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निजीकरण के खिलाफ रामपुर में सीटू का प्रदर्शन, जमकर की नारेबाजी
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रामपुर के नीरथ में विरोध प्रदर्शन करते सीटू कार्यकर्ता।
- फोटो : RAMPUR-HP
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रामपुर बुशहर। केंद्रीय ट्रेड यूनियन के आह्वान पर केंद्र सरकार की राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन और सार्वजनिक संपत्तियों को कारपोरेट के हवाले करने की योजना के खिलाफ वीरवार को सीटू ने नीरथ और बायल में विरोध-प्रदर्शन किया।
सीटू राज्य सचिव प्रेम गौतम, जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह, बिहारी सेवगी और नीलदत्त शर्मा ने कहा कि मोदी शासन के तहत देश की अर्थव्यवस्था चौतरफा निजीकरण के हमले का सामना कर रही है। मगर निजीकरण की शुरुआत वर्तमान शासन के तहत शुरू नहीं हुई है। बल्कि अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध से नवउदारवादी नीति की शुरुआत और 1991 में संसद के पटल पर नव उदारवाद पर नीति की घोषणा के साथ शुरू हुई है। केंद्र की सता पर बैठी सभी सरकारों ने अलग-अलग स्तर पर सरकारी स्वामित्व वाले उद्योगों और सेवाओं के निजीकरण को आगे बढ़ाने का काम किया है।
निजीकरण की कवायद केंद्र में विभिन्न सरकारों के विभिन्न रास्तों के माध्यम से आगे बढ़ाया है। नव उदारवाद के रास्ते पर चलने की पिछले तीन दशकों की लंबी अवधि के दौरान केंद्र में सरकार कई बार बदली, लेकिन मूल दिशा नहीं बदली।
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केंद्र में भाजपा शासन की शुरुआत के साथ विशेष रुप से नरेंद्र मोदी सरकार के तहत निजीकरण अभियान गुणात्मक रूप से आक्रामक हो गया है। तीन कृषि कानूनों, चार श्रम संहिताओं के माध्यम से कृषि भूमि और उसकी उपज के निगमीकरण के प्रयास और आवश्यक प्रतिरक्षा अधिनियम 2021, जिसमें कारावास प्रावधानों के साथ हड़ताल पर प्रतिबंध लगाना नव उदारवादी नीतियों के लिए बाधाओं को दूर करके कॉरपोरेट को खुश करने और आम जनता को निचोड़ने का काम मोदी सरकार ने किया है, जो कि चिंता का विषय है।
प्रदर्शन में हरदयाल, कपिल, संसारी, जयसिंह, नुपराम, संजीव, नरेश, सुशीला, राजकुमार, उत्तम, सेवा दासी, इंद्रपाल, संदीप, दुर्भासा, करण, बालकृष्ण, मोहिंद्र, मीना और बालमुकुंद सहित कई अन्य मौजूद रहे।
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सीटू राज्य सचिव प्रेम गौतम, जिलाध्यक्ष कुलदीप सिंह, बिहारी सेवगी और नीलदत्त शर्मा ने कहा कि मोदी शासन के तहत देश की अर्थव्यवस्था चौतरफा निजीकरण के हमले का सामना कर रही है। मगर निजीकरण की शुरुआत वर्तमान शासन के तहत शुरू नहीं हुई है। बल्कि अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध से नवउदारवादी नीति की शुरुआत और 1991 में संसद के पटल पर नव उदारवाद पर नीति की घोषणा के साथ शुरू हुई है। केंद्र की सता पर बैठी सभी सरकारों ने अलग-अलग स्तर पर सरकारी स्वामित्व वाले उद्योगों और सेवाओं के निजीकरण को आगे बढ़ाने का काम किया है।
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निजीकरण की कवायद केंद्र में विभिन्न सरकारों के विभिन्न रास्तों के माध्यम से आगे बढ़ाया है। नव उदारवाद के रास्ते पर चलने की पिछले तीन दशकों की लंबी अवधि के दौरान केंद्र में सरकार कई बार बदली, लेकिन मूल दिशा नहीं बदली।
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केंद्र में भाजपा शासन की शुरुआत के साथ विशेष रुप से नरेंद्र मोदी सरकार के तहत निजीकरण अभियान गुणात्मक रूप से आक्रामक हो गया है। तीन कृषि कानूनों, चार श्रम संहिताओं के माध्यम से कृषि भूमि और उसकी उपज के निगमीकरण के प्रयास और आवश्यक प्रतिरक्षा अधिनियम 2021, जिसमें कारावास प्रावधानों के साथ हड़ताल पर प्रतिबंध लगाना नव उदारवादी नीतियों के लिए बाधाओं को दूर करके कॉरपोरेट को खुश करने और आम जनता को निचोड़ने का काम मोदी सरकार ने किया है, जो कि चिंता का विषय है।
प्रदर्शन में हरदयाल, कपिल, संसारी, जयसिंह, नुपराम, संजीव, नरेश, सुशीला, राजकुमार, उत्तम, सेवा दासी, इंद्रपाल, संदीप, दुर्भासा, करण, बालकृष्ण, मोहिंद्र, मीना और बालमुकुंद सहित कई अन्य मौजूद रहे।