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राजबाग थाने पर हमले को एक साल पूरा
अमर उजाला/कठुआ
Updated Sun, 20 Mar 2016 01:42 AM IST
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आतंकवादी
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भारत-पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय सीमा से लेकर हाईवे तक के इलाके को घुसपैठ और आतंकी हमलों के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। जिला कठुआ ने ढाई साल में तीन बड़े फिदायीन आतंकी हमलों को बर्दाश्त किया है। साल गुजरने के साथ दीवारों के जख्म को भर जाते हैं, लेकिन हमले से प्रभावित परिवारों केे जख्म ताउम्र नहीं भरते।
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ठीक एक साल पहले राजबाग थाने पर हुए आतंकी हमले के निशां तो थाने की दीवारों से गायब हो चुके हैं, लेकिन आज भी हाईवे से सटे इस थाने के सामने से गुजरने वाले हर व्यक्ति के जेहन में हमले के दौरान का वाकया हरा हो जाता है। राजबाग थाने पर बीस मार्च 2015 की सुबह आतंकियों ने हमला कर दिया था जिसमें दो सीआरपीएफ कर्मियों के साथ साथ एक पुलिसकर्मी और दो आम नागरिक शहीद हो गए थे। वहीं पुलिस के दो और सीआरपीएफ के सात जवान घायल हुए थे।
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26 सितंबर 2013 को हीरानगर थाने पर हमले से शुरू हुई आतंकियों के नापाक मंसूबों की दास्तान ढ़ाई साल में पठानकोट एयरबेस पर जनवरी माह में हुए फिदायीन हमले तक पहुंच गई है। आतंकियों ने पहले के अपने पैटर्न को बदलते हुए ढाई साल पहले हीरानगर पुलिस थाने पर हमला किया जिसमें अंधाधुंध गोलीबारी करने और नृशंस हत्या करने के बाद उन्होंने सांबा सैन्य कैंप को भी निशाना बनाने की कोशिश की। इसमें एक सैन्य अफसर सहित पुलिस और सेना के आठ जवान व दो नागरिक मारे गए।
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इसके बाद 28 मार्च 2014 को आतंकियों ने एक बार फिर दियालाचक के पास से एक सवारी वाहन को हाईजैक किया। खूनी खेल को अंजाम देने के बाद आतंकियों ने जंगलोट सैन्य शिविर को निशाना बनाने का प्रयास किया। सेना ने शाम छह बजे ऑपरेशन पूरा कर दिया। इस हमले में एक जवान और दो नागरिक मारे गए। सेना की सतर्कता के चलते आतंकी सैन्य कैंप के भीतर घुसने में कामयाब नहीं हो पाए और उन्हें मौके पर ही ढेर कर दिया गया।
इसके बाद बीस मार्च 2015 को राजबाग थाने को निशाना बनाया गया। इसके ठीक अगले दिन इक्कीस मार्च 2015 को सांबा सैन्य शिविर को निशाने बनाने की कोशिश की गई। जिसके बाद गुरदासपुर पुलिस थाना और उसके कुछ ही महीने के भीतर पठानकोट एयरबेस आतंकियों का टागरेट बना।