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सुविधाओं के अभाव में पलायन कर रहीं औद्योगिक इकाइयां : गोयल
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कच्चा, तैयार माल लाना-ले जाना पड़ रहा महंगा
हिमाचल प्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स पांवटा इकाई अध्यक्ष ने रखीं समस्याएं व मांगे
संवाद न्यूज एजेंसी
पांवटा साहिब (सिरमौर)। जिले में उद्योगपतियों की समस्याओं को दूर किए बिना नए उद्योगों की स्थापना संभव नहीं है। जटिल प्रक्रियाओं के कारण जमीन की उपलब्धता, धारा-118 की अनुमति एवं एनओसी प्राप्त करने में भारी दिक्कतें आ रही हैं। उद्योगपतियों के लिए यह सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। उत्तर पूर्व भारत में स्थापित औद्योगिक इकाइयों की तर्ज पर हिमाचल में भी उद्योगों को विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए। कच्चा और तैयार माल बाहरी राज्यों से मंगवाना पड़ता है। इंपोर्ट और ट्रांसपोर्ट की समस्याओं के चलते सुविधाओं के अभाव में औद्योगिक इकाइयां प्रदेश से पलायन कर रही हैं। यह बात हिमाचल प्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स पांवटा इकाई के अध्यक्ष सतीश गोयल ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कही।
सतीश गोयल ने बताया कि वर्ष 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिमाचल प्रदेश को दिए गए औद्योगिक पैकेज के बाद प्रदेश में रोजगार के बेहतर अवसर पैदा हुए। सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से क्षेत्र का विकास संभव हो पाया। इसके बाद उद्योगपतियों की समस्याओं के समाधान को लेकर कोई भी सरकार ठोस पहल नहीं कर सकी।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में हिमाचल प्रदेश के उद्योगपति कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। इनका समाधान किया जाना बेहद आवश्यक है। यदि प्रदेश में नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करनी हैं तो सबसे पहले जमीन की उपलब्धता, धारा-118 की अनुमति और एनओसी प्राप्त करने की जटिल प्रक्रिया को सरल करना होगा। कई-कई वर्षों तक उद्योगपतियों को धारा-118 की अनुमति लेकर भूमि खरीदने और फिर छोटी-छोटी एनओसी लेने में समय लग जाता है।
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गोयल ने कहा कि प्रदेश में कच्चा और तैयार माल बाहरी राज्यों से लाए और ले जाए जाते हैं। प्रदेश में ट्रांसपोर्ट की पर्याप्त सुविधाएं न होने से उद्योगों की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में यदि प्रदेश सरकार वास्तव में औद्योगिक विकास चाहती है तो नॉर्थ ईस्ट और जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर हिमाचल में भी विशेष सब्सिडी और सुविधाएं उद्योगपतियों को देनी होंगी।
उन्होंने बताया कि उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान से भी उद्योगपति कई बार मुलाकात कर चुके हैं। विशेष रूप से धारा-118 की अनुमति को सरल करने और छोटी-छोटी एनओसी से जुड़ी समस्याओं को उनके समक्ष उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान होता नजर नहीं आ रहा है।
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हिमाचल प्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स पांवटा इकाई अध्यक्ष ने रखीं समस्याएं व मांगे
संवाद न्यूज एजेंसी
पांवटा साहिब (सिरमौर)। जिले में उद्योगपतियों की समस्याओं को दूर किए बिना नए उद्योगों की स्थापना संभव नहीं है। जटिल प्रक्रियाओं के कारण जमीन की उपलब्धता, धारा-118 की अनुमति एवं एनओसी प्राप्त करने में भारी दिक्कतें आ रही हैं। उद्योगपतियों के लिए यह सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। उत्तर पूर्व भारत में स्थापित औद्योगिक इकाइयों की तर्ज पर हिमाचल में भी उद्योगों को विशेष सुविधाएं दी जानी चाहिए। कच्चा और तैयार माल बाहरी राज्यों से मंगवाना पड़ता है। इंपोर्ट और ट्रांसपोर्ट की समस्याओं के चलते सुविधाओं के अभाव में औद्योगिक इकाइयां प्रदेश से पलायन कर रही हैं। यह बात हिमाचल प्रदेश चैंबर ऑफ कॉमर्स पांवटा इकाई के अध्यक्ष सतीश गोयल ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कही।
सतीश गोयल ने बताया कि वर्ष 2003 में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने हिमाचल प्रदेश को दिए गए औद्योगिक पैकेज के बाद प्रदेश में रोजगार के बेहतर अवसर पैदा हुए। सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों की स्थापना से क्षेत्र का विकास संभव हो पाया। इसके बाद उद्योगपतियों की समस्याओं के समाधान को लेकर कोई भी सरकार ठोस पहल नहीं कर सकी।
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उन्होंने कहा कि वर्तमान में हिमाचल प्रदेश के उद्योगपति कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। इनका समाधान किया जाना बेहद आवश्यक है। यदि प्रदेश में नई औद्योगिक इकाइयां स्थापित करनी हैं तो सबसे पहले जमीन की उपलब्धता, धारा-118 की अनुमति और एनओसी प्राप्त करने की जटिल प्रक्रिया को सरल करना होगा। कई-कई वर्षों तक उद्योगपतियों को धारा-118 की अनुमति लेकर भूमि खरीदने और फिर छोटी-छोटी एनओसी लेने में समय लग जाता है।
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गोयल ने कहा कि प्रदेश में कच्चा और तैयार माल बाहरी राज्यों से लाए और ले जाए जाते हैं। प्रदेश में ट्रांसपोर्ट की पर्याप्त सुविधाएं न होने से उद्योगों की लागत बढ़ जाती है। ऐसे में यदि प्रदेश सरकार वास्तव में औद्योगिक विकास चाहती है तो नॉर्थ ईस्ट और जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर हिमाचल में भी विशेष सब्सिडी और सुविधाएं उद्योगपतियों को देनी होंगी।
उन्होंने बताया कि उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान से भी उद्योगपति कई बार मुलाकात कर चुके हैं। विशेष रूप से धारा-118 की अनुमति को सरल करने और छोटी-छोटी एनओसी से जुड़ी समस्याओं को उनके समक्ष उठाया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान होता नजर नहीं आ रहा है।