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Solan News: भगवान शिव और पार्वती विवाह का सुनाया प्रसंग
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कुनिहार के शिव तांडव गुफा में चल रही है शिवमहापुराण कथा
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार(सोलन)। प्राचीन शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के पांचवें दिन आचार्य बलवंत शांडिल्य ने भगवान शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म, तप और नारी शक्ति का महत्व बताया।
आचार्य शांडिल्य ने बताया कि तीनों लोकों में दैत्य तारकासुर के बढ़ते आतंक से देवता, ऋषि और समस्त प्रजा भयभीत हो उठी थी। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव था। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने आपात बैठक कर भगवान शिव को विवाह के लिए मनाने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि देवराज इंद्र, ब्रह्मा और भगवान विष्णु सहित समस्त देवगण कैलाश पर्वत पहुंचे और लोक-कल्याण के लिए भगवान शिव से विवाह का आग्रह किया। प्रारंभ में महादेव ने वैराग्य का मार्ग अपनाने की बात कही, लेकिन देवताओं ने शक्ति के पुनर्जन्म और सृष्टि संतुलन की आवश्यकता का स्मरण कराते हुए उन्हें सहमत करने का प्रयास किया।
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आचार्य ने बताया कि पर्वतराज हिमवान की पत्नी रानी मैनावती ने माता सती को पुत्री रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने पुत्री रूप में अवतार लेने का वरदान दिया। समय आने पर रानी मैनावती के यहां एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया, जिनका नाम पार्वती रखा गया।
उन्होंने बताया कि बाल्यकाल से ही माता पार्वती में शिव-भक्ति, तप और समर्पण की अद्भुत प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। माता पार्वती की कठोर तपस्या और अटूट निष्ठा ने ही शिव-विवाह का मार्ग प्रशस्त किया। इसी दिव्य मिलन से जन्मे भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार(सोलन)। प्राचीन शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिव महापुराण कथा के पांचवें दिन आचार्य बलवंत शांडिल्य ने भगवान शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग सुनाया। उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म, तप और नारी शक्ति का महत्व बताया।
आचार्य शांडिल्य ने बताया कि तीनों लोकों में दैत्य तारकासुर के बढ़ते आतंक से देवता, ऋषि और समस्त प्रजा भयभीत हो उठी थी। ब्रह्मा से प्राप्त वरदान के कारण उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव था। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने आपात बैठक कर भगवान शिव को विवाह के लिए मनाने का निर्णय लिया।
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उन्होंने बताया कि देवराज इंद्र, ब्रह्मा और भगवान विष्णु सहित समस्त देवगण कैलाश पर्वत पहुंचे और लोक-कल्याण के लिए भगवान शिव से विवाह का आग्रह किया। प्रारंभ में महादेव ने वैराग्य का मार्ग अपनाने की बात कही, लेकिन देवताओं ने शक्ति के पुनर्जन्म और सृष्टि संतुलन की आवश्यकता का स्मरण कराते हुए उन्हें सहमत करने का प्रयास किया।
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आचार्य ने बताया कि पर्वतराज हिमवान की पत्नी रानी मैनावती ने माता सती को पुत्री रूप में प्राप्त करने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने पुत्री रूप में अवतार लेने का वरदान दिया। समय आने पर रानी मैनावती के यहां एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया, जिनका नाम पार्वती रखा गया।
उन्होंने बताया कि बाल्यकाल से ही माता पार्वती में शिव-भक्ति, तप और समर्पण की अद्भुत प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। माता पार्वती की कठोर तपस्या और अटूट निष्ठा ने ही शिव-विवाह का मार्ग प्रशस्त किया। इसी दिव्य मिलन से जन्मे भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया।