{"_id":"67b33bb0a6b29e98e405ec7d","slug":"shower-of-sermons-on-the-fourth-day-of-shrimad-bhagwat-katha-in-shahpur-solan-news-c-176-1-ssml1040-138051-2025-02-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Solan News: शाहपुर में श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रवचनों की बौछार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Solan News: शाहपुर में श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रवचनों की बौछार
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
बरोटीवाला (सोलन)। शाहपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन हरि महाराज ने भगवान के पावन चरित्रों का वर्णन किया गया। इसमें बताया कि किस प्रकार दुर्योधन के 56 भोग त्याग कर दासी पुत्र विदुर बाबा के यहां आतिथ्य स्वीकार किया और छिलकों का भोग लगाया। उन्होंने कहा कि प्रभु प्रेम की डोरी से बंध जाने पर भक्तों के चित में चिपक जाते हैं। उन्होंने बाल भक्त ध्रुव का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि अवधपुरी में राजा उतानपाद राज किया करते थे। उनकी सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थी। सुनीति पहली पत्नी थी जिसका पुत्र ध्रुव था। राजा सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र को ज्यादा प्रेम करता था। एक बार राजा अपने पुत्र ध्रुव को गोद में लेकर बैठे थे तभी वहां सुरुचि आ गई। अपनी सौत के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बिठाते हुए कहा, राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो राज सिंहासन का भी अधिकारी हो सकता है और जो मेरे गर्भ से जन्मा हो। तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है। यदि तेरी इच्छा राज सिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर। उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा तभी सिंहासन प्राप्त कर पाएगा। बालक ध्रुव यह बात चुभ जाती है और वह वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगते हैं। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देते हैं। इस अवसर पर तरसेम लाल मोदगिल, सोहन लाल, मुकेश, चिंतामणि, सोनू, चरणजीत, जगदीश चंद, सुरेंद्र शर्मा, दीन दयाल, पवन शर्मा, पुष्पा, सविता, शंकुतला, रमा, निर्मला, रीना व बहुत से गणमान्य ग्रामीण मौजूद रहे।
विज्ञापन
बरोटीवाला (सोलन)। शाहपुर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन हरि महाराज ने भगवान के पावन चरित्रों का वर्णन किया गया। इसमें बताया कि किस प्रकार दुर्योधन के 56 भोग त्याग कर दासी पुत्र विदुर बाबा के यहां आतिथ्य स्वीकार किया और छिलकों का भोग लगाया। उन्होंने कहा कि प्रभु प्रेम की डोरी से बंध जाने पर भक्तों के चित में चिपक जाते हैं। उन्होंने बाल भक्त ध्रुव का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि अवधपुरी में राजा उतानपाद राज किया करते थे। उनकी सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियां थी। सुनीति पहली पत्नी थी जिसका पुत्र ध्रुव था। राजा सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र को ज्यादा प्रेम करता था। एक बार राजा अपने पुत्र ध्रुव को गोद में लेकर बैठे थे तभी वहां सुरुचि आ गई। अपनी सौत के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बिठाते हुए कहा, राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है जो राज सिंहासन का भी अधिकारी हो सकता है और जो मेरे गर्भ से जन्मा हो। तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है। यदि तेरी इच्छा राज सिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर। उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा तभी सिंहासन प्राप्त कर पाएगा। बालक ध्रुव यह बात चुभ जाती है और वह वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगते हैं। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देते हैं। इस अवसर पर तरसेम लाल मोदगिल, सोहन लाल, मुकेश, चिंतामणि, सोनू, चरणजीत, जगदीश चंद, सुरेंद्र शर्मा, दीन दयाल, पवन शर्मा, पुष्पा, सविता, शंकुतला, रमा, निर्मला, रीना व बहुत से गणमान्य ग्रामीण मौजूद रहे।