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जनजातीय जिले के लोगों का स्वास्थ्य राम भरोसे
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रिकांगपिओ (किन्नौर)। जनजातीय जिले में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई हैं। प्रदेश में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की, जिले की स्वास्थ्य सुविधाओं को सुधारने में दोनों ही सरकारें फेल साबित हुई हैं। जिले के लोगों को केवल घोषणाओं में ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दी जा रही हैं, जबकि धरातल पर स्वास्थ्य सुविधाओं की पोल खुल रही है।
जिले की 65 ग्राम पंचायतों में हजारों की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बीते कई दशकों से तरसना पड़ रहा है। देश भर के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दी जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी और सुधार करने के सरकार दावे तो कर रही है, लेकिन बावजूद इसके किन्नौर जिले में सुधार के नाम पर कुछ नहीं हो रहा। कोरोना काल में भी जनजातीय जिले के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जूझ रहे हैं। जिले के विभिन्न अस्पतालों में 538 विभिन्न श्रेणी के डॉक्टर, कर्मचारी, स्टाफ नर्स, चतुर्थ श्रेणी आदि के पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान समय में अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में 342 अधिकारी और कर्मचारी ही सेवाएं दे रहे हैं। बीते एक दशक से 196 पदों पर सरकार और स्वास्थ्य विभाग नियुक्तियां नहीं कर पाया है। जिले में बेहतर उपचार न मिलने के कारण मरीजों को रामपुर, शिमला, सोलन, चंडीगढ़ के अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है। क्षेत्रीय अस्पताल रिकांगपिओ में कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद 10 वर्ष से रिक्त पड़े हैं। अस्पताल में आंख, नाक और कान का विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। शिशु विशेषज्ञ का पद 7 वर्षों से, रेडियोलॉजिस्ट का 4, ऑर्थो विशेषज्ञ का भी 4 और गायनोलॉजिस्ट का पद पिछले 2 महीने से खाली पड़ा है। इस कोरोना वायरस के दौर में महिला विशेषज्ञ डॉक्टर न होने से महिलाओं को परेशानी हो रही है। जिले की राम देवी, सुरेनी नेगी, शकुंतला, रेशमी, आशा देवी आदि ने कहा कि जिले के अस्पताल में उपचार की सुविधाएं नाममात्र हैं, जिसके चलते उन्हें रामपुर, शिमला और चंडीगढ़ का रुख करना पड़ रहा है। उधर, सीएमओ किन्नौर डॉ. सोनम नेगी ने कहा कि किन्नौर के अस्पतालों में कई पद खाली पड़े हैं। विभाग रिक्त पदों को लेकर समय-समय पर प्रदेश सरकार और विभागाधिकारियों को करता रहता है।
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जिले की 65 ग्राम पंचायतों में हजारों की आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बीते कई दशकों से तरसना पड़ रहा है। देश भर के अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दी जा रही स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी और सुधार करने के सरकार दावे तो कर रही है, लेकिन बावजूद इसके किन्नौर जिले में सुधार के नाम पर कुछ नहीं हो रहा। कोरोना काल में भी जनजातीय जिले के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जूझ रहे हैं। जिले के विभिन्न अस्पतालों में 538 विभिन्न श्रेणी के डॉक्टर, कर्मचारी, स्टाफ नर्स, चतुर्थ श्रेणी आदि के पद स्वीकृत हैं, जबकि वर्तमान समय में अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में 342 अधिकारी और कर्मचारी ही सेवाएं दे रहे हैं। बीते एक दशक से 196 पदों पर सरकार और स्वास्थ्य विभाग नियुक्तियां नहीं कर पाया है। जिले में बेहतर उपचार न मिलने के कारण मरीजों को रामपुर, शिमला, सोलन, चंडीगढ़ के अस्पतालों की ओर रुख करना पड़ रहा है। क्षेत्रीय अस्पताल रिकांगपिओ में कई विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद 10 वर्ष से रिक्त पड़े हैं। अस्पताल में आंख, नाक और कान का विशेषज्ञ डॉक्टर नहीं है। शिशु विशेषज्ञ का पद 7 वर्षों से, रेडियोलॉजिस्ट का 4, ऑर्थो विशेषज्ञ का भी 4 और गायनोलॉजिस्ट का पद पिछले 2 महीने से खाली पड़ा है। इस कोरोना वायरस के दौर में महिला विशेषज्ञ डॉक्टर न होने से महिलाओं को परेशानी हो रही है। जिले की राम देवी, सुरेनी नेगी, शकुंतला, रेशमी, आशा देवी आदि ने कहा कि जिले के अस्पताल में उपचार की सुविधाएं नाममात्र हैं, जिसके चलते उन्हें रामपुर, शिमला और चंडीगढ़ का रुख करना पड़ रहा है। उधर, सीएमओ किन्नौर डॉ. सोनम नेगी ने कहा कि किन्नौर के अस्पतालों में कई पद खाली पड़े हैं। विभाग रिक्त पदों को लेकर समय-समय पर प्रदेश सरकार और विभागाधिकारियों को करता रहता है।
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