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Sirmour News: ऐतिहासिक रेणुका झील में शाही स्नान को उमड़ा जनसैलाब
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रेणुका जी के सन्यास आश्रम में चाय- पकोडे का लंगर तैयार करते रायपुर रानी के श्रद्धालु।संवाद
एकादशी पर हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी
शाही स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिरों में की पूजा-अर्चना
संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले के अवसर पर हरिप्रबोधिनी एकादशी के दिन शनिवार को हजारों श्रद्धालुओं ने ऐतिहासिक रेणुका झील में आस्था की डुबकी लगाई। स्नान का यह सिलसिला सुबह ब्रह्ममुहूर्त से शुरू होकर देर शाम तक चलता रहा। एकादशी स्नान को रेणुका मेले का पहला शाही स्नान माना जाता है।
प्रथम स्नान महात्मय को लेकर जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए थे। अनहोनी घटना से निपटने के लिए चार गोताखोरों को भी स्नान घाटों पर तैनात किया गया है। रेणुकाजी में स्थित संत-महात्माओं ने प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शाही स्नान करके स्नान महात्मय का शुभारंभ किया। इसके बाद सभी श्रद्धालुओं ने बारी-बारी से ऐतिहासिक रेणुका झील में शाही स्नान की परंपरा को निभाया।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन रेणुका झील में स्नान करने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि इस दिन रेणुका झील में शाही स्नान करने से जहां मोक्ष की प्राप्ति होती है, वहीं मनवांछित फल की प्राप्ति भी होती है। भगवान परशुराम और मां रेणुकाजी के प्रति लोगों की गहरी आस्था जुड़ी होने के कारण पूरे उत्तर भारत से श्रद्धालु शाही स्नान करने रेणुका आते हैं।
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स्नान के पश्चात श्रद्धालुओं ने रेणुका झील की परिक्रमा करके भगवान परशुराम और मां रेणुका मंदिर में पूजा-अर्चना की। इस दौरान रेणुका तीर्थ में स्थित निर्वाण आश्रम और गायत्री आश्रम में विशाल भंडारों का आयोजन किया गया। हरियाणा के रायपुर रानी से प्रगतिशील किसान महेन्द्र पाल शर्मा ने संन्यास आश्रम में चाय और पकोड़े का लंगर लगाया।
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मेलार्थियों को धूल-मिट्टी से मिली निजात
ददाहू। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले में इस मर्तबा श्रद्धालुओं को धूल व मिट्टी से निजात मिली है। ददाहू से लेकर रेणुकाजी तीर्थ तक टैंकर से पानी का बार-बार छिड़काव करवाया जा रहा है। माइन ओनर वेलफेयर एसोसिएशन ने टैंकर मेला प्रशासन को उपलब्ध कराया है।
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श्रद्धालुओं ने देवताओं के चरणों में गुजारी रात
ददाहू। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले के में रात्रि जागरण की भी परंपरा है। इस परंपरा के तहत क्षेत्र से जुड़ी सैकड़ों पंचायतों के लोग दशमी के दिन रेणुकाजी तीर्थ में ही रात गुजारते हैं। दशमी से अगले दिन ब्रह्ममूहुर्त में ऐतिहासिक रेणुका झील में शाही स्नान करने के बाद ही वह अपने घरों को लौटते हैं। ठिठुरती सर्दी के बावजूद भी यह परंपरा आज भी कायम है। पहले श्रद्धालुओं को जहां जगह मिलती थी, वहां डेरा जमा कर ठहर जाते थे। अब रेणुका विकास बाेर्ड मंदिर परिसर के समीप ही शमियानों और टैंट आदि की व्यवस्था करता है।
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स्नान घाट पर जगमगाए आस्था के दीपक
ददाहू। रेणुका मेला अनेकों परंपराओं को अपने में संजोए हुए हैं। हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन पवित्र रेणुका झील में शाही स्नान के दौरान स्नानघाट पर आस्था के दीपक जगमगाते दिखाई दिए।
शाही स्नान के पश्चात बाहरी राज्यों से आई महिला ने स्नानघाट पर सरसों और तिल के तेल सहित शुद्ध घी के दीपक जगाए। श्रद्धालुओं ने अपनी इच्छा अनुसार 11, 21, 31, 51 और इससे अधिक दीपक एक साथ जलाएं। स्नान घाट पर इन दीयों की लंबी शृंखला बनकर एक अद्भूत नजारा बिखेरती रही।
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श्रद्धालुओं ने देवताओं को अर्पित किया पांच मुट्ठी अनाज
ददाहू। मेले में अनाज दान करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। मेले में आने वाले ग्रामीण श्रद्धालु पांच मुट्ठी (पंसेरी) अनाज लेकर अपने घरों से निकलते हैं। शाही स्नान करने के बाद वह घाट के समीप बने अस्थायी ठिकानों पर इसे बिखेरते हैं। मान्यता है कि भगवान परशुराम के प्रति आस्था रखने वाले किसान अपनी फसल में से पहली पांच मुट्ठी अनाज देवता को समर्पित करते हैं। गेहूं को अक्षय तृतीया के दिन और मक्की को रेणुका मेले के दौरान देवताओं को अर्पित किया जाता है।
-- संवाद
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शाही स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने मंदिरों में की पूजा-अर्चना
संवाद न्यूज एजेंसी
ददाहू (सिरमौर)। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले के अवसर पर हरिप्रबोधिनी एकादशी के दिन शनिवार को हजारों श्रद्धालुओं ने ऐतिहासिक रेणुका झील में आस्था की डुबकी लगाई। स्नान का यह सिलसिला सुबह ब्रह्ममुहूर्त से शुरू होकर देर शाम तक चलता रहा। एकादशी स्नान को रेणुका मेले का पहला शाही स्नान माना जाता है।
प्रथम स्नान महात्मय को लेकर जिला प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध किए थे। अनहोनी घटना से निपटने के लिए चार गोताखोरों को भी स्नान घाटों पर तैनात किया गया है। रेणुकाजी में स्थित संत-महात्माओं ने प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में शाही स्नान करके स्नान महात्मय का शुभारंभ किया। इसके बाद सभी श्रद्धालुओं ने बारी-बारी से ऐतिहासिक रेणुका झील में शाही स्नान की परंपरा को निभाया।
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कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन रेणुका झील में स्नान करने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि इस दिन रेणुका झील में शाही स्नान करने से जहां मोक्ष की प्राप्ति होती है, वहीं मनवांछित फल की प्राप्ति भी होती है। भगवान परशुराम और मां रेणुकाजी के प्रति लोगों की गहरी आस्था जुड़ी होने के कारण पूरे उत्तर भारत से श्रद्धालु शाही स्नान करने रेणुका आते हैं।
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स्नान के पश्चात श्रद्धालुओं ने रेणुका झील की परिक्रमा करके भगवान परशुराम और मां रेणुका मंदिर में पूजा-अर्चना की। इस दौरान रेणुका तीर्थ में स्थित निर्वाण आश्रम और गायत्री आश्रम में विशाल भंडारों का आयोजन किया गया। हरियाणा के रायपुर रानी से प्रगतिशील किसान महेन्द्र पाल शर्मा ने संन्यास आश्रम में चाय और पकोड़े का लंगर लगाया।
मेलार्थियों को धूल-मिट्टी से मिली निजात
ददाहू। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले में इस मर्तबा श्रद्धालुओं को धूल व मिट्टी से निजात मिली है। ददाहू से लेकर रेणुकाजी तीर्थ तक टैंकर से पानी का बार-बार छिड़काव करवाया जा रहा है। माइन ओनर वेलफेयर एसोसिएशन ने टैंकर मेला प्रशासन को उपलब्ध कराया है।
श्रद्धालुओं ने देवताओं के चरणों में गुजारी रात
ददाहू। अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले के में रात्रि जागरण की भी परंपरा है। इस परंपरा के तहत क्षेत्र से जुड़ी सैकड़ों पंचायतों के लोग दशमी के दिन रेणुकाजी तीर्थ में ही रात गुजारते हैं। दशमी से अगले दिन ब्रह्ममूहुर्त में ऐतिहासिक रेणुका झील में शाही स्नान करने के बाद ही वह अपने घरों को लौटते हैं। ठिठुरती सर्दी के बावजूद भी यह परंपरा आज भी कायम है। पहले श्रद्धालुओं को जहां जगह मिलती थी, वहां डेरा जमा कर ठहर जाते थे। अब रेणुका विकास बाेर्ड मंदिर परिसर के समीप ही शमियानों और टैंट आदि की व्यवस्था करता है।
स्नान घाट पर जगमगाए आस्था के दीपक
ददाहू। रेणुका मेला अनेकों परंपराओं को अपने में संजोए हुए हैं। हरि प्रबोधिनी एकादशी के दिन पवित्र रेणुका झील में शाही स्नान के दौरान स्नानघाट पर आस्था के दीपक जगमगाते दिखाई दिए।
शाही स्नान के पश्चात बाहरी राज्यों से आई महिला ने स्नानघाट पर सरसों और तिल के तेल सहित शुद्ध घी के दीपक जगाए। श्रद्धालुओं ने अपनी इच्छा अनुसार 11, 21, 31, 51 और इससे अधिक दीपक एक साथ जलाएं। स्नान घाट पर इन दीयों की लंबी शृंखला बनकर एक अद्भूत नजारा बिखेरती रही।
श्रद्धालुओं ने देवताओं को अर्पित किया पांच मुट्ठी अनाज
ददाहू। मेले में अनाज दान करने की सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम है। मेले में आने वाले ग्रामीण श्रद्धालु पांच मुट्ठी (पंसेरी) अनाज लेकर अपने घरों से निकलते हैं। शाही स्नान करने के बाद वह घाट के समीप बने अस्थायी ठिकानों पर इसे बिखेरते हैं। मान्यता है कि भगवान परशुराम के प्रति आस्था रखने वाले किसान अपनी फसल में से पहली पांच मुट्ठी अनाज देवता को समर्पित करते हैं। गेहूं को अक्षय तृतीया के दिन और मक्की को रेणुका मेले के दौरान देवताओं को अर्पित किया जाता है।

रेणुका जी के सन्यास आश्रम में चाय- पकोडे का लंगर तैयार करते रायपुर रानी के श्रद्धालु।संवाद

रेणुका जी के सन्यास आश्रम में चाय- पकोडे का लंगर तैयार करते रायपुर रानी के श्रद्धालु।संवाद

रेणुका जी के सन्यास आश्रम में चाय- पकोडे का लंगर तैयार करते रायपुर रानी के श्रद्धालु।संवाद

रेणुका जी के सन्यास आश्रम में चाय- पकोडे का लंगर तैयार करते रायपुर रानी के श्रद्धालु।संवाद