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लगातार सिमट रहा पारंपरिक खेलों का अस्तित्व
Updated Sat, 25 Nov 2017 10:51 PM IST
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Sports
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अमर उजाला ब्यूरो
कालाअंब (सिरमौर)।
आधुनिक युग में क्रिकेट, हॉकी व फुटबाल आदि खेलों का क्रेज युवाओं में सिर चढ़कर बोल रहा है लेकिन स्थानीय खेल लगातार अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कबड्डी, खो-खो, लंबी कूद, ऊंची कूद, दौड़ व कुश्ती आदि खेलकूद गतिविधियां मात्र स्कूलों तक ही सिमट कर रह गई हैं। या फिर मेलों के आयोजनों में ही कबड्डी, दौड़ व कुश्ती आदि प्रतियोगिताएं देखी जाती हैं। क्रिकेट को युवा पहली पसंद मानते हैं।
हॉकी व फुटबाल दूसरे और तीसरे पायदान पर ही स्थिर हैं। क्रिकेट का क्रेज तो इतना बढ़ चुका है कि वन-डे मैच हो या फिर टेस्ट मैच हर गली-नुक्कड़ की दुकानों, बाजारों इत्यादि में टीवी के सामने लोगों का जमघट लगा रहता है। बावजूद इसके स्थानीय खेलों को इतनी गंभीरता से न तो देखा जाता है और न ही खेला जाता।
कुछ स्थानीय लोगों में सेवानिवृत्त अध्यापक फकीर चंद, प्रेमचंद, सुमेर चंद, राजकुमार, मामराज, रणधीर सिंह व सुभाष चौधरी ने बताया कि कबड्डी, खो-खो, लांग जंप, हाई जंप, दौड़, कुश्ती व अन्य खेल प्रतिस्पर्धाएं मात्र स्कूल टूर्नामेंट तक ही सिमट गई हैं। साधनों के अभाव व युवा वर्ग की इन खेलों के प्रति उदासीनता इन खेलों को समाप्ति की ओर ले जा रहे हैं। एक समय हुआ करता था जब युवा फुरसत के क्षणों में कबड्डी, खो-खो या फिर कुश्ती इत्यादि खेल खेला करते थे लेकिन आज युवा इन खेलों की अपेक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों को तवज्जो ज्यादा दे रहे हैं लेकिन बाकी खेलों के साथ-साथ हमारे स्थानीय खेलों को भी पहचान मिलनी चाहिए।
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स्थानीय खेलों को भी युवा तवज्जो दें तो कुछ पारंपरिक खेलों का अस्तित्व बचाया जा सकता है। इस दिशा में व्यापक सुधार करने की जरूरत है। समय-समय पर ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
उधर जिला अधिकारी सुबोध रमोल ने बताया कि स्थानीय खेलों से युवाओं का मोह भंग होना चिंताजनक है। खेल विभाग कबड्डी, खो-खो, बैडमिंटन एथलेटिक जूडो, फूटबाल और कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर जिला और खंड स्तर पर प्रतियोगिताएं करा रहा है ताकि युवाओं को इन खेलों के प्रति प्रोत्साहित किया जा सके।
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कालाअंब (सिरमौर)।
आधुनिक युग में क्रिकेट, हॉकी व फुटबाल आदि खेलों का क्रेज युवाओं में सिर चढ़कर बोल रहा है लेकिन स्थानीय खेल लगातार अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। कबड्डी, खो-खो, लंबी कूद, ऊंची कूद, दौड़ व कुश्ती आदि खेलकूद गतिविधियां मात्र स्कूलों तक ही सिमट कर रह गई हैं। या फिर मेलों के आयोजनों में ही कबड्डी, दौड़ व कुश्ती आदि प्रतियोगिताएं देखी जाती हैं। क्रिकेट को युवा पहली पसंद मानते हैं।
हॉकी व फुटबाल दूसरे और तीसरे पायदान पर ही स्थिर हैं। क्रिकेट का क्रेज तो इतना बढ़ चुका है कि वन-डे मैच हो या फिर टेस्ट मैच हर गली-नुक्कड़ की दुकानों, बाजारों इत्यादि में टीवी के सामने लोगों का जमघट लगा रहता है। बावजूद इसके स्थानीय खेलों को इतनी गंभीरता से न तो देखा जाता है और न ही खेला जाता।
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कुछ स्थानीय लोगों में सेवानिवृत्त अध्यापक फकीर चंद, प्रेमचंद, सुमेर चंद, राजकुमार, मामराज, रणधीर सिंह व सुभाष चौधरी ने बताया कि कबड्डी, खो-खो, लांग जंप, हाई जंप, दौड़, कुश्ती व अन्य खेल प्रतिस्पर्धाएं मात्र स्कूल टूर्नामेंट तक ही सिमट गई हैं। साधनों के अभाव व युवा वर्ग की इन खेलों के प्रति उदासीनता इन खेलों को समाप्ति की ओर ले जा रहे हैं। एक समय हुआ करता था जब युवा फुरसत के क्षणों में कबड्डी, खो-खो या फिर कुश्ती इत्यादि खेल खेला करते थे लेकिन आज युवा इन खेलों की अपेक्षा अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों को तवज्जो ज्यादा दे रहे हैं लेकिन बाकी खेलों के साथ-साथ हमारे स्थानीय खेलों को भी पहचान मिलनी चाहिए।
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स्थानीय खेलों को भी युवा तवज्जो दें तो कुछ पारंपरिक खेलों का अस्तित्व बचाया जा सकता है। इस दिशा में व्यापक सुधार करने की जरूरत है। समय-समय पर ऐसी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाना चाहिए।
उधर जिला अधिकारी सुबोध रमोल ने बताया कि स्थानीय खेलों से युवाओं का मोह भंग होना चिंताजनक है। खेल विभाग कबड्डी, खो-खो, बैडमिंटन एथलेटिक जूडो, फूटबाल और कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर जिला और खंड स्तर पर प्रतियोगिताएं करा रहा है ताकि युवाओं को इन खेलों के प्रति प्रोत्साहित किया जा सके।