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Una News: जल संरक्षण पर पानी की तरह बहाया पैसा, फिर भी तालाब सूखे
Fri, 09 May 2025 12:21 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Fri, 09 May 2025 12:21 AM IST
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संवाद न्यूज़ एजेंसी
मुबारिकपुर (ऊना)। प्राचीन काल से ही प्रकृति संतुलन में ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे बड़े पोखरों और तालाबों की अहम भूमिका रही है। वर्तमान में क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में से अधिकतर में कुदरती रूप से पुराने समय में बनाए तालाबों की संख्या काफी है, लेकिन वर्तमान में अधिकतर की दशा संतोषजनक नहीं है।
जल संरक्षण को लेकर विभाग की ओर से लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद गांवों में तालाब सूखे पड़े हैं। हालांकि, जल संरक्षण की बातें तो की जाती हैं और अमृत सरोवर जैसी योजनाएं भी चर्चा में रहती हैं, लेकिन गांवों के तालाबों की हालत लुप्त होने के कगार पर है। अधिकतर वर्षों से सूखे पड़े हैं। कई गांवों में इन पर भवनों का निर्माण कर इनके अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया है। अभी भी ऐसे प्रयास अप्रत्यक्ष रूप से जारी हैं।
बता दें कि गगरेट क्षेत्र के ही कुछ गांवों की धरातल की तस्वीर पर नजर दौड़ाएं तो इन तालाबों के सुधार को लेकर ग्राम पंचायतों द्वारा इनके किनारों पर डंगो को लगाने को लेकर लाखों की राशि तो व्यय की गई है, लेकिन इन तालाबों में एक बूंद भी पानी की अब तक न होना, इनके प्रति लोगों व संबंधित विभाग की उदासीनता के साथ प्रकृति व जल सरंक्षण को संवेदनशीलता की तरफ इशारा करता है।
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क्षेत्र की सामाजिक जागरूकता व पौधे व जल बचाव व पर्यावरण से जुड़ी दिव्यांशी शिक्षा समिति व देवभूमि युवा सामाजिक सभा (नेहरू) बनेहड़ा अपर, ब्लड सागर वेलफेयर सोसायटी नंगल जरियाला के प्रतिनिधियों का कहना था कि सभी सूखे पोखर तालाबों में वर्षा के पानी को पहुंचाने के लिए सभी पंचायतों लोगों को वर्षा से पहले कमर कस लेनी चाहिए।
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मुबारिकपुर (ऊना)। प्राचीन काल से ही प्रकृति संतुलन में ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे बड़े पोखरों और तालाबों की अहम भूमिका रही है। वर्तमान में क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में से अधिकतर में कुदरती रूप से पुराने समय में बनाए तालाबों की संख्या काफी है, लेकिन वर्तमान में अधिकतर की दशा संतोषजनक नहीं है।
जल संरक्षण को लेकर विभाग की ओर से लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद गांवों में तालाब सूखे पड़े हैं। हालांकि, जल संरक्षण की बातें तो की जाती हैं और अमृत सरोवर जैसी योजनाएं भी चर्चा में रहती हैं, लेकिन गांवों के तालाबों की हालत लुप्त होने के कगार पर है। अधिकतर वर्षों से सूखे पड़े हैं। कई गांवों में इन पर भवनों का निर्माण कर इनके अस्तित्व को समाप्त कर दिया गया है। अभी भी ऐसे प्रयास अप्रत्यक्ष रूप से जारी हैं।
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बता दें कि गगरेट क्षेत्र के ही कुछ गांवों की धरातल की तस्वीर पर नजर दौड़ाएं तो इन तालाबों के सुधार को लेकर ग्राम पंचायतों द्वारा इनके किनारों पर डंगो को लगाने को लेकर लाखों की राशि तो व्यय की गई है, लेकिन इन तालाबों में एक बूंद भी पानी की अब तक न होना, इनके प्रति लोगों व संबंधित विभाग की उदासीनता के साथ प्रकृति व जल सरंक्षण को संवेदनशीलता की तरफ इशारा करता है।
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क्षेत्र की सामाजिक जागरूकता व पौधे व जल बचाव व पर्यावरण से जुड़ी दिव्यांशी शिक्षा समिति व देवभूमि युवा सामाजिक सभा (नेहरू) बनेहड़ा अपर, ब्लड सागर वेलफेयर सोसायटी नंगल जरियाला के प्रतिनिधियों का कहना था कि सभी सूखे पोखर तालाबों में वर्षा के पानी को पहुंचाने के लिए सभी पंचायतों लोगों को वर्षा से पहले कमर कस लेनी चाहिए।