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Una News: बाल्यकाल में ही अध्यात्म से जुड़ गए थे सुग्रीवानंद

Sun, 02 Mar 2025 07:07 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 02 Mar 2025 07:07 PM IST
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Sugrivananda was associated with spirituality in his childhood.
1944, 45 में ऊना के संस्कृत विद्यालय में की शास्त्री की पढ़ाई
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संस्कृत के विद्वान शिक्षाविद पंडित शालीग्राम के थे होनहार शिष्य
एसडी शर्मा
मैहतपुर (ऊना)। अध्यात्म जगत के एक युगपुरुष ने रविवार 2 मार्च को शरीर को त्यागकर गोलोक के लिए प्रस्थान किया तो इस सूचना ने सबको अंदर तक झकझोर दिया। डेरा बाबा रुद्रानंद धाम के अधिष्ठाता, संस्थापक संचालक वेदांताचार्य सुग्रीवानंद का 99 वर्ष की आयु में गोलोकवासी हो जाना सबको अचंभित कर रहा था। कुछ दिन पूर्व ही पीजीआई चंडीगढ़ से जब उन्हें छुट्टी मिली तो क्षेत्र के लाखों अनुयायियों ने राहत की सांस ली। फिर उनका स्वास्थ्य बिगड़ा तो उन्हें पीजीआई चंडीगढ़ ले जाना पड़ा। यहां उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया। रविवार 2 मार्च को सुग्रीवानंद इस नश्वर संसार को त्यागकर अपनी अगली आध्यात्मिक यात्रा के लिए निकल गए। वैसे तो अध्यात्म जगत की यात्रा उन्होंने बाल्यकाल से ही आरंभ कर दी थी। युवावस्था में जब उनके सहपाठी सांसारिक गतिविधियों में सम्मिलित हो जाते थे, तब भी सुग्रीवानंद अध्यात्म की डोरी को पकड़कर अपने जीवन की गाड़ी को इसी दिशा में दौड़ाते रहे। 1944, 45 में ऊना के संस्कृत विद्यालय में शास्त्री की पढ़ाई करने के बाद जब बाकी के सहपाठियों ने सरकारी नौकरी को प्रमुखता देना बेहतर समझा, ऐसे में उन्होंने अध्यात्म के मार्ग को ही चुना। विभोर के 96 वर्षीय शास्त्री रामेश्वर दत्त यादों की पुस्तक के पुराने पन्नों को पलट कर बताते हैं कि सुग्रीवानंद का बचपन से ही अध्यात्म की ओर रुझान रहा है। संस्कृत विद्यालय में वह उनसे वरिष्ठ और एक होनहार छात्र थे। समाज के लोगों में अध्यात्म की अलख जगाने की उनकी दिली इच्छा ने उन्हें कई महान विभूतियां के चरणों में बैठकर अध्यात्म की शिक्षा का रसपान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनमें से एक थे देववाणी संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित शालीग्राम शास्त्री। पंडित शालीग्राम शास्त्री के होनहार शिष्य होने के नाते उन्हें उनका विशेष आशीर्वाद मिला। अध्यात्म के प्रति महाराज की लग्न को देखते हुए बाबा आत्मानंद की दृष्टि इस बालक पर पड़ी तो इन्हें 1952 में डेरा रुद्रानंद धाम के अखंड धूने पर बैठा दिया। अखंड धूने पर घंटों तक प्रतिदिन बैठकर साधना करने का ऐसा क्रम शुरू हुआ कि वृद्धावस्था तक वे क्रम निरंतर जारी रहा। अखंड धूना और 24 घंटे लंगर की व्यवस्था का सुचारु ढंग से संचालन सुग्रीवानंद का मुख्य उद्देश्य रहा। लोगों के अपार सहयोग से डेरा में ही संस्कृत विद्यालय का संचालन करके अनेक संस्कृत के विद्यार्थी तैयार किए हैं। डेरा बाबा रुद्रानंद धाम के साथ-साथ हरिद्वार में दो तथा दिल्ली में एक आश्रम स्थापित करके इस क्षेत्र के अनुयायियों को बहुत बड़ी सुविधा प्रदान की जा रही है। डेरा के अखंड धूने पर बेशक शारीरिक रूप से सुग्रीवानंद अब बैठे नजर नहीं आएंगे, परंतु उनकी अनुभूति निरंतर अपने अनुयायियों को किसी न किसी रूप में होती रहेगी, ऐसा उनके लाखों शिष्यों का मानना है।
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