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सिरमौर के कई क्षेत्रों में लोक दिवाली’ का जश्न आरंभ
Updated Sat, 21 Oct 2017 07:13 PM IST
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दिवाली
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नाहन (सिरमौर)। देशभर में जहां दिवाली का त्योहार वीरवार को संपन्न हो गया वहीं सिरमौर जिले के रेणुका, शिलाई, राजगढ़ एवं पांवटा विधानसभा क्षेत्रों में आने वाले तीन दिनों तक लोक सांस्कृतिक कार्यक्रमों दौर शुरू हो जाएगा।
लोक कलाकार ‘रासे’, ‘बुढ़ियात’, ‘हारूल’, बिरसू, होल्डियात जैसे पहाड़ी लोकगीतों में समूह बनाकर पूरी रातभर नृत्य करेंगे। इस दौरान बुढ़ियात के लोग घर-घर जाकर पारंपरिक व्यंजन शाकुली, मुढ़ा, चिऊड़ो, मूंगफली आदि बांटेंगे।
गिरिपार क्षेत्र के कई गांवों में त्योहार लगातार पांच दिन तक मनाया जा रहा है। लोक कलाकार आकर्षक पारंपरिक वेशभूषा पहने हाथ में ढोल, नगाड़ा, करनाल ‘हुल्क’ एवं ‘घूर’ (पारंपरिक वाद्य यंत्र) लिए दिवाली के लोक गीत सुनाएंगे।
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क्षेत्र में यह प्रचलित है कि खेतीबाड़ी का काम समाप्त होने पर दिवाली की रात बलिराज जलाया जाता है। जिसका अर्थ है कि अब कृषि कार्य समाप्त हो चुके हैं और ग्रामीण अपने नाते रिश्तेदारों के साथ अंधेरी रातों को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम देख सकते हैं।
रेणुका विधानसभा क्षेत्र के नौहराधार, देवामानल, थनगा एवं चौरास में आने वाले तीन दिनों में लोक कलाकार दिवाली के उपलक्ष्य पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे वहीं गिरिपार के आंजभोज क्षेत्र में कहीं रामलीला तो कहीं जागरण एवं नाटक मंचन चल रहे हैं।
थनगा गांव निवासी सुभाष भारद्वाज, कविराज शर्मा, अशोक, अनिल भारद्वाज, वीरेंद्र भारद्वाज, राजेश शर्मा, संदीप शर्मा आदि ने बताया कि उनके गांव में दिवाली का पर्व तीन दिन तक मनाया जाता हैं। गांव के सभी लोग पहाड़ी गीतों एवं पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ नाचते हैं। रात को गांव के सभी लोग एकत्रित होकर उसे जलाते हैं।
बाक्स....
‘मूड़ा’ एवं एकत्र पैसे से होगा साझा आंगन
देवना थनगा पंचायत के थनगा गांव में दिवाली का पर्व अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां पर गांव के लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों पर थिरकते हुए तीन दिन तक दिवाली मनाते हैं। इस दौरान गांव के लोग सुबह से शाम तक हर घर में जाकर ‘मूड़ा’ असगलियां, पटांडे, राजमा खिचड़ी बनाते हैं एवं पैसे एकत्रित करते हैं और शाम को उन पैसों से सांझा आंगन में कार्यक्रम कर खूब मस्ती करते हैं।
शिलाई में एक माह बाद होगी बूढ़ी दिवाली
शिलाई विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाएगी। वहां यह कहावत प्रचलित है कि सियासत काल के राजा की बेटी भियुड़ी की दिवाली के दिन मौत हो गई थी जिससे शोक में दिवाली एक महीने बाद मनाई जो परंपरा आज भी निभाई जाती है।
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लोक कलाकार ‘रासे’, ‘बुढ़ियात’, ‘हारूल’, बिरसू, होल्डियात जैसे पहाड़ी लोकगीतों में समूह बनाकर पूरी रातभर नृत्य करेंगे। इस दौरान बुढ़ियात के लोग घर-घर जाकर पारंपरिक व्यंजन शाकुली, मुढ़ा, चिऊड़ो, मूंगफली आदि बांटेंगे।
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गिरिपार क्षेत्र के कई गांवों में त्योहार लगातार पांच दिन तक मनाया जा रहा है। लोक कलाकार आकर्षक पारंपरिक वेशभूषा पहने हाथ में ढोल, नगाड़ा, करनाल ‘हुल्क’ एवं ‘घूर’ (पारंपरिक वाद्य यंत्र) लिए दिवाली के लोक गीत सुनाएंगे।
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क्षेत्र में यह प्रचलित है कि खेतीबाड़ी का काम समाप्त होने पर दिवाली की रात बलिराज जलाया जाता है। जिसका अर्थ है कि अब कृषि कार्य समाप्त हो चुके हैं और ग्रामीण अपने नाते रिश्तेदारों के साथ अंधेरी रातों को रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम देख सकते हैं।
रेणुका विधानसभा क्षेत्र के नौहराधार, देवामानल, थनगा एवं चौरास में आने वाले तीन दिनों में लोक कलाकार दिवाली के उपलक्ष्य पर रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे वहीं गिरिपार के आंजभोज क्षेत्र में कहीं रामलीला तो कहीं जागरण एवं नाटक मंचन चल रहे हैं।
थनगा गांव निवासी सुभाष भारद्वाज, कविराज शर्मा, अशोक, अनिल भारद्वाज, वीरेंद्र भारद्वाज, राजेश शर्मा, संदीप शर्मा आदि ने बताया कि उनके गांव में दिवाली का पर्व तीन दिन तक मनाया जाता हैं। गांव के सभी लोग पहाड़ी गीतों एवं पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ नाचते हैं। रात को गांव के सभी लोग एकत्रित होकर उसे जलाते हैं।
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‘मूड़ा’ एवं एकत्र पैसे से होगा साझा आंगन
देवना थनगा पंचायत के थनगा गांव में दिवाली का पर्व अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां पर गांव के लोग पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुनों पर थिरकते हुए तीन दिन तक दिवाली मनाते हैं। इस दौरान गांव के लोग सुबह से शाम तक हर घर में जाकर ‘मूड़ा’ असगलियां, पटांडे, राजमा खिचड़ी बनाते हैं एवं पैसे एकत्रित करते हैं और शाम को उन पैसों से सांझा आंगन में कार्यक्रम कर खूब मस्ती करते हैं।
शिलाई में एक माह बाद होगी बूढ़ी दिवाली
शिलाई विधानसभा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाएगी। वहां यह कहावत प्रचलित है कि सियासत काल के राजा की बेटी भियुड़ी की दिवाली के दिन मौत हो गई थी जिससे शोक में दिवाली एक महीने बाद मनाई जो परंपरा आज भी निभाई जाती है।