्रवर्तन टीमें त्योहारी सीजन में औसतन 50 से ज्यादा सैंपल प्रतिमाह एकत्र कर रही हैं। इस प्रकार हर महीने लगभग एक हजार से ज्यादा सैंपलों को विस्तृत जांच के लिए बाहरी राज्यों की नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (एनएबीएल) प्रमाणित और रेफरल लैब्स में भेजा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सरकारी सब्सिडी मिलने के बावजूद बाहरी लैब्स में एक सैंपल की व्यापक जांच पर सात से लेकर 20 हजार रुपये तक का खर्च आ रहा है। भोजन में अनिवार्य रूप से इस्तेमाल होने वाले साधारण नमक की मानक जांच पर ही विभाग को प्रति सैंपल करीब 10 हजार रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त खाद्य तेल, दूध उत्पाद, पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर, मल्टीविटामिन सप्लीमेंट्स और अल्कोहल युक्त उत्पादों के उन्नत परीक्षण बेहद महंगे साबित हो रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया पर हर महीने सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये केवल बाहरी जांच शुल्कों के भुगतान में खर्च हो रहे हैं।
करोड़ों खर्च कर आधुनिक परीक्षण उपकरण स्थापित किए गए
जम्मू और श्रीनगर की प्रयोगशालाओं के बुनियादी ढांचे और आधुनिकीकरण पर विगत वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च कर आधुनिक परीक्षण उपकरण स्थापित किए गए थे। इसके बावजूद मान्यता प्राप्त जांच मापदंडों (स्कोप ऑफ टेस्टिंग) का दायरा न बढ़ाए जाने, जरूरी केमिकल्स, रीजेंट्स और विशेषज्ञ तकनीकी मैनपावर की कमी के कारण यह लैब्स हाई-एंड टेस्टिंग के लिए सक्षम नहीं बन सकी हैं। स्थानीय स्तर पर इन प्रयोगशालाओं के परीक्षण दायरे का विस्तार करने और उनकी मान्यता को सुदृढ़ करने पर ध्यान न दिए जाने से विभाग की निर्भरता पूरी तरह बाहरी राज्यों पर बनी हुई है। हैरत की बात है कि बीते साल भी त्योहारों के सीजन में प्रदेश की लैब की मान्यता का अभाव में नतीजों के लिए प्रदेश के बाहर की लैब पर ही निर्भरता थी।
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सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई सैंपलिंग
खाद्य सुरक्षा अधिनियम की मूल भावना यह है कि दूषित और मिलावटी खाद्य पदार्थों की तुरंत पहचान कर उन्हें बाजार से जब्त किया जाए ताकि आम नागरिकों की सेहत को नुकसान न पहुंचे। स्थानीय स्तर पर संपूर्ण जांच व्यवस्था होने पर प्राथमिक रिपोर्ट दो से तीन दिनों के भीतर मिल सकती है, लेकिन बाहरी राज्यों से रिपोर्ट आने में कई हफ्तों से लेकर महीनों तक का वक्त लग रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि जब तक रिपोर्ट आती है, तब तक त्योहारी सीजन समाप्त हो चुका होता है और संदिग्ध मावा व अन्य मिठाइयां उपभोक्ता खरीद चुके होते हैं। ऐसे में प्रवर्तन टीमों की ओर से की जा रही सैंपलिंग केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाती है।
दूध और उससे बने उत्पादों की सैंपलिंग के साथ-साथ खाद्य तेल की गुणवत्ता परखने के लिए बाजारों में विभाग का सघन अभियान लगातार जारी है। मिलावट के नतीजे खराब या अमानक आने पर संबंधित फर्मों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाती है। हाल ही में लाल मिर्च और इससे पहले एक कंपनी के सॉस पर प्रतिबंध का आदेश इसी प्रक्रिया के तहत जारी किया गया है। जहां तक ज्यादातर सैंपलों को बाहर भेजने का विषय है, जम्मू-कश्मीर की प्रयोगशालाओं में टेस्टिंग का स्कोप (दायरा) फिलहाल अधिक नहीं है, जिसके कारण सटीक और उन्नत जांच रिपोर्ट के लिए बाहरी लैब्स पर निर्भर रहना पड़ता है।
संजीव कुमार, संयुक्त आयुक्त, खाद्य सुरक्षा
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सभी जिलों से प्रतिमाह भेजे जा रहे हैं औसतन 1000 से ज्यादा सैंपल
सब्सिडी के बावजूद एक सैंपल पर सात से 20 हजार रुपये तक होते हैं खर्च
संवाद न्यूज एजेंसी
कठुआ। त्योहारी सीजन में जब बाजार मावे, मिठाइयों, खाद्य तेल और बेकरी उत्पादों से पटे पड़े हैं, तब जम्मू-कश्मीर में खाद्य सुरक्षा जांच व्यवस्था की गंभीर खामियां उजागर हो रही हैं। प्रदेश की दोनों प्रमुख और आधिकारिक खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाएं (जम्मू और श्रीनगर) अपने बेहद सीमित परीक्षण दायरे (लो स्कोप) और तकनीकी रुकावटों के कारण अधिकांश महत्वपूर्ण जांच करने में असमर्थ साबित हो रही हैं। खाद्य पदार्थों के नमूनों को मुकम्मल रासायनिक और माइक्रोबायोलॉजिकल जांच के लिए अन्य राज्यों की मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में भेजा जा रहा है। इससे न केवल सरकारी खजाने पर हर महीने करोड़ों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के दिशा-निर्देशों के तहत प्रदेश के सभी 20 जिलों में तैनात प्रवर्तन टीमें त्योहारी सीजन में औसतन 50 से ज्यादा सैंपल प्रतिमाह एकत्र कर रही हैं। इस प्रकार हर महीने लगभग एक हजार से ज्यादा सैंपलों को विस्तृत जांच के लिए बाहरी राज्यों की नेशनल एक्रीडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेटरीज (एनएबीएल) प्रमाणित और रेफरल लैब्स में भेजा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, सरकारी सब्सिडी मिलने के बावजूद बाहरी लैब्स में एक सैंपल की व्यापक जांच पर सात से लेकर 20 हजार रुपये तक का खर्च आ रहा है। भोजन में अनिवार्य रूप से इस्तेमाल होने वाले साधारण नमक की मानक जांच पर ही विभाग को प्रति सैंपल करीब 10 हजार रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। इसके अतिरिक्त खाद्य तेल, दूध उत्पाद, पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर, मल्टीविटामिन सप्लीमेंट्स और अल्कोहल युक्त उत्पादों के उन्नत परीक्षण बेहद महंगे साबित हो रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया पर हर महीने सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये केवल बाहरी जांच शुल्कों के भुगतान में खर्च हो रहे हैं।
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करोड़ों खर्च कर आधुनिक परीक्षण उपकरण स्थापित किए गए
जम्मू और श्रीनगर की प्रयोगशालाओं के बुनियादी ढांचे और आधुनिकीकरण पर विगत वर्षों में करोड़ों रुपये खर्च कर आधुनिक परीक्षण उपकरण स्थापित किए गए थे। इसके बावजूद मान्यता प्राप्त जांच मापदंडों (स्कोप ऑफ टेस्टिंग) का दायरा न बढ़ाए जाने, जरूरी केमिकल्स, रीजेंट्स और विशेषज्ञ तकनीकी मैनपावर की कमी के कारण यह लैब्स हाई-एंड टेस्टिंग के लिए सक्षम नहीं बन सकी हैं। स्थानीय स्तर पर इन प्रयोगशालाओं के परीक्षण दायरे का विस्तार करने और उनकी मान्यता को सुदृढ़ करने पर ध्यान न दिए जाने से विभाग की निर्भरता पूरी तरह बाहरी राज्यों पर बनी हुई है। हैरत की बात है कि बीते साल भी त्योहारों के सीजन में प्रदेश की लैब की मान्यता का अभाव में नतीजों के लिए प्रदेश के बाहर की लैब पर ही निर्भरता थी।
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सिर्फ कागजी खानापूर्ति बनकर रह गई सैंपलिंग
खाद्य सुरक्षा अधिनियम की मूल भावना यह है कि दूषित और मिलावटी खाद्य पदार्थों की तुरंत पहचान कर उन्हें बाजार से जब्त किया जाए ताकि आम नागरिकों की सेहत को नुकसान न पहुंचे। स्थानीय स्तर पर संपूर्ण जांच व्यवस्था होने पर प्राथमिक रिपोर्ट दो से तीन दिनों के भीतर मिल सकती है, लेकिन बाहरी राज्यों से रिपोर्ट आने में कई हफ्तों से लेकर महीनों तक का वक्त लग रहा है। इसका दुष्परिणाम यह है कि जब तक रिपोर्ट आती है, तब तक त्योहारी सीजन समाप्त हो चुका होता है और संदिग्ध मावा व अन्य मिठाइयां उपभोक्ता खरीद चुके होते हैं। ऐसे में प्रवर्तन टीमों की ओर से की जा रही सैंपलिंग केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह जाती है।
दूध और उससे बने उत्पादों की सैंपलिंग के साथ-साथ खाद्य तेल की गुणवत्ता परखने के लिए बाजारों में विभाग का सघन अभियान लगातार जारी है। मिलावट के नतीजे खराब या अमानक आने पर संबंधित फर्मों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाती है। हाल ही में लाल मिर्च और इससे पहले एक कंपनी के सॉस पर प्रतिबंध का आदेश इसी प्रक्रिया के तहत जारी किया गया है। जहां तक ज्यादातर सैंपलों को बाहर भेजने का विषय है, जम्मू-कश्मीर की प्रयोगशालाओं में टेस्टिंग का स्कोप (दायरा) फिलहाल अधिक नहीं है, जिसके कारण सटीक और उन्नत जांच रिपोर्ट के लिए बाहरी लैब्स पर निर्भर रहना पड़ता है।
संजीव कुमार, संयुक्त आयुक्त, खाद्य सुरक्षा