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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Kathua News ›   black morels found in lower altitude areas

निचले इलाकों में ब्लैक मॉरेल पनपने से वैज्ञानिक हैरान

Sun, 22 Nov 2015 01:07 AM IST
कठुआ/अमर उजाला ब्यूरो
कठुआ/अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 22 Nov 2015 01:07 AM IST
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इसे कुदरत का करिश्मा ही कहेंगे कि मॉरेल यानी की गुच्छी, जहां समुद्रतल से 2500 फीट से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पाई जाती रही है, पहली बार 1000 फीट की ऊंचाई पर पैदा होने लगी है।

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उल्लेखनीय है कि गुच्छी यानी ब्लैक मॉरेल को लैबोरेटरी में उगाने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने तमाम कोशिशें कीं, लेकिन उनको सफलता नहीं मिली। वहीं अब विपरीत परिस्थितियों और कम ऊंचाई वाले इलाकों में गुच्छियां पनपने से वैज्ञानिक हैरान हैं।
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आश्चर्यजनक बात यह है कि पिछले 40 वर्षों से कठुआ के रजानी में गुच्छियों का अस्तित्व है। इसका दुनिया भर के वैज्ञानिक अध्ययन भी कर चुके हैं। यहां 1700 सौ कनाल से भी अधिक भूमि पर गुच्छियों के बड़ी मात्रा में प्राकृतिक रूप से पनपने की बाकायदा लंदन की कॉमनवेल्थ माइक्रोलाजिकल इंस्टीट्यूट सूरेज ने भी पुष्टि की है।
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हालांकि इसके पीछे की वजहों पर वैज्ञानिक अभी तक पशोपेश में ही हैं। तीन दशक से ज्यादा समय से ब्लैक मॉरेल का अध्ययन करने वाले शोधकर्ता डॉ. केसी शर्मा के अनुसार दुनिया में अब तक यही माना जाता रहा है कि गुच्छियां एक जगह पर दो से तीन साल तक ही प्राकृतिक रूप से पनपती हैं।

ऐसे में एक ही जगह पिछले 40 वर्षों से गुच्छियों का पैदा होना आश्चर्यचकित करने वाला है। शहर से सटे भागथली के ग्रामीण इलाकों में गुच्छियां पनपने की सूचना मिलते ही वन विभाग और स्कॉस्ट जम्मू की उच्च स्तरीय टीम कठुआ पहुंची।

प्राथमिक जांच के दौरान स्कॉस्ट के वैज्ञानिकों और वन विभाग की टीम ने पाया कि इलाके में पाई जा रही गुच्छी दरअसल ब्लैक मॉरेल ही है। देवदार के घने जंगलों में ही प्राकृतिक तौर पर पाई जाने वाली गुच्छियाें के बेहद कम ऊंचाई वाले इलाके में पैदा होने से वैज्ञानिक हैरान हैं।

लजीज, जायकेदार और औषधीय गुणों से भरपूर ब्लैक मॉरल के मुरीद लोग दुनिया भर में हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत तीन से चार हजार रुपये प्रति किलो है। वन विभाग के अधिकारी बीएम शर्मा ने बताया कि कठुआ के ग्रामीण इलाके के खेतों में यह प्राकृतिक रूप से उपज रही है। वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह खाने योग्य है।

ब्लैक मारेल एक तरह से काला मशरूम है। शुद्ध शाकाहारी होने के बावजूद इसका स्वाद मांसाहार से कम नहीं होता। औषधीय गुणों से भरपूर इस उत्पाद को डुग्गर संस्कृति के राज भोज में अहम स्थान हासिल है। यह जनवरी से मार्च और बरसात के बाद के कुछ महीनों में पहाड़ी इलाकों में ही पैदा होती है।

लोग मानते हैं कि आसमानी बिजली की गड़गड़हाट के बीच देवदार के घने जंगलों में ब्लैक मारेल पैदा होती है। वन विभाग हर वर्ष बोली प्रक्रिया से इसे बेचने के लिए लाइसेंस जारी करता है। कठुआ जिले के बिलावर रेंज में गुच्छियों की उपलब्धता कम रहती है, लेकिन बनी और सदरोता में कई लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं।

मशरूम की तरह मारेल में भी विटामिन बी कांप्लेक्स, विटामिन डी और अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। लेकिन मारेल मशरूम में सीआईएस अमीनो एसिड विरले पाया जाता है।


पालीसैक्राइड एंटीवायरल, अमीनो रेग्यूलेटरी और ट्यूमर विरोधी तत्व पाए जाते हैं। मुख्य रूप से मारेल हृदय रोग और कोलेस्ट्राल रोकने में सहायक होते हैं। ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर के खतरे को कम करने के अद्भुत गुण मारेल में पाए जाते हैं।

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