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Kathua News: पूरी तरह से सक्रिय होगा मछली पालन केंद्र
Wed, 11 Jun 2025 02:40 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
संवाद न्यूज एजेंसी, कठुआ
Updated Wed, 11 Jun 2025 02:40 AM IST
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खुड़वा में मछलीपालन विभाग का ट्राउट मछली पालन केंद्र।
साहिल खजूरिया
कठुआ। ट्राउट प्रजाति की मछली बर्फीले ताजे पानी में ही रह सकती है। इसे पालने के लिए लोवांग से सटे बनी उपप्रभाग के खुड़वा इलाके में बनाया गया मछली पालन केंद्र उपेक्षित है। अब इसे 16 लाख रुपये की लागत से सुधारा जाएगा। इसके तहत बंद पड़े जलक्षेत्र (रेसवे) समेत कर्मचारी आवासों की मरम्मत के साथ जलधाराओं का भी सुधार कार्य किया जाएगा।
बनी-भद्रवाह मार्ग से सटा मत्स्य पालन विभाग का यह ट्राउट मछली पालन केंद्र मछली के शौकीन लोगों को आकर्षित करता रहा है। सरथल और भद्रवाह की ओर जाने वाले पर्यटक भी यहां आकर इस मछली पालन से संबंधित जानकारी लेते रहे हैं।
इसके बावजूद लंबे समय से इस मछली पालन केंद्र की मरम्मत नहीं हो सकी। इस कारण इस्तेमाल में नहीं आ पा रहे तीन जोड़ी रेसवे भी खराब हो गए हैं।विभाग के सहायक निदेशक पवन पाल शर्मा ने बताया कि मत्स्य विभाग मछली पालन को बढ़ावा दे रहा है।
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अब इस फार्म की मरम्मत की तैयारी है। इसके लिए सरकार से 16 लाख रुपये मंजूर हुए हैं। अब इस फार्म में कर्मचारी आवास बनाए जाएंगे। रेसवे की मरम्मत करने के साथ ही पानी की नहरों को भी ठीक किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर में वर्ष 1899 में लाई गई थी पहली ट्राउट
जम्मू कश्मीर में ओवा ट्राउट मछली के बीज को सबसे पहले वर्ष 1899 में लाया गया, लेकिन तब हवाई यातायात की उपलब्धता न होने से पहला बीज सफल प्रयोग में नहीं लाया जा सका। इसके बाद 19 दिसंबर, 1900 को लाई गई ट्राउट का पालन कश्मीर के दच्छीगाम में किया गया। वर्ष 1901 में कश्मीर के बाहरी इलाके हरवन में पहली ट्राउट हैचरी खोली गई। यूनाइटेड किंगडम से मंगवाई गई इस मछली को राज्य में उपयुक्त माहौल मिला। यूरोपियन संघ के सहयोग से कश्मीर के कोकरनाग में दो दशकों में इसे व्यापक स्तर पर तैयार किया जाता है। विभाग की ओर से लारीबल और कठुआ जिले के लोवांग से सटे खुड़वा में भी ट्राउट का पालन किया जा रहा है। प्रदेश में पैदा की जाने वाली ट्राउट में रेनबो ट्राउट और ब्राउन ट्राउट प्रमुख हैं। हॉलैंड से मंगवाई गई ट्राउट फीड से इस मछली के संरक्षण में सहायता मिली है।
जम्मू, कठुआ और पठानकोट तक है ट्राउट की मांग
बनी क्षेत्र के इस सरकारी मछली फार्म में करीब दो महीने पहले ही ट्राउट प्रजाति के 18,00 मत्स्य बीज डाले गए हैं। यह ट्राउट मछली इसी साल के अंत तक बिक्री के योग्य भी हो जाएगी। बनी और आसपास के स्थानीय बाजार में इस महंगी मछली की अधिक मांग नहीं है, जबकि जम्मू और पठानकोट के होटलों में यह मछली हाथोंहाथ बिकती है। वहां दाम भी अच्छे मिलते हैं। इसलिए मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी जम्मू और पठानकोट में व्यापारियों से भी संपर्क कर रहे हैं।
विभाग ने स्थानीय युवाओं को दिलाए रोजगार के अवसर
दुनिया में बेहतरीन मछलियों में शुमार ट्राउट मछली लजीज व्यंजनों की शान है। इसने जिले को खास पहचान दिलाई है। विभाग ने कई लोगों को रोजगार के अवसर भी दिलाए हैं। इस कारण कई युवाओं का रुझान मछली पालन की ओर बढ़ा है। विभाग के सहायक निदेशक पवन पाल शर्मा ने बताया कि ट्राउट पालन को व्यवसाय के रूप में शुरू कर आय भी बढ़ा सकते हैं। विभाग ने स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर भी दिए हैं। उन्होंने बताया कि बनी में पिछले कुछ वर्षों में अब करीब आधा दर्जन ट्राउट फार्म सक्रिय हुए हैं।
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कठुआ। ट्राउट प्रजाति की मछली बर्फीले ताजे पानी में ही रह सकती है। इसे पालने के लिए लोवांग से सटे बनी उपप्रभाग के खुड़वा इलाके में बनाया गया मछली पालन केंद्र उपेक्षित है। अब इसे 16 लाख रुपये की लागत से सुधारा जाएगा। इसके तहत बंद पड़े जलक्षेत्र (रेसवे) समेत कर्मचारी आवासों की मरम्मत के साथ जलधाराओं का भी सुधार कार्य किया जाएगा।
बनी-भद्रवाह मार्ग से सटा मत्स्य पालन विभाग का यह ट्राउट मछली पालन केंद्र मछली के शौकीन लोगों को आकर्षित करता रहा है। सरथल और भद्रवाह की ओर जाने वाले पर्यटक भी यहां आकर इस मछली पालन से संबंधित जानकारी लेते रहे हैं।
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इसके बावजूद लंबे समय से इस मछली पालन केंद्र की मरम्मत नहीं हो सकी। इस कारण इस्तेमाल में नहीं आ पा रहे तीन जोड़ी रेसवे भी खराब हो गए हैं।विभाग के सहायक निदेशक पवन पाल शर्मा ने बताया कि मत्स्य विभाग मछली पालन को बढ़ावा दे रहा है।
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अब इस फार्म की मरम्मत की तैयारी है। इसके लिए सरकार से 16 लाख रुपये मंजूर हुए हैं। अब इस फार्म में कर्मचारी आवास बनाए जाएंगे। रेसवे की मरम्मत करने के साथ ही पानी की नहरों को भी ठीक किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर में वर्ष 1899 में लाई गई थी पहली ट्राउट
जम्मू कश्मीर में ओवा ट्राउट मछली के बीज को सबसे पहले वर्ष 1899 में लाया गया, लेकिन तब हवाई यातायात की उपलब्धता न होने से पहला बीज सफल प्रयोग में नहीं लाया जा सका। इसके बाद 19 दिसंबर, 1900 को लाई गई ट्राउट का पालन कश्मीर के दच्छीगाम में किया गया। वर्ष 1901 में कश्मीर के बाहरी इलाके हरवन में पहली ट्राउट हैचरी खोली गई। यूनाइटेड किंगडम से मंगवाई गई इस मछली को राज्य में उपयुक्त माहौल मिला। यूरोपियन संघ के सहयोग से कश्मीर के कोकरनाग में दो दशकों में इसे व्यापक स्तर पर तैयार किया जाता है। विभाग की ओर से लारीबल और कठुआ जिले के लोवांग से सटे खुड़वा में भी ट्राउट का पालन किया जा रहा है। प्रदेश में पैदा की जाने वाली ट्राउट में रेनबो ट्राउट और ब्राउन ट्राउट प्रमुख हैं। हॉलैंड से मंगवाई गई ट्राउट फीड से इस मछली के संरक्षण में सहायता मिली है।
जम्मू, कठुआ और पठानकोट तक है ट्राउट की मांग
बनी क्षेत्र के इस सरकारी मछली फार्म में करीब दो महीने पहले ही ट्राउट प्रजाति के 18,00 मत्स्य बीज डाले गए हैं। यह ट्राउट मछली इसी साल के अंत तक बिक्री के योग्य भी हो जाएगी। बनी और आसपास के स्थानीय बाजार में इस महंगी मछली की अधिक मांग नहीं है, जबकि जम्मू और पठानकोट के होटलों में यह मछली हाथोंहाथ बिकती है। वहां दाम भी अच्छे मिलते हैं। इसलिए मत्स्य पालन विभाग के अधिकारी जम्मू और पठानकोट में व्यापारियों से भी संपर्क कर रहे हैं।
विभाग ने स्थानीय युवाओं को दिलाए रोजगार के अवसर
दुनिया में बेहतरीन मछलियों में शुमार ट्राउट मछली लजीज व्यंजनों की शान है। इसने जिले को खास पहचान दिलाई है। विभाग ने कई लोगों को रोजगार के अवसर भी दिलाए हैं। इस कारण कई युवाओं का रुझान मछली पालन की ओर बढ़ा है। विभाग के सहायक निदेशक पवन पाल शर्मा ने बताया कि ट्राउट पालन को व्यवसाय के रूप में शुरू कर आय भी बढ़ा सकते हैं। विभाग ने स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर भी दिए हैं। उन्होंने बताया कि बनी में पिछले कुछ वर्षों में अब करीब आधा दर्जन ट्राउट फार्म सक्रिय हुए हैं।