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कोर्ट की टिप्पणी: मुठभेड़ में मारे गए आमिर का शव कब्र से निकालकर उसके पिता तक पहुंचाया जाए, J&K सरकार पर पांच लाख का जुर्माना

Fri, 27 May 2022 09:36 PM IST
Vikas Kumar संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू Published by: Vikas Kumar Updated Fri, 27 May 2022 09:36 PM IST
सार

कोर्ट ने कहा, यह साफ दिखता है कि हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए अल्ताफ अहमद भट और डॉ. मुदस्सिर गुल के शव इसलिए सौंप दिए गए क्योंकि लोगों और परिजनों ने दबाव बनाया। वहीं रामबन जिले के दूरदराज गांव के रहने वाले आमिर के पिता व रिश्तेदार चूंकि घाटी में ऐसा दबाव नहीं बना सकते थे, इसलिए उन्हें वंचित रखा गया।
 

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jammu kashmir high court orders exhuming of body of a youth dubbed as terrorist in hyderpora encounter
jammu kashmir high court - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

किसी अपने के शव का रीति रिवाज के साथ अंतिम संस्कार या उसे सुपुर्द-ए-खाक करने का हक संविधान में दिए गए जीने का अधिकार (अनुच्छेद-21) का हिस्सा है। आपने श्रीनगर में दबाव बनाने वालों को उनके अपनों के दो शव कब्र से निकाल कर दे दिए, लेकिन दूरदराज गांव में रहने वाले पिता को बेटे की आखिरी रस्मों से वंचित रखा। ये संविधान में शामिल समानता का अधिकार (अनुच्छेद-14) के विपरीत है। 

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इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट के न्यायाधीश संजीव कुमार ने जम्मू-कश्मीर सरकार को हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए आमिर का शव कब्र से निकालकर उसके पिता मोहम्मद लतीफ मागरे को रामबन की गूल तहसील के सेरीपुरा गांव में पहुंचाने का आदेश दिया। हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए चार लोगों में आमिर भी शामिल था।
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कोर्ट ने कहा कि कब्र में शव की स्थिति का अनुमान लगाते हुए आदेश दिया जाता है कि इस प्रक्रिया में जरा भी देरी न की जाए। यदि शव इस हाल में नहीं है कि उसे कुपवाड़ा से रामबन के गूल पहुंचाकर उससे जुड़ी अंतिम रस्में पूरी की जा सकें तो आमिर के पिता को सरकार कुपवाड़ा स्थित कब्रगाह ले जाए। उन्हें रीति रिवाज के साथ अंतिम रस्में निभाने दी जाएं। इस सूरत में सरकार को आमिर के पिता को बेटे की अंतिम रस्मों से वंचित रखने के लिए पांच लाख रुपये हर्जाना देना होगा।

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दबाव बनाने वालों की मानी, दूरदराज वाले को नहीं सुना

कोर्ट ने कहा, यह साफ दिखता है कि हैदरपोरा मुठभेड़ में मारे गए अल्ताफ अहमद भट और डॉ. मुदस्सिर गुल के शव इसलिए सौंप दिए गए क्योंकि लोगों और परिजनों ने दबाव बनाया। वहीं रामबन जिले के दूरदराज गांव के रहने वाले आमिर के पिता व रिश्तेदार चूंकि घाटी में ऐसा दबाव नहीं बना सकते थे, इसलिए उन्हें वंचित रखा गया।

कोर्ट ने कहा कि शव परिजनों को न सौंपे जाने के लिए सरकार ने कायदा कानून की समस्या की दलील दी है। सरकार ने आमिर को आतंकी और उक्त दो लोगों को आतंकियों के मददगार के रूप में बताकर फर्क रखने का आधार बनाया है। 

कोर्ट ने कहा कि शव सौंपने के मामले में रखे गए फर्क में किसी तरह का तर्क दिखाई नहीं देता। सरकार का ऐसा रवैया किसी भी कानूनी प्रक्रिया में न्याय और समानता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। 

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