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जिला परिषद चुनाव : रोहड़ू में एक ही दल के कई उम्मीदवार, अंदरूनी खींचतान बनी चुनौती
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रोहड़ू विधानसभा के पांच जिला परिषद वार्डों से 35 उम्मीदवारों ने भरे हैं नामांकन
. अब छंटनी के बाद नामांकन वापसी पर सबकी नजरें
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। रोहड़ू विधानसभा क्षेत्र में जिला परिषद चुनाव इस बार बड़े राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए चुनौती बन गया है। रोहड़ू विधानसभा के पांच जिला परिषद वार्डों से 35 उम्मीदवारों ने नामांकन भरे हैं। अब छंटनी के बाद नामांकन वापसी की सबकी नजरें हैं। नेताओं के लिए अपने ही समर्थकों के बीच संतुलन बनाना कठिन हो गया है। इससे चुनावी समीकरण उलझ चुके हैं। सबसे अधिक परेशानी इस बात को लेकर है कि एक ही दल से जुड़े कई उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतर आए हैं, जिससे अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। वहीं, कांग्रेस पार्टी अभी तक किसी भी उम्मीदवार को आधिकारिक समर्थन देने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है। पार्टी के कई स्थानीय नेता अलग-अलग प्रत्याशियों के पक्ष में सक्रिय हैं। ऐसे में किसी एक उम्मीदवार को समर्थन देने का निर्णय पार्टी के भीतर असंतोष पैदा कर सकता है। दूसरी ओर भाजपा ने तीन उम्मीदवारों को अपना समर्थित प्रत्याशी घोषित किया है, लेकिन वहां भी कार्यकर्ताओं के बीच अलग-अलग गुट सक्रिय नजर आ रहे हैं। रोहड़ू के पांच जिला परिषद वार्डों में कुल 35 उम्मीदवार मैदान में होने से मुकाबला बेहद रोचक बन सकता है। रोहडू विधानसभा क्षेत्र में डोडरा क्वार सहित खशधार, टिक्कर, भलूण, सीमा रंटाड़ी पांच जिला परिषद के वार्ड हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव केवल दलों के प्रतीक चिह्न या विचारधारा पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव, जातीय समीकरण, गांव स्तर की पकड़ और स्थानीय रिश्तों पर अधिक आधारित दिखाई दे रहा है। यदि नाम वापसी तक यही समीकरण बने रहे, तो पार्टी विचारधारा से जुड़े बड़े नेताओं के लिए खुलकर किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई नेता एक प्रत्याशी के समर्थन में खुलकर उतरता है, तो उसी दल या समर्थक वर्ग का दूसरा हिस्सा नाराज होकर विरोध में खड़ा हो सकता है। इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों तक पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि कई नेता फिलहाल संतुलित रणनीति के कारण सीधे समर्थन से बच रहे हैं। हालांकि, नाम वापसी का समय 15 मई तक रखा गया, इसलिए कई गांवों में अब उम्मीदवारों को बैठाने और नाम वापसी करवाने के प्रयास भी तेज हो गए हैं। स्थानीय स्तर पर बैठकों का दौर जारी है ताकि वोटों के बिखराव को रोका जा सके और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की स्थिति न बने। हालांकि, नामांकन के बाद जिस तरह चुनावी सरगर्मियां बढ़ी हैं, उससे साफ है कि इस बार जिला परिषद चुनाव में अंदरूनी राजनीति ही सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है।
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. अब छंटनी के बाद नामांकन वापसी पर सबकी नजरें
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। रोहड़ू विधानसभा क्षेत्र में जिला परिषद चुनाव इस बार बड़े राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए चुनौती बन गया है। रोहड़ू विधानसभा के पांच जिला परिषद वार्डों से 35 उम्मीदवारों ने नामांकन भरे हैं। अब छंटनी के बाद नामांकन वापसी की सबकी नजरें हैं। नेताओं के लिए अपने ही समर्थकों के बीच संतुलन बनाना कठिन हो गया है। इससे चुनावी समीकरण उलझ चुके हैं। सबसे अधिक परेशानी इस बात को लेकर है कि एक ही दल से जुड़े कई उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतर आए हैं, जिससे अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। वहीं, कांग्रेस पार्टी अभी तक किसी भी उम्मीदवार को आधिकारिक समर्थन देने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है। पार्टी के कई स्थानीय नेता अलग-अलग प्रत्याशियों के पक्ष में सक्रिय हैं। ऐसे में किसी एक उम्मीदवार को समर्थन देने का निर्णय पार्टी के भीतर असंतोष पैदा कर सकता है। दूसरी ओर भाजपा ने तीन उम्मीदवारों को अपना समर्थित प्रत्याशी घोषित किया है, लेकिन वहां भी कार्यकर्ताओं के बीच अलग-अलग गुट सक्रिय नजर आ रहे हैं। रोहड़ू के पांच जिला परिषद वार्डों में कुल 35 उम्मीदवार मैदान में होने से मुकाबला बेहद रोचक बन सकता है। रोहडू विधानसभा क्षेत्र में डोडरा क्वार सहित खशधार, टिक्कर, भलूण, सीमा रंटाड़ी पांच जिला परिषद के वार्ड हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव केवल दलों के प्रतीक चिह्न या विचारधारा पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव, जातीय समीकरण, गांव स्तर की पकड़ और स्थानीय रिश्तों पर अधिक आधारित दिखाई दे रहा है। यदि नाम वापसी तक यही समीकरण बने रहे, तो पार्टी विचारधारा से जुड़े बड़े नेताओं के लिए खुलकर किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना जोखिम भरा साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कोई नेता एक प्रत्याशी के समर्थन में खुलकर उतरता है, तो उसी दल या समर्थक वर्ग का दूसरा हिस्सा नाराज होकर विरोध में खड़ा हो सकता है। इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों तक पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि कई नेता फिलहाल संतुलित रणनीति के कारण सीधे समर्थन से बच रहे हैं। हालांकि, नाम वापसी का समय 15 मई तक रखा गया, इसलिए कई गांवों में अब उम्मीदवारों को बैठाने और नाम वापसी करवाने के प्रयास भी तेज हो गए हैं। स्थानीय स्तर पर बैठकों का दौर जारी है ताकि वोटों के बिखराव को रोका जा सके और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव की स्थिति न बने। हालांकि, नामांकन के बाद जिस तरह चुनावी सरगर्मियां बढ़ी हैं, उससे साफ है कि इस बार जिला परिषद चुनाव में अंदरूनी राजनीति ही सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है।