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Shimla Pathron Ka Mela: शिमला के धामी में जमकर बरसे पत्थर, खून से हुआ मां भद्रकाली का तिलक; जानें मान्यता
Tue, 21 Oct 2025 06:44 PM IST
अंकेश डोगरा
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला।
Published by: अंकेश डोगरा
Updated Tue, 21 Oct 2025 06:44 PM IST
सार
Himachal Dhami Tradition: हिमाचल प्रदेश के शिमला में हर साल दिवाली के एक दिन पत्थर मेले का आयोजन होता है। इसी कड़ी में धामी में खेल का चौरा नामक स्थान पर घाटी के दोनों ओर से जमोगी और कटेड़ू टोलियों के बीच जमकर पत्थरों की बरसात हुई। पढ़ें पूरी खबर...
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शिमला के समीप धामी में आयोजित पत्थर मेले में पथराव करते युवा।
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
राजधानी से सटे शिमला ग्रामीण के हलोग धामी में दिवाली के दूसरे दिन होने वाले पत्थर के खेल की पौराणिक देव परंपरा के पत्थर के खेल का आयोजन किया गया। धामी में खेल का चौरा नामक स्थान पर घाटी के दोनों ओर से जमोगी और कटेड़ू टोलियों के बीच जमकर पत्थरों की बरसात हुई। इस बार करीब पौना घंटा तक लगातार दोनों टोलियों की ओर से पत्थर मारे गए। चार बजे से लेकर 4:40 तक हुए इस खेल में कटेड़ू टोली के सुभाष के हाथ में पत्थर लगा। उसके खून से परंपरा के अनुसार खेल का चौरा में स्थित मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर पत्थर का खेल समपन्न हुआ। पत्थर लगने पर मौजूद सैकड़ों लोग ढोल नगाड़ों की थाप पर एक साथ थिरकते रहे।
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राजधानी शिमला से 35 किलोमीटर दूर धामी के खेल का चौरा में मंगलवार को पारंपरिक पत्थर का खेल करीब चार बजे शुरू हुआ । दरबार से करीब तीन बजे राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह, पुजारी तनुज और राकेश शर्मा के पूजा अर्चना और पूजा के फूल लेकर ढोल नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा खेल का चौरा के लिए निकली गई। शोभा यात्रा में पुष्पेंद्र सिंह, दुर्गेश सिंह, रणजीत सिंह, चेतराम, लेख राम, बाबु राम, प्रकाश, हेत राम , प्रकाश नील सहित अन्य लोग 3:40 बजे सती का शारड़ा स्मारक पर पहुंचे।
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मत्था टेकने के बाद झंडा लहराने के आयोजकों के इशारे के साथ ही घाटी के एक ओर एकत्र जमोगी, और दूसरी ओर कटेड़ू टोली के लोगों न पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। पत्थर के इस खेल के दौराना बीच से गुजर रही सड़क से वाहनों की आवाजाही और, पैदल लोगों की आवाजाही रोक दी गई थी। करीब 4:40 पर कटेड़ू टोली की ओर से सुभाष के हाथ में पत्थर लगने पर खेल को आयोजकों ने रोकने का इशारा किया। समारक पर मत्था टेका गया, इसके बाद पहाड़ी पर बने भद्रकाली के मंदिर में तिलक कर परंपरा को पूरा किया गया। इसके बाद सुभाष को प्राथमिक उपचार दिया गया। इस रोमांचक और अनौखी परंपरा को देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटे थे। जगदीप सिंह ने माता के मंदिर में पूजा अर्चना कर क्षेत्र की रक्षा और लोगों की सुख समृद्धि के लिए पूजा अर्चना की।
इन दो टोलियों के बीच होता है पत्थरों का खेल
जमोगी और कटेड़ू टोलियां इस खेल में आमने सामने होती है। जमोगी के खूंदों की ओर से जनिया, जमोगी, प्लानिया, कोठी, चईंयां, ओखरू गांव के लोग शामिल होते है। वहीं कटेड़ू राज परिवार की ओर से टोली में तुनड़ू, धगोई, बठमाणा और इसके आसपास के गांव के युवा शामिल होते हैं।
जमोगी और कटेड़ू टोलियां इस खेल में आमने सामने होती है। जमोगी के खूंदों की ओर से जनिया, जमोगी, प्लानिया, कोठी, चईंयां, ओखरू गांव के लोग शामिल होते है। वहीं कटेड़ू राज परिवार की ओर से टोली में तुनड़ू, धगोई, बठमाणा और इसके आसपास के गांव के युवा शामिल होते हैं।
नर बलि के विकल्प के रूप में शुरू हुई थी प्रथा
राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह ने बताया सदियों पूर्व राज परिवार की राज माता ने मानव बलि के विकल्प के रूप में इस खेल को शुरू किया था, जिससे क्षेत्र की जनता पर कोई संकट न आए। धामी रियासत में एक के बाद एक अनिष्ट को होने से रोकने और लोगों की सुख-समृद्धि के लिए नरबलि की प्रथा होती थी। राज माता ने इसे बंद करवाया और इसके स्थान पर पत्थर का खेल शुरू करवाया, जिससे किसी को अपनी जान न देनी पड़े और अनिष्ट न हो। इस विकल्प में खेल में चोट लगने पर निकलने वाले खून से भद्रकाली के खेल का चौरा में बने मंदिर में तिलक किया जाने लगा। तब से यह लगातार प्रथा चलती आ रही है। कोरोना काल में जगदीप सिंह ने अपने खून से भद्रकाली को तिलक कर इस प्रथा को टूटने नहीं दिया।
राज परिवार के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह ने बताया सदियों पूर्व राज परिवार की राज माता ने मानव बलि के विकल्प के रूप में इस खेल को शुरू किया था, जिससे क्षेत्र की जनता पर कोई संकट न आए। धामी रियासत में एक के बाद एक अनिष्ट को होने से रोकने और लोगों की सुख-समृद्धि के लिए नरबलि की प्रथा होती थी। राज माता ने इसे बंद करवाया और इसके स्थान पर पत्थर का खेल शुरू करवाया, जिससे किसी को अपनी जान न देनी पड़े और अनिष्ट न हो। इस विकल्प में खेल में चोट लगने पर निकलने वाले खून से भद्रकाली के खेल का चौरा में बने मंदिर में तिलक किया जाने लगा। तब से यह लगातार प्रथा चलती आ रही है। कोरोना काल में जगदीप सिंह ने अपने खून से भद्रकाली को तिलक कर इस प्रथा को टूटने नहीं दिया।