{"_id":"67c846b454d58f629709953b","slug":"friendship-should-be-like-lord-krishna-and-sudama-ganesh-una-news-c-93-1-ssml1048-147777-2025-03-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"मित्रता भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करें : गणेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मित्रता भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करें : गणेश
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
दौलतपुर चौक (ऊना)। जोह गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का बुधवार को पूर्णाहुति एवं भंडारे के साथ समापन हो गया। इससे पूर्व कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री ने सुदामा चरित्र का वर्णन किया। कथा में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनकर श्रोता भावुक हो गए। कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता, मित्रता खत्म हो जाती है। सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र कृष्ण से मिलने द्वारकापुरी जाते हैं। जब वह महल के गेट पर पहुंच जाते हैं तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बताते हैं और अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उपहास उड़ाते हैं और कहते है कि भगवान श्रीकृष्ण का मित्र एक दरिद्र व्यक्ति कैसे हो सकता है। प्रहरियों की बात सुनकर सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगते हैं। तभी एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर एक सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और अपने आप को आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं और अपने मित्र सुदामा को रोककर गले लगा लिया। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर सुदामा में क्या खासियत है कि भगवान खुद ही उनके स्वागत में दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। कृष्ण सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। इस मौके पर गगरेट के पूर्व विधायक चैतन्य शर्मा जिला परिषद सदस्य सुशील कालिया संजय पुर्जा के अलावा भारी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे ।
विज्ञापन
दौलतपुर चौक (ऊना)। जोह गांव में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का बुधवार को पूर्णाहुति एवं भंडारे के साथ समापन हो गया। इससे पूर्व कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री ने सुदामा चरित्र का वर्णन किया। कथा में श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनकर श्रोता भावुक हो गए। कथा व्यास गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि मित्रता करो तो भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करो। सच्चा मित्र वही है, जो अपने मित्र की परेशानी को समझे और बिना बताए ही मदद कर दे। आजकल स्वार्थ की मित्रता रह गई है। जब तक स्वार्थ सिद्ध नहीं होता है, तब तक मित्रता रहती है। जब स्वार्थ पूरा हो जाता, मित्रता खत्म हो जाती है। सुदामा अपनी पत्नी के कहने पर मित्र कृष्ण से मिलने द्वारकापुरी जाते हैं। जब वह महल के गेट पर पहुंच जाते हैं तब प्रहरियों से कृष्ण को अपना मित्र बताते हैं और अंदर जाने की बात कहते हैं। सुदामा की यह बात सुनकर प्रहरी उपहास उड़ाते हैं और कहते है कि भगवान श्रीकृष्ण का मित्र एक दरिद्र व्यक्ति कैसे हो सकता है। प्रहरियों की बात सुनकर सुदामा अपने मित्र से बिना मिले ही लौटने लगते हैं। तभी एक प्रहरी महल के अंदर जाकर भगवान श्रीकृष्ण को बताता है कि महल के द्वार पर एक सुदामा नाम का दरिद्र व्यक्ति खड़ा है और अपने आप को आपका मित्र बता रहा है। द्वारपाल की बात सुनकर भगवान कृष्ण नंगे पांव ही दौड़े चले आते हैं और अपने मित्र सुदामा को रोककर गले लगा लिया। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर सुदामा में क्या खासियत है कि भगवान खुद ही उनके स्वागत में दौड़ पड़े। श्रीकृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाकर सुदामा के पांव पखारे। कृष्ण सुदामा चरित्र प्रसंग पर श्रद्धालु भाव विभोर हो उठे। इस मौके पर गगरेट के पूर्व विधायक चैतन्य शर्मा जिला परिषद सदस्य सुशील कालिया संजय पुर्जा के अलावा भारी संख्या में श्रोता उपस्थित रहे ।