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मिड-डे मील वर्करों को मिले 12,000 प्रतिमाह मानदेय : सीटू
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सीटू ब्लॉक इकाई सराहन की बैठक में विभिन्न मांगों पर की गई चर्चा, निजीकरण के खिलाफ उठाई मांग
कहा, एमडीएम योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करना निंदनीय
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। मिड-डे मील वर्कर यूनियन ने केंद्र और प्रदेश सरकार से 12,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने और 10 के बजाय वर्करों को 12 माह का मानदेय देने की मांग की है। सीटू ने मिड-डे मील योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करने पर कड़ा एतराज जताया है। साथ ही सीटू ने राज्य सरकार की ओर से बजट में एमडीएम वर्करों के वेतन में पांच सौ रुपये के इजाफे को मजाक करार दिया है। मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन संबंधित सीटू ब्लॉक इकाई सराहन की बैठक यूनियन अध्यक्ष मीना की अध्यक्षता में ज्यूरी में हुई। बैठक में सीटू जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह, यूनियन अध्यक्ष मीना महासचिव संगीता ने कहा कि केंद्र की सरकार पूंजीपतियों को फायदा पंहुचाने के लिए मिड-डे मील योजना का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है, जबकि देश बढ़ते कुपोषण और भुखमरी का सामना कर रहा है। केंद्र सरकार की 45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिशों के अनुसार मिड-डे मील मजदूरों को मजदूर का दर्जा देने, पेंशन, ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य सहित अन्य सुविधाओं को लागू नहीं किया जा रहा। केंद्र सरकार द्वारा मिड-डे मील वर्करों के मानदेय में वर्ष 2009 के बाद से अभी तक कोई वृद्धि नहीं की गई है। वहीं इस योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करके इसे खत्म करने का खाका तैयार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केंद्रीय रसोईघर और डीबीटी योजना शुरू कर रही है और स्कूलों में मिड- डे मील के खाते बंद कर दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बजट में मिड-डे मील वर्करों का मानदेय बढ़ाकर 4,500 रुपये एक अप्रैल 2024 से देने की घोषणा की है। मानदेय में मात्र 500 रुपये की बढ़ोतरी मिड-डे मील वर्करों के साथ मजाक है। मिड-डे मील वर्करों को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा रही। प्रदेश उच्च न्यायालय के 31 अक्तूबर 2019 के निर्णय अनुसार मिड-डे मील वर्कर्स को दस महीने के बजाए 12 महीने का मानदेय देने के आदेश को न तो पिछली सरकार और न ही वर्तमान लागू कर रही है। यूनियन ने सरकार से मिड-डे मिल वर्करों 12,000 रुपये न्यूनतम वेतन देने, मिड-डे मील वर्करों को मजदूर का दर्जा देने, 10 माह के बजाय 12 माह का वेतन देने, 45वें श्रम सम्मेलन के अनुसार मजदूर का दर्जा देने, छुट्टियां, ग्रेच्युटी, पेंशन व सामाजिक सुरक्षा देने की मांग की है। साथ ही पंजाब सरकार की तर्ज पर छुट्टियां देने, हरियाणा की तर्ज पर दो जोड़ी वर्दी देने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को रद्द करने और योजना का किसी भी रूप में निजीकरण न करने की मांग की है। उन्होंने चेताया कि यदि जल्द मांगों को लेकर गौर नहीं किया गया तो आने वाले समय में आंदोलन को उग्र किया जाएगा। इस मौके पर पूनम, हिवकी देवी, सुषमा, नवनीता, सुंदर देवी, पुष्पा और सुमन सहित अन्य मौजूद रहे।
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कहा, एमडीएम योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करना निंदनीय
संवाद न्यूज एजेंसी
रामपुर बुशहर। मिड-डे मील वर्कर यूनियन ने केंद्र और प्रदेश सरकार से 12,000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देने और 10 के बजाय वर्करों को 12 माह का मानदेय देने की मांग की है। सीटू ने मिड-डे मील योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करने पर कड़ा एतराज जताया है। साथ ही सीटू ने राज्य सरकार की ओर से बजट में एमडीएम वर्करों के वेतन में पांच सौ रुपये के इजाफे को मजाक करार दिया है। मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन संबंधित सीटू ब्लॉक इकाई सराहन की बैठक यूनियन अध्यक्ष मीना की अध्यक्षता में ज्यूरी में हुई। बैठक में सीटू जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह, यूनियन अध्यक्ष मीना महासचिव संगीता ने कहा कि केंद्र की सरकार पूंजीपतियों को फायदा पंहुचाने के लिए मिड-डे मील योजना का निजीकरण करने की कोशिश कर रही है, जबकि देश बढ़ते कुपोषण और भुखमरी का सामना कर रहा है। केंद्र सरकार की 45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिशों के अनुसार मिड-डे मील मजदूरों को मजदूर का दर्जा देने, पेंशन, ग्रेच्युटी और स्वास्थ्य सहित अन्य सुविधाओं को लागू नहीं किया जा रहा। केंद्र सरकार द्वारा मिड-डे मील वर्करों के मानदेय में वर्ष 2009 के बाद से अभी तक कोई वृद्धि नहीं की गई है। वहीं इस योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री पोषण योजना करके इसे खत्म करने का खाका तैयार किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केंद्रीय रसोईघर और डीबीटी योजना शुरू कर रही है और स्कूलों में मिड- डे मील के खाते बंद कर दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बजट में मिड-डे मील वर्करों का मानदेय बढ़ाकर 4,500 रुपये एक अप्रैल 2024 से देने की घोषणा की है। मानदेय में मात्र 500 रुपये की बढ़ोतरी मिड-डे मील वर्करों के साथ मजाक है। मिड-डे मील वर्करों को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई जा रही। प्रदेश उच्च न्यायालय के 31 अक्तूबर 2019 के निर्णय अनुसार मिड-डे मील वर्कर्स को दस महीने के बजाए 12 महीने का मानदेय देने के आदेश को न तो पिछली सरकार और न ही वर्तमान लागू कर रही है। यूनियन ने सरकार से मिड-डे मिल वर्करों 12,000 रुपये न्यूनतम वेतन देने, मिड-डे मील वर्करों को मजदूर का दर्जा देने, 10 माह के बजाय 12 माह का वेतन देने, 45वें श्रम सम्मेलन के अनुसार मजदूर का दर्जा देने, छुट्टियां, ग्रेच्युटी, पेंशन व सामाजिक सुरक्षा देने की मांग की है। साथ ही पंजाब सरकार की तर्ज पर छुट्टियां देने, हरियाणा की तर्ज पर दो जोड़ी वर्दी देने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को रद्द करने और योजना का किसी भी रूप में निजीकरण न करने की मांग की है। उन्होंने चेताया कि यदि जल्द मांगों को लेकर गौर नहीं किया गया तो आने वाले समय में आंदोलन को उग्र किया जाएगा। इस मौके पर पूनम, हिवकी देवी, सुषमा, नवनीता, सुंदर देवी, पुष्पा और सुमन सहित अन्य मौजूद रहे।