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Solan News: सृष्टि की उत्पत्ति का सुनाया प्रसंग
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शिव तांडव गुफा मंदिर कुनिहार में शिव पुराण कथा सुनते भक्तजन। संवाद
शिव तांडव गुफा कुनिहार में शिवपुराण कथा को हो रहा आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में आयोजित शिवपुराण कथा के दूसरे दिन सृष्टि की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाया गया। इस दौरान कथा वाचक आचार्य बलवंत शर्मा ने श्रद्धालुओं को सृष्टि के आरंभ से जुड़ी पौराणिक था का बखान किया।
आचार्य बलवंत शर्मा ने बताया कि सृष्टि के प्रारंभ में चारों ओर घोर अंधकार था। उस समय केवल एक ही परम शक्ति विद्यमान थी। वह शक्ति भगवान शिव की थी। उन्होंने कहा कि शिव न जन्म लेते हैं और न ही उनका अंत है। वे स्वयं आदि और अनादि हैं। उन्हीं से सृष्टि की रचना, पालन और संहार की शक्तियां प्रकट होती हैं। उन्होंने शिव को निराकार ब्रह्म और साकार देव बताया।
कथा के दौरान ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर उत्पन्न विवाद का प्रसंग भी सुनाया गया। आचार्य बलवंत शर्मा ने बताया कि इसी दौरान एक दिव्य और अनंत ज्योति स्तंभ प्रकट हुआ, जिसकी तेजस्विता से समूचा ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। यह ज्योति स्वयं भगवान शिव का स्वरूप थी। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर उस ज्योति का अंत खोजने के लिए नीचे की ओर गमन किया, जबकि ब्रह्मा हंस रूप लेकर ऊपर की दिशा में उड़े। युगों के प्रयास के बाद भी किसी को उसका आदि-अंत ज्ञात नहीं हो सका। अंततः दोनों ने अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए भगवान शिव की अनंत महिमा को नमन किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुनिहार (सोलन)। शिव तांडव गुफा कुनिहार में आयोजित शिवपुराण कथा के दूसरे दिन सृष्टि की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाया गया। इस दौरान कथा वाचक आचार्य बलवंत शर्मा ने श्रद्धालुओं को सृष्टि के आरंभ से जुड़ी पौराणिक था का बखान किया।
आचार्य बलवंत शर्मा ने बताया कि सृष्टि के प्रारंभ में चारों ओर घोर अंधकार था। उस समय केवल एक ही परम शक्ति विद्यमान थी। वह शक्ति भगवान शिव की थी। उन्होंने कहा कि शिव न जन्म लेते हैं और न ही उनका अंत है। वे स्वयं आदि और अनादि हैं। उन्हीं से सृष्टि की रचना, पालन और संहार की शक्तियां प्रकट होती हैं। उन्होंने शिव को निराकार ब्रह्म और साकार देव बताया।
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कथा के दौरान ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर उत्पन्न विवाद का प्रसंग भी सुनाया गया। आचार्य बलवंत शर्मा ने बताया कि इसी दौरान एक दिव्य और अनंत ज्योति स्तंभ प्रकट हुआ, जिसकी तेजस्विता से समूचा ब्रह्मांड आलोकित हो उठा। यह ज्योति स्वयं भगवान शिव का स्वरूप थी। भगवान विष्णु ने वराह रूप धारण कर उस ज्योति का अंत खोजने के लिए नीचे की ओर गमन किया, जबकि ब्रह्मा हंस रूप लेकर ऊपर की दिशा में उड़े। युगों के प्रयास के बाद भी किसी को उसका आदि-अंत ज्ञात नहीं हो सका। अंततः दोनों ने अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हुए भगवान शिव की अनंत महिमा को नमन किया।
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