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यूरोपीयन फसलों की ओर बढ़ा किसानों का रूझान, सोलन में 60 हेक्टेयर भूमि तक पहुंची पैदावार
Updated Thu, 19 Jul 2018 05:28 PM IST
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युरोपियन फसलों की खेती से मालामाल हो रहे किसान
सोलन जिले में 60 हेक्टेयर भूमि तक पहुंची पैदावार, अच्छी कीमत से बढ़ा किसानों का रुझान
जोणाजी, कलोला, कंडाघाट के चायल, मंझाई और क्वारग में हो रही आधुनिक खेती
अमर उजाला ब्यूरो
सोलन। कम लागत में अधिक आमदनी कमाने के लिए जिला के किसानों का रुझान दिनोंदिन यूरोपियन फसलों को लगाने की ओर बढ़ रहा है। इस फसल की बाजार में अच्छी कीमत किसानों को अपनी ओर लुभा रही है। यदि कृषि विभाग सोलन से प्राप्त आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो अभी तक जिले में यूरोपियन फसलों के तहत करीब 60 हेक्टेयर भूमि पर किसान फसलों को खेतों में उगा रहे हैं। इसकी स्थानीय क्षेत्रों के अलावा बाहरी क्षेत्रों में अधिक मांग रहती है। अभी किसान सोलन के अलग-अलग क्षेत्रों जोणाजी, कलोला, कंडाघाट के चायल, झाझा के मंझाई, कंडाघाट के क्वारग, अश्वनी नदी के आसपास के क्षेत्रों में यूरोपियन फसलों का कारोबार कर रहे हैं। ये यूरोपियन फसलें खुले में उगाई जा रही है। अब इन फसलों कर प्रति वर्ष आंकड़ा बढ़ रहा है लेकिन युरोपियन फसलों के लिए बारिश लाभदायक नहीं होती। ज्यादा बारिश इनकी आयु कम कर देती है। विभाग का मानना है कि अभी स्थानीय लोग इन्हें खाना इतना पसंद नहीं करते लेकिन जैसे-जैसे लोगों को युरोपियन सब्जियां पसंद आने लगेंगी, इनकी मांग ज्यादा बढ़ेगी।
उप निदेशक कृषि विभाग सोलन राम नाथ ने बताया कि किसानों का रुझान युरोपियन फसलों की तरफ बढ़ रहा है। किसानों को कम लागत में अधिक आमदनी पगाप्त हो रही है। उन्होंने बताया कि होटलों में इनकी मांग ज्यादा रहती है जिस कारण कीमत भी अच्छी मिलती है।
इन फसलों का हो रहा उत्पादन
अभी क्षेत्र के किसान अपने खेतों में स्प्रॉटिंग ब्रोकली, सेलरी, पार्सले लीक , रेड कैबेज, पारस्लिप, गलोबारके चौक, आरटी चौक, लीक, स्कवैश, पैकचुए आदि फसलों को उगा रहे हैं। विभाग के अनुसार इन सभी में पैकचुए फसल की कीमत ज्यादा रहती है। इन सभी प्रजातियों की बड़े शहरों में ज्यादा मांग रहती है।
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होटलों में रहती है अधिक मांग
युरोपियन फसलों की स्थानीय व बाहरी क्षेत्रों के होटलों में मांग अधिक रहती है। लोग इनको खाने में पसंद करते हैं। इन फसलों के किसानों को दाम भी अच्छे मिलते हैं। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में इन फसलों की कीमत 200 से 250 रुपये प्रति किलो रहती है। यही कारण है कि अब किसान युरोपियन फसलों को लगाने में रुचि दिखा रहे हैं।
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सोलन जिले में 60 हेक्टेयर भूमि तक पहुंची पैदावार, अच्छी कीमत से बढ़ा किसानों का रुझान
जोणाजी, कलोला, कंडाघाट के चायल, मंझाई और क्वारग में हो रही आधुनिक खेती
अमर उजाला ब्यूरो
सोलन। कम लागत में अधिक आमदनी कमाने के लिए जिला के किसानों का रुझान दिनोंदिन यूरोपियन फसलों को लगाने की ओर बढ़ रहा है। इस फसल की बाजार में अच्छी कीमत किसानों को अपनी ओर लुभा रही है। यदि कृषि विभाग सोलन से प्राप्त आंकड़ों पर नजर दौड़ाई जाए तो अभी तक जिले में यूरोपियन फसलों के तहत करीब 60 हेक्टेयर भूमि पर किसान फसलों को खेतों में उगा रहे हैं। इसकी स्थानीय क्षेत्रों के अलावा बाहरी क्षेत्रों में अधिक मांग रहती है। अभी किसान सोलन के अलग-अलग क्षेत्रों जोणाजी, कलोला, कंडाघाट के चायल, झाझा के मंझाई, कंडाघाट के क्वारग, अश्वनी नदी के आसपास के क्षेत्रों में यूरोपियन फसलों का कारोबार कर रहे हैं। ये यूरोपियन फसलें खुले में उगाई जा रही है। अब इन फसलों कर प्रति वर्ष आंकड़ा बढ़ रहा है लेकिन युरोपियन फसलों के लिए बारिश लाभदायक नहीं होती। ज्यादा बारिश इनकी आयु कम कर देती है। विभाग का मानना है कि अभी स्थानीय लोग इन्हें खाना इतना पसंद नहीं करते लेकिन जैसे-जैसे लोगों को युरोपियन सब्जियां पसंद आने लगेंगी, इनकी मांग ज्यादा बढ़ेगी।
उप निदेशक कृषि विभाग सोलन राम नाथ ने बताया कि किसानों का रुझान युरोपियन फसलों की तरफ बढ़ रहा है। किसानों को कम लागत में अधिक आमदनी पगाप्त हो रही है। उन्होंने बताया कि होटलों में इनकी मांग ज्यादा रहती है जिस कारण कीमत भी अच्छी मिलती है।
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इन फसलों का हो रहा उत्पादन
अभी क्षेत्र के किसान अपने खेतों में स्प्रॉटिंग ब्रोकली, सेलरी, पार्सले लीक , रेड कैबेज, पारस्लिप, गलोबारके चौक, आरटी चौक, लीक, स्कवैश, पैकचुए आदि फसलों को उगा रहे हैं। विभाग के अनुसार इन सभी में पैकचुए फसल की कीमत ज्यादा रहती है। इन सभी प्रजातियों की बड़े शहरों में ज्यादा मांग रहती है।
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होटलों में रहती है अधिक मांग
युरोपियन फसलों की स्थानीय व बाहरी क्षेत्रों के होटलों में मांग अधिक रहती है। लोग इनको खाने में पसंद करते हैं। इन फसलों के किसानों को दाम भी अच्छे मिलते हैं। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में इन फसलों की कीमत 200 से 250 रुपये प्रति किलो रहती है। यही कारण है कि अब किसान युरोपियन फसलों को लगाने में रुचि दिखा रहे हैं।