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Una News: टकारला की नीलम सेपू और मसाला बड़ी तैयार कर बनीं आत्मनिर्भर
Sun, 13 Sep 2026 12:26 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Sun, 13 Sep 2026 12:26 AM IST
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नारी (ऊना)। अगर व्यक्ति के मन में मेहनत, लगन और कार्य करने की इच्छा शक्ति हो तो वह कहीं भी रोजगार पैदा कर सकता है और अपना जीवन बेहतर ढंग से बिता सकता है।
ऐसा ही एक उदाहरण टकारला गांव की नीलम ने पेश किया है। उन्होंने पहले प्रशिक्षण लिया और बाद में घर पर ही सेपू और मसाला बड़ियां तैयार करनी शुरू कीं। इन्हीं बड़ियों को रोजगार का माध्यम बनाकर आत्मनिर्भर बन गईं।
नीलम का कहना है कि बड़ियां बनाने के लिए उड़द की दाल को चार या पांच घंटे पानी में भिगो कर रखा जाता है। फिर इसकी साफ सफाई करके हाथ से मसलकर मुलायम मिश्रण बन जाता है। इसमें जीरा, काली मिर्च, सौंफ, सौंठ, लाल मिर्च, धनिया पिसा हुआ और अजवाइन अच्छी तरह से मिला दिए जाते हैं।
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फिर हाथ से छोटे-छोटे पीस लेकर 1 घंटे तक उन्हें धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह बड़ियां सूखने के बाद पैकिंग की जाती है। नीलम ने बताया कि इन बड़ियों की विभिन्न कार्यक्रमों में बिक्री हो जाती है।
इसके अलावा खंड विकास अधिकारी अंब के माध्यम से बाहरी राज्यों में उनकी बिक्री की जाती है। उन्होंने बताया कि हिमाचली सेपू बड़ी गुणवत्ता के आधार पर थोक में 350 से 500 रुपये तक और मसाला बड़ी थोक में 200 से 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती है, इसमें लगभग 30 से 35 प्रतिशत लाभ हो जाता है।
इस कार्य में नीलम पांच अन्य महिलाओं की भी मदद लेती हैं तथा उन्हें एक घंटे के हिसाब से राशि दी जाती है, जिससे उन्हें भी घर बैठे ही रोजगार मिल रहा है। उन्होंने बताया कि कुछ महिलाएं तो स्वतंत्र रूप से भी यह कार्य महारत के साथ कर रही हैं।
नीलम ने बताया कि इसमें लगभग 20 हजार रुपये प्रति माह आमदन हो जाती है, जिससे घर का खर्च निकालने में सुविधा होती है।
उनका कहना है कि हर एक ग्रामीण महिला घर पर बैठने की बजाय कोई न कोई कार्य सीख कर अपने जीवन यापन में सुधार ला सकती हैं।
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ऐसा ही एक उदाहरण टकारला गांव की नीलम ने पेश किया है। उन्होंने पहले प्रशिक्षण लिया और बाद में घर पर ही सेपू और मसाला बड़ियां तैयार करनी शुरू कीं। इन्हीं बड़ियों को रोजगार का माध्यम बनाकर आत्मनिर्भर बन गईं।
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नीलम का कहना है कि बड़ियां बनाने के लिए उड़द की दाल को चार या पांच घंटे पानी में भिगो कर रखा जाता है। फिर इसकी साफ सफाई करके हाथ से मसलकर मुलायम मिश्रण बन जाता है। इसमें जीरा, काली मिर्च, सौंफ, सौंठ, लाल मिर्च, धनिया पिसा हुआ और अजवाइन अच्छी तरह से मिला दिए जाते हैं।
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फिर हाथ से छोटे-छोटे पीस लेकर 1 घंटे तक उन्हें धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह बड़ियां सूखने के बाद पैकिंग की जाती है। नीलम ने बताया कि इन बड़ियों की विभिन्न कार्यक्रमों में बिक्री हो जाती है।
इसके अलावा खंड विकास अधिकारी अंब के माध्यम से बाहरी राज्यों में उनकी बिक्री की जाती है। उन्होंने बताया कि हिमाचली सेपू बड़ी गुणवत्ता के आधार पर थोक में 350 से 500 रुपये तक और मसाला बड़ी थोक में 200 से 250 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिकती है, इसमें लगभग 30 से 35 प्रतिशत लाभ हो जाता है।
इस कार्य में नीलम पांच अन्य महिलाओं की भी मदद लेती हैं तथा उन्हें एक घंटे के हिसाब से राशि दी जाती है, जिससे उन्हें भी घर बैठे ही रोजगार मिल रहा है। उन्होंने बताया कि कुछ महिलाएं तो स्वतंत्र रूप से भी यह कार्य महारत के साथ कर रही हैं।
नीलम ने बताया कि इसमें लगभग 20 हजार रुपये प्रति माह आमदन हो जाती है, जिससे घर का खर्च निकालने में सुविधा होती है।
उनका कहना है कि हर एक ग्रामीण महिला घर पर बैठने की बजाय कोई न कोई कार्य सीख कर अपने जीवन यापन में सुधार ला सकती हैं।