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हिमालय की जड़ी बूटियों की सुरक्षा जरूरी
Updated Fri, 23 Mar 2018 10:02 PM IST
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सोलन। हिमालय में पाई जाने वाली जड़ी बूटियों के संरक्षण के लिए कवायद शुरू हो गई है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग के हाई एल्टीट्यूड स्टेशन सोलन में हिमालय में पाई जाने वाली जैव विविधता पर तीन दिवसीय कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप शुक्रवार को शुरू हो गई। इसका आयोजन पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडी के तहत करवाया जा रहा है। इसका उद्घाटन भारतीय प्राणी सर्वेक्षण विभाग (जेडएसआई) कोलकाता के निदेशक डॉ. कैलाश चंद्रा ने किया। डॉ. चंद्रा ने कहा कि देश के करोड़ों लोगों का जीवन हिमालय पर निर्भर है।
हिमालय में पाई जाने वाली जैव विविधता के संरक्षण और संवर्धन को लेकर पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्वावधान में अंब्रेला प्रोग्राम चलाया जा रहा है। यह प्रोग्राम देश के पांच राज्यों हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्कम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल में चल रहा है। अप्रैल 2016 से शुरू हुआ यह प्रोग्राम तीन सालों तक हिमालयन रिजन में पाई जाने वाली जैव विविधता की मॉनिटरिंग करेगा। डॉ. चंद्रा ने कहा कि इससे यह पता चल पाएगा कि हिमालय में मौजूद फ्लोरा जैविक पौधे और फौना जीव जंतु की वर्तमान में क्या स्थिति है। भविष्य में इसकी स्थिति में किस प्रकार का परिवर्तन आ रहा है। इसकी कौन सी ऐसी प्रजातियां हैं जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। हिमालयन जैव विविधता की किस प्रकार लांग टर्म मॉनिटरिंग हो इस पर देशभर के वैज्ञानिक सोलन में तीन दिन तक चर्चा करेंगे।
जड़ी-बूटियों का संरक्षण जरूरी: डॉ. चौहान
देश के जाने माने मेडिसनल प्लांट विशेषज्ञ एवं नौणी यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. एनएस चौहान ने कहा कि हिमालयन रिजन में मेडिसनल प्लांट प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। इनका संरक्षण करना जरूरी है। कहा कि जिन पौधों की जड़ों का इस्तेमाल किया जाता है उन्हें पतझड़ के मौसम में निकालना चाहिए। साथ फूलों को पॉलिनेशन से पहले निकालना चाहिए। कैंसर में प्रयोग होने वाला टैक्सस बकाटा भी हिमालय में पाया जाता है। लेकिन लालच में आकर हम इसका अवैज्ञानिक दोहन कर रहे हैं। यह कैंसर रोगियों के लिए जीवन देने वाला पौधा है।
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यह लोग रहे मौजूद
इस मौके पर भारतीय बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (बीएसआई) के सहायक निदेशक डॉ. बीके सिन्हा, डॉ. एसएस दास, डॉ. वसुदेव त्रिपाठी, डॉ. ललित कुमार, वन विभाग सोलन के एसीएफ पवन कुमार आंचल, जेएसआई सोलन के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. जेएम जुल्का, जेडएसआई सोलन की प्रभारी अधिकारी डॉ. अवतार कौर सिद्धू मौजूद रहे।
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हिमालय में पाई जाने वाली जैव विविधता के संरक्षण और संवर्धन को लेकर पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तत्वावधान में अंब्रेला प्रोग्राम चलाया जा रहा है। यह प्रोग्राम देश के पांच राज्यों हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्कम, पश्चिम बंगाल और अरुणाचल में चल रहा है। अप्रैल 2016 से शुरू हुआ यह प्रोग्राम तीन सालों तक हिमालयन रिजन में पाई जाने वाली जैव विविधता की मॉनिटरिंग करेगा। डॉ. चंद्रा ने कहा कि इससे यह पता चल पाएगा कि हिमालय में मौजूद फ्लोरा जैविक पौधे और फौना जीव जंतु की वर्तमान में क्या स्थिति है। भविष्य में इसकी स्थिति में किस प्रकार का परिवर्तन आ रहा है। इसकी कौन सी ऐसी प्रजातियां हैं जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। हिमालयन जैव विविधता की किस प्रकार लांग टर्म मॉनिटरिंग हो इस पर देशभर के वैज्ञानिक सोलन में तीन दिन तक चर्चा करेंगे।
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जड़ी-बूटियों का संरक्षण जरूरी: डॉ. चौहान
देश के जाने माने मेडिसनल प्लांट विशेषज्ञ एवं नौणी यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डॉ. एनएस चौहान ने कहा कि हिमालयन रिजन में मेडिसनल प्लांट प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं। इनका संरक्षण करना जरूरी है। कहा कि जिन पौधों की जड़ों का इस्तेमाल किया जाता है उन्हें पतझड़ के मौसम में निकालना चाहिए। साथ फूलों को पॉलिनेशन से पहले निकालना चाहिए। कैंसर में प्रयोग होने वाला टैक्सस बकाटा भी हिमालय में पाया जाता है। लेकिन लालच में आकर हम इसका अवैज्ञानिक दोहन कर रहे हैं। यह कैंसर रोगियों के लिए जीवन देने वाला पौधा है।
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यह लोग रहे मौजूद
इस मौके पर भारतीय बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (बीएसआई) के सहायक निदेशक डॉ. बीके सिन्हा, डॉ. एसएस दास, डॉ. वसुदेव त्रिपाठी, डॉ. ललित कुमार, वन विभाग सोलन के एसीएफ पवन कुमार आंचल, जेएसआई सोलन के सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ. जेएम जुल्का, जेडएसआई सोलन की प्रभारी अधिकारी डॉ. अवतार कौर सिद्धू मौजूद रहे।