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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Solan News ›   Umeed Ki Mashaal : 7 ladies making both ends meet by running a Makki's roti and Saag

उम्मीद की मशाल : मक्की की रोटी, साग का स्टाल बना रोजगार; सात महिलाएं पाल रहीं परिवार

Sun, 19 Jun 2022 10:42 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sun, 19 Jun 2022 10:42 PM IST
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ओमपाल सिंह
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नालागढ़ (सोलन)। वर्तमान समय में महिलाएं किसी भी तरह पुरुषों से पीछे नहीं हैं। डॉक्टर, आईएएस जैसे बड़े पदों से लेकर दुकान और घर की कमान महिलाएं संभाल रही हैं। नालागढ़ में इसी तरह एक स्वयं सहायता समूह की महिलाएं बाकी लोगों के लिए रोल मॉडल से कम नहीं है।
रेडक्रॉस मेले में मक्की की रोटी और सरसों के साग का स्टाल लगाकर पर ढांग निहली की महिलाओं ने अपनी जिंदगी ली। इनके बनाए मक्की और साग के स्वाद को चख तत्कालीन बीडीओ राज कुमार ने इन महिलाओं को एक समूह बनाकर ढाबा चलाने के लिए प्रेरित किया।
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अब ये महिलाएं इसी के बूते अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर रही हैं। महिलाएं हर माह ढाबे से 50 से 60 हजार कमा लेती हैं। साथ ही खाली समय में सिलाई और घर का काम करती हैं।
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नालागढ़ में 2019 के रेडक्रास सोसायटी के मेले में गांव की गुलजारो देवी, माया देवी, गुरमीत कौर, सुनीता देवी, कुंता देवी, अमरजीत और बीरो देवी ने मक्की की रोटी का स्टाल लगाया। यहां आए बीडीओ राजकुमार ने उस समय इन महिलाओं को अपना समूह बनाने के लिए प्रेरित किया।
महिला ने लक्ष्मी स्वयं सहायता समूह बनाया। बीडीओ ने एक सरकारी मकान की मरम्मत करवाकर उन्हें फर्नीचर दिलाया। महिलाओं ने 50,000 रुपये के बर्तन खरीदे जिसमें 30,000 रुपये बीडीओ कार्यालय ने उन्हें दिए। नालागढ़ से कुछ दूर होने से ढांग निहली आने जाने के लिए इन महिलाओं को इनके पति और परिवार के लोग सहायता करते हैं। शिफ्टों में काम करती हैं ताकि उनका घर भी चलता रहे। (संवाद)
आपस में बांटती हैं कमाई, सिलाई भी आमदनी का जरीया
समूह की महिला माया देवी ने बताया कि वह नाश्ते में दही और परांठा देती हैं और खाने में दो सब्जियां, चावल और रोटी परोसती हैं। यहां से जो भी कमाई करती हैं, उसे आपस में बांट लेती हैं। इस ढाबे के साथ अमीरा की शॉप भी है जिसमें महिलाएं सिलाई का कार्य खाली समय में करती हैं। इस काम में तीन से चार हजार रुपये प्रति माह कमा लेती है।

शिफ्टों में कार्य कर रहीं सभी महिलाएं
पिछले तीन साल ये सात महिलाएं घर जैसा खाना बनाकर ढाबा चला रही हैं। इस ढाबे को सुबह 7:30 बजे से लेकर रात 9:00 बजे तक खोलती हैं। सभी महिलाएं शिफ्टों में काम करती हैं। जो महिलाएं सुबह 7:30 बजे आती है, वे दिन में 1:30 बजे घर चली जाती है जबकि जो 1:30 बजे आती हैं, वे 6:00 बजे तक रहती हैं और 6:00 बजे आने वाली महिलाएं रात्रि 9:00 बजे ढाबा बंद करके जाती हैं।
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