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Rampur Bushahar News: भूंडा महायज्ञ के लिए स्पैल वैली के ग्यारह गांवों में नए नियम लागू
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संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू । भूंडा महायज्ञ के लिए तारीख तय होने के बाद स्पैल वैली के 11 गांवों में नए नियम लागू हो गए हैं। अब चार जनवरी तक इस क्षेत्र के ग्यारह गांव में बड़े धार्मिक अनुष्ठान पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। मंदिर कमेटी के लिए भी कुछ अलग नियम लागू हो जाते हैं। इस दौरान पूरे क्षेत्र में शादी समारोह पर भी पूर्ण प्रतिबंध रहता है। स्पैल वैली के देवता बकरालू मंदिर दलगांव में भूंडा महायंज्ञ का आयोजन 39 साल बाद किया जा रहा है। दलगांव में वर्ष 1985 में भुंडा महायज्ञ हुआ था। उसके बाद अब जनवरी 2025 में महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इस अनुष्ठान की मेजबानी स्पैल वैली के करालश, खोडसू, भमनाला, गांवणा, कुटाड़ा, बश्टाडी, बरेटली, खशकंडी सहित करीब 11 गांव कर रहे हैं। इस भूंडा महायज्ञ में रामपुर क्षेत्र के दलोग जराशी गांव के लोग भी शामिल होंगे। भूंडा महायज्ञ शांत के बाद सबसे बड़ा अनुष्ठान रहता है। इसको कई जगह नरमेध यज्ञ के नाम से भी जाना जाता है।
दो जनवरी को संघेड़ा रस्म के साथ शुरू होगा महायज्ञ
महायज्ञ का शुभारंभ अप्रैल माह में मुंजी (विशेष घांस) काटने से हो गया था। अक्तूबर में मंदिर प्रांगण में पारंपरिक विधि विधान के साथ शिरा रस्म हुई। उसके बाद बेड़ा (देवता का चयनित व्यक्ति) ने मुंजी (विशेष घांस) की एक लंबी रस्सी बनाने का कार्य आरंभ किया। दो जनवरी को संघेड़ा रस्म के साथ महायज्ञ का आरंभ होगा। तीन जनवरी को मंदिर में शिखा पूजन की रस्म निभाई जाएगी। तीन जनवरी को बेड़ा डालने की मुख्य रस्म निभाई जाएगी, जिसमें रस्सी को ऊंची पहाड़ी से नीचे एक से दो किलोमीटर तक बांधा जाएगा। रस्सी पर काठ की घोड़ी पर बेड़े (देवता का चयनित व्यक्ति) को बैठाकर पहाड़ी से नीचे छोड़ा जाएगा। करीब एक से दो किलोमीटर तक रस्सी पर फिसलकर बेड़ा पहाड़ी से दूसरे छोर तक जाता है। यह भुंडा महायज्ञ की मुख्य रस्म होगी। विशेष समुदाय की इस व्यक्ति की मंदिर में एक साल से पूरी सेवा की जाती है। पांच जनवरी को उछड़-पाछड़ रस्म के साथ महायज्ञ का समापन होगा।
पांच जनवरी को होगी देवताओं की विदाई
दलगांव निवासी पंचायत के पूर्व प्रधान बलबीर बाष्टू का कहना है कि दो जनवरी को देवताओं व मेहमानों का स्वागत कार्यक्रम होता है। अगले दिन तीन जनवरी को शिखा व फेर का पूजन होता है। चार जनवरी को बेड़ा रस्सी पर चढ़ाया जाता है। पांच जनवरी को देवताओं की विदाई का कार्यक्रम रहेगा। करीब ग्यारह गांव के लोग एक साल से अनुष्ठान की तैयारी कर रहे है। तारीख तय होने पर बड़े अनुष्ठान इस क्षेत्र में नहीं होंगे। इस महायज्ञ में हजारों लोगों के पहुंचने की संभावना है।
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रोहड़ू । भूंडा महायज्ञ के लिए तारीख तय होने के बाद स्पैल वैली के 11 गांवों में नए नियम लागू हो गए हैं। अब चार जनवरी तक इस क्षेत्र के ग्यारह गांव में बड़े धार्मिक अनुष्ठान पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। मंदिर कमेटी के लिए भी कुछ अलग नियम लागू हो जाते हैं। इस दौरान पूरे क्षेत्र में शादी समारोह पर भी पूर्ण प्रतिबंध रहता है। स्पैल वैली के देवता बकरालू मंदिर दलगांव में भूंडा महायंज्ञ का आयोजन 39 साल बाद किया जा रहा है। दलगांव में वर्ष 1985 में भुंडा महायज्ञ हुआ था। उसके बाद अब जनवरी 2025 में महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इस अनुष्ठान की मेजबानी स्पैल वैली के करालश, खोडसू, भमनाला, गांवणा, कुटाड़ा, बश्टाडी, बरेटली, खशकंडी सहित करीब 11 गांव कर रहे हैं। इस भूंडा महायज्ञ में रामपुर क्षेत्र के दलोग जराशी गांव के लोग भी शामिल होंगे। भूंडा महायज्ञ शांत के बाद सबसे बड़ा अनुष्ठान रहता है। इसको कई जगह नरमेध यज्ञ के नाम से भी जाना जाता है।
दो जनवरी को संघेड़ा रस्म के साथ शुरू होगा महायज्ञ
महायज्ञ का शुभारंभ अप्रैल माह में मुंजी (विशेष घांस) काटने से हो गया था। अक्तूबर में मंदिर प्रांगण में पारंपरिक विधि विधान के साथ शिरा रस्म हुई। उसके बाद बेड़ा (देवता का चयनित व्यक्ति) ने मुंजी (विशेष घांस) की एक लंबी रस्सी बनाने का कार्य आरंभ किया। दो जनवरी को संघेड़ा रस्म के साथ महायज्ञ का आरंभ होगा। तीन जनवरी को मंदिर में शिखा पूजन की रस्म निभाई जाएगी। तीन जनवरी को बेड़ा डालने की मुख्य रस्म निभाई जाएगी, जिसमें रस्सी को ऊंची पहाड़ी से नीचे एक से दो किलोमीटर तक बांधा जाएगा। रस्सी पर काठ की घोड़ी पर बेड़े (देवता का चयनित व्यक्ति) को बैठाकर पहाड़ी से नीचे छोड़ा जाएगा। करीब एक से दो किलोमीटर तक रस्सी पर फिसलकर बेड़ा पहाड़ी से दूसरे छोर तक जाता है। यह भुंडा महायज्ञ की मुख्य रस्म होगी। विशेष समुदाय की इस व्यक्ति की मंदिर में एक साल से पूरी सेवा की जाती है। पांच जनवरी को उछड़-पाछड़ रस्म के साथ महायज्ञ का समापन होगा।
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पांच जनवरी को होगी देवताओं की विदाई
दलगांव निवासी पंचायत के पूर्व प्रधान बलबीर बाष्टू का कहना है कि दो जनवरी को देवताओं व मेहमानों का स्वागत कार्यक्रम होता है। अगले दिन तीन जनवरी को शिखा व फेर का पूजन होता है। चार जनवरी को बेड़ा रस्सी पर चढ़ाया जाता है। पांच जनवरी को देवताओं की विदाई का कार्यक्रम रहेगा। करीब ग्यारह गांव के लोग एक साल से अनुष्ठान की तैयारी कर रहे है। तारीख तय होने पर बड़े अनुष्ठान इस क्षेत्र में नहीं होंगे। इस महायज्ञ में हजारों लोगों के पहुंचने की संभावना है।
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