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Una News: कंजक पूजन पर मुबारिकपुर में दिखा भक्ति और समानता का संगम
Tue, 20 Oct 2026 12:25 AM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना
Updated Tue, 20 Oct 2026 12:25 AM IST
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मुबारिकपुर (ऊना)। शारदीय नवरात्र की महा अष्टमी और नवमी की तिथि को लेकर सोमवार को कुछेक ग्रामीण और नगरीय क्षेत्रों में एक अनोखी स्थिति देखने को मिली। अपने-अपने घरों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के प्रतीक के रूप में कंजकों के पूजन का अनुष्ठान करने के लिए श्रद्धालुओं ने प्रवासी बच्चियों को सादर आमंत्रित कर उनकी पूजा की। इससे समाज को समानता का संदेश मिला।
लोगों को नवदुर्गा रूपी बालिकाओं को तलाशने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। समय के साथ उभरी कंजकों की किल्लत के चलते लोग प्रवासी परिवारों की बस्तियों (झुग्गी-झोपड़ियों) की ओर रुख करते दिखे। लोगों को बच्चियों को पूरे सम्मान के साथ अपने घर ले जाने की व्यवस्था करते देखा गया। कंजक पूजन के दौरान प्रवासी बच्चियों को केवल पूरी-हलवा, खीर और चने का भोग ही नहीं, बल्कि उन्हें नए वस्त्र, चुनरी, शिक्षा सामग्री, खिलौने और दक्षिणा देकर विदा किया गया।
कंजक पूजन ने जाने-अनजाने में सामाजिक भेदभाव को मिटाने का भी काम किया है। जहां आम दिनों में प्रवासी बच्चों की तरफ कम ध्यान दिया जाता है, वहीं नवरात्र में इन्हीं बच्चियों को पूजा जा रहा है। कंजकों के पांव पखारना, माथे पर तिलक लगाना और उनसे आशीर्वाद लेना सामाजिक एकजुटता, समरसता एवं भारतीय संस्कृति की एक सुंदर मिसाल प्रस्तुत करता है।
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-सुधा पराशर, मुबारिकपुर
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वर्तमान में ग्रामीण व नगरीय क्षेत्र में कंजकें आसानी से नहीं मिलतीं। ऐसे में लोग प्रवासी बस्ती में जाकर बच्चियों को सादर आमंत्रित करते हैं, इससे न केवल हमारा अनुष्ठान संपन्न होता है बल्कि उन मासूम बच्चों के चेहरों पर भी खुशी खिल उठती है।
-राजकुमारी शर्मा, एडवोकेट, मुबारिकपुर
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लोगों को नवदुर्गा रूपी बालिकाओं को तलाशने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। समय के साथ उभरी कंजकों की किल्लत के चलते लोग प्रवासी परिवारों की बस्तियों (झुग्गी-झोपड़ियों) की ओर रुख करते दिखे। लोगों को बच्चियों को पूरे सम्मान के साथ अपने घर ले जाने की व्यवस्था करते देखा गया। कंजक पूजन के दौरान प्रवासी बच्चियों को केवल पूरी-हलवा, खीर और चने का भोग ही नहीं, बल्कि उन्हें नए वस्त्र, चुनरी, शिक्षा सामग्री, खिलौने और दक्षिणा देकर विदा किया गया।
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कंजक पूजन ने जाने-अनजाने में सामाजिक भेदभाव को मिटाने का भी काम किया है। जहां आम दिनों में प्रवासी बच्चों की तरफ कम ध्यान दिया जाता है, वहीं नवरात्र में इन्हीं बच्चियों को पूजा जा रहा है। कंजकों के पांव पखारना, माथे पर तिलक लगाना और उनसे आशीर्वाद लेना सामाजिक एकजुटता, समरसता एवं भारतीय संस्कृति की एक सुंदर मिसाल प्रस्तुत करता है।
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-सुधा पराशर, मुबारिकपुर
वर्तमान में ग्रामीण व नगरीय क्षेत्र में कंजकें आसानी से नहीं मिलतीं। ऐसे में लोग प्रवासी बस्ती में जाकर बच्चियों को सादर आमंत्रित करते हैं, इससे न केवल हमारा अनुष्ठान संपन्न होता है बल्कि उन मासूम बच्चों के चेहरों पर भी खुशी खिल उठती है।
-राजकुमारी शर्मा, एडवोकेट, मुबारिकपुर