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Kathua News: भगवान श्रीकृष्ण और रुकमणि का विवाह प्रसंग सुनाया
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कठुआ। शहर से सटे गांव गोविंदसर में जारी श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का समापन हो गया है। वीरवार को कथा के सातवें दिन कथा व्यास रोशन लाल शास्त्री ने भागवत कथा के महत्व को बताते हुए कहा कि जो भक्त श्रीकृष्ण रुकमणि के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं, उनकी वैवाहिक समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। वहीं अंत में भंडारे का आयोजन किया गया।
कथाव्यास ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि मन में उठते अशुभ विचार दूसरों से ईष्यों, घृणा, असंतोष, क्रोध, सदा शक करने वाला और पराये आसरे पर जीने वाला मनुष्य सदा दुःखी रहता है। इन दोषों से बचने का उपाय है कि जब क्रोध आए तो मुस्कराने लगे, जब कोई चिंता सताए तो चिंतन करने लगे, जब कोई बुरा विचार आए तो प्रभु नाम का स्मरण करने लगे और जब मन में कोई क्लेश की स्थिति बने, तब भूतकाल में घटित किसी सुखद और मनोरंजक घटना को याद करने लगे। यानी किसी भी उपाय से क्रोध, चिंता और क्लेश इत्यादि करने से बचते रहें। रोशन लाल शास्त्री ने कहा कि यह प्रकृति का नियम है कि आप जितना बोते हैं, उससे कई गुणा अधिक आपको मिलता है।
इसकी जीती-जागती मिसाल हमारे किसान हैं। वह यदि 50 किलो बीज खेतों में लगाते हैं तो उसकी फसल कई गुना अधिक होकर उन्हें वापस मिलती है। इसलिए याद रहे, संत हमेशा विश्व कल्याण के लिए लोगों में बांटते हैं। धर्म का ज्ञान इस जीवन में हमें वहीं लौटकर मिलता है, जो हम देते हैं, चाहे तत्काल मिले या कभी बाद में मिले। हमें आज जो भी मिल रहा है, वह हमारा ही दिया हुआ मिल रहा है, क्योंकि नियमानुसार बिना दिए यहां कुछ नहीं मिलता, इसीलिए हमें दूसरों को वैसा ही देना चाहिए जैसा हम खुद पाना चाहते हैं। अंत में उन्होंने समझाया कि यदि दुखों से वास्तव में बचना चाहते हो तो मन को दूषित न होने दें, वाणी से संयत रहे, मन में बुरे विचार न आने दें, बुरे काम न करें, सदा अच्छा आचरण ही करें तो फल दुःख हो ही नहीं सकता।
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आपके पास चाहे जितनी भी धन दौलत हो, कभी भी भगवान को न भूलें। ईश्वर की दी हुई धन दौलत से आप उसे खुश करने का प्रयास करते हैं, जबकि उसके प्रति आपको श्रद्धा और मानव कल्याण के लिए आपका व्यवहार ही उसके लिए सब कुछ है और इस पर भगवान प्रसन्न होते हैं।
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कथाव्यास ने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि मन में उठते अशुभ विचार दूसरों से ईष्यों, घृणा, असंतोष, क्रोध, सदा शक करने वाला और पराये आसरे पर जीने वाला मनुष्य सदा दुःखी रहता है। इन दोषों से बचने का उपाय है कि जब क्रोध आए तो मुस्कराने लगे, जब कोई चिंता सताए तो चिंतन करने लगे, जब कोई बुरा विचार आए तो प्रभु नाम का स्मरण करने लगे और जब मन में कोई क्लेश की स्थिति बने, तब भूतकाल में घटित किसी सुखद और मनोरंजक घटना को याद करने लगे। यानी किसी भी उपाय से क्रोध, चिंता और क्लेश इत्यादि करने से बचते रहें। रोशन लाल शास्त्री ने कहा कि यह प्रकृति का नियम है कि आप जितना बोते हैं, उससे कई गुणा अधिक आपको मिलता है।
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इसकी जीती-जागती मिसाल हमारे किसान हैं। वह यदि 50 किलो बीज खेतों में लगाते हैं तो उसकी फसल कई गुना अधिक होकर उन्हें वापस मिलती है। इसलिए याद रहे, संत हमेशा विश्व कल्याण के लिए लोगों में बांटते हैं। धर्म का ज्ञान इस जीवन में हमें वहीं लौटकर मिलता है, जो हम देते हैं, चाहे तत्काल मिले या कभी बाद में मिले। हमें आज जो भी मिल रहा है, वह हमारा ही दिया हुआ मिल रहा है, क्योंकि नियमानुसार बिना दिए यहां कुछ नहीं मिलता, इसीलिए हमें दूसरों को वैसा ही देना चाहिए जैसा हम खुद पाना चाहते हैं। अंत में उन्होंने समझाया कि यदि दुखों से वास्तव में बचना चाहते हो तो मन को दूषित न होने दें, वाणी से संयत रहे, मन में बुरे विचार न आने दें, बुरे काम न करें, सदा अच्छा आचरण ही करें तो फल दुःख हो ही नहीं सकता।
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आपके पास चाहे जितनी भी धन दौलत हो, कभी भी भगवान को न भूलें। ईश्वर की दी हुई धन दौलत से आप उसे खुश करने का प्रयास करते हैं, जबकि उसके प्रति आपको श्रद्धा और मानव कल्याण के लिए आपका व्यवहार ही उसके लिए सब कुछ है और इस पर भगवान प्रसन्न होते हैं।