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Rampur Bushahar News: ऊपरी शिमला में सेब सीजन की रफ्तार धीमी
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पराला मंडी में बीते वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष घटी सेब की आमद। संवाद
पिछले साल के मुकाबले 63 फीसदी कम फसल गई बाहर
मौसम की मार से उत्पादन के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित
बेहतर दाम के बावजूद बागवानों पर पड़ रही दोहरी मार
सुनील ग्रोवर
ठियोग (रामपुर बुशहर)। ऊपरी शिमला में इस बार सेब सीजन की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी धीमी चल रही है। पिछले साल अब तक ऊपरी शिमला से प्रदेश की दूसरी मंडियों और बाहरी राज्यों की मंडियों के लिए 58 लाख 58 हजार 299 पेटियां भेजी गई थीं, जबकि इस साल यह आंकड़ा घटकर 21 लाख 59 हजार 501 पेटियों तक ही पहुंच पाया है। यानी पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 36 लाख 98 हजार 798 पेटियां कम बाहर गई हैं। प्रतिशत के लिहाज से देखें तो इस साल पिछले साल की कुल आवक का करीब 37 प्रतिशत ही सेब बाहर भेजा गया है। सेब की कम आपूर्ति के पीछे इस बार मौसम की विपरीत परिस्थितियां बड़ी वजह मानी जा रही हैं। इसका असर फसल की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता पर भी पड़ा है। बागवानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बगीचों से निकलने वाले सेब का बड़ा हिस्सा मध्यम और निम्न गुणवत्ता का है। ऐसे में बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले सेब की तरह बेहतर दाम नहीं मिल पा रहे हैं। हालांकि, पिछले साल की तुलना में इस बार सेब के दाम कुछ बेहतर बताए जा रहे हैं लेकिन कम उत्पादन और कमजोर गुणवत्ता ने बागवानों को राहत नहीं दी है। यानी जिन बागवानों को बेहतर भाव की उम्मीद थी, उन्हें कम फसल ने झटका दिया है, जबकि जिनके पास फसल है, उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने के कारण उन्हें अपेक्षित दाम नहीं मिल पा रहे हैं। इस तरह मौसम की मार ने बागवानों पर दोहरी चोट की है।
फागू सेब नियंत्रण कक्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल यहां से 7 हजार 729 वाहन सेब लेकर बाहर निकले थे। इस साल वाहनों की संख्या में बड़ा अंतर दर्ज किया गया है। पिछले साल फागू से करीब 20 लाख 70 हजार 664 पेटियां बाहर गई थीं। इस साल यहां से बाहर भेजी गई पेटियों की संख्या काफी कम रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस साल करीब 10 लाख 81 हजार पेटियां बाहर भेजी गई हैं।
बलग सेब नियंत्रण कक्ष में भी इस बार सेब की आवक और वाहनों की आवाजाही में भारी कमी दर्ज हुई है। पिछले साल बलग से 13 हजार 293 वाहन सेब लेकर बाहरी मंडियों के लिए रवाना हुए थे, जबकि इस साल यह संख्या घटकर 5 हजार 22 वाहन रह गई है। पिछले साल बलग से 37 लाख 88 हजार 235 पेटियां बाहरी मंडियों को भेजी गई थीं, जबकि इस साल अब तक केवल 10 लाख 87 हजार 426 पेटियां ही बाहर भेजी गई हैं।
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इन दोनों प्रमुख नियंत्रण कक्षों के आंकड़े भी ऊपरी शिमला में इस बार सेब उत्पादन की कमजोर स्थिति को सामने ला रहे हैं। ऊपरी शिमला की सबसे बड़ी सेब मंडियों में शामिल पराला मंडी में भी इस बार कारोबार की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। इस सीजन में अब तक मंडी में करीब 7.50 लाख पेटियों का कारोबार हुआ है। नाशपाती की आवक भी सीमित रही है। अभी तक नाशपाती के करीब 1 लाख 40 हजार बॉक्स बाहरी मंडियों को भेजे गए हैं।
सोमवार को पराला मंडी में सेब के दाम गुणवत्ता के हिसाब से 400 रुपये से लेकर 2,800 रुपये तक रहे। वहीं, नाशपाती के दाम 400 रुपये से लेकर 2,200 रुपये तक रहे। बाजार में बेहतर गुणवत्ता वाले सेब को अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिल रहे हैं, लेकिन मध्यम और निम्न गुणवत्ता के सेब के दाम काफी नीचे हैं। यही वजह है कि मंडी में बेहतर भाव मिलने के बावजूद बागवानों की कुल आमदनी पर इस बार फसल की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है।
मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने सेब के आकार, रंग और गुणवत्ता को भी प्रभावित किया है। ऐसे में प्रीमियम श्रेणी के सेब की मात्रा कम होने से औसत दाम भी प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी ओर, बागवानों की लागत पहले की तरह बनी हुई है। खाद, दवाइयों, मजदूरी, पैकेजिंग और परिवहन पर खर्च होने के बावजूद जब बगीचे से कम पेटियां निकलती हैं तो कुल आय में बड़ी गिरावट आना स्वाभाविक है।
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मौसम की मार से उत्पादन के साथ गुणवत्ता भी प्रभावित
बेहतर दाम के बावजूद बागवानों पर पड़ रही दोहरी मार
सुनील ग्रोवर
ठियोग (रामपुर बुशहर)। ऊपरी शिमला में इस बार सेब सीजन की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी धीमी चल रही है। पिछले साल अब तक ऊपरी शिमला से प्रदेश की दूसरी मंडियों और बाहरी राज्यों की मंडियों के लिए 58 लाख 58 हजार 299 पेटियां भेजी गई थीं, जबकि इस साल यह आंकड़ा घटकर 21 लाख 59 हजार 501 पेटियों तक ही पहुंच पाया है। यानी पिछले साल की तुलना में इस बार करीब 36 लाख 98 हजार 798 पेटियां कम बाहर गई हैं। प्रतिशत के लिहाज से देखें तो इस साल पिछले साल की कुल आवक का करीब 37 प्रतिशत ही सेब बाहर भेजा गया है। सेब की कम आपूर्ति के पीछे इस बार मौसम की विपरीत परिस्थितियां बड़ी वजह मानी जा रही हैं। इसका असर फसल की मात्रा के साथ-साथ उसकी गुणवत्ता पर भी पड़ा है। बागवानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बगीचों से निकलने वाले सेब का बड़ा हिस्सा मध्यम और निम्न गुणवत्ता का है। ऐसे में बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाले सेब की तरह बेहतर दाम नहीं मिल पा रहे हैं। हालांकि, पिछले साल की तुलना में इस बार सेब के दाम कुछ बेहतर बताए जा रहे हैं लेकिन कम उत्पादन और कमजोर गुणवत्ता ने बागवानों को राहत नहीं दी है। यानी जिन बागवानों को बेहतर भाव की उम्मीद थी, उन्हें कम फसल ने झटका दिया है, जबकि जिनके पास फसल है, उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने के कारण उन्हें अपेक्षित दाम नहीं मिल पा रहे हैं। इस तरह मौसम की मार ने बागवानों पर दोहरी चोट की है।
फागू सेब नियंत्रण कक्ष के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले साल यहां से 7 हजार 729 वाहन सेब लेकर बाहर निकले थे। इस साल वाहनों की संख्या में बड़ा अंतर दर्ज किया गया है। पिछले साल फागू से करीब 20 लाख 70 हजार 664 पेटियां बाहर गई थीं। इस साल यहां से बाहर भेजी गई पेटियों की संख्या काफी कम रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इस साल करीब 10 लाख 81 हजार पेटियां बाहर भेजी गई हैं।
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बलग सेब नियंत्रण कक्ष में भी इस बार सेब की आवक और वाहनों की आवाजाही में भारी कमी दर्ज हुई है। पिछले साल बलग से 13 हजार 293 वाहन सेब लेकर बाहरी मंडियों के लिए रवाना हुए थे, जबकि इस साल यह संख्या घटकर 5 हजार 22 वाहन रह गई है। पिछले साल बलग से 37 लाख 88 हजार 235 पेटियां बाहरी मंडियों को भेजी गई थीं, जबकि इस साल अब तक केवल 10 लाख 87 हजार 426 पेटियां ही बाहर भेजी गई हैं।
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इन दोनों प्रमुख नियंत्रण कक्षों के आंकड़े भी ऊपरी शिमला में इस बार सेब उत्पादन की कमजोर स्थिति को सामने ला रहे हैं। ऊपरी शिमला की सबसे बड़ी सेब मंडियों में शामिल पराला मंडी में भी इस बार कारोबार की रफ्तार पिछले साल के मुकाबले काफी कम है। इस सीजन में अब तक मंडी में करीब 7.50 लाख पेटियों का कारोबार हुआ है। नाशपाती की आवक भी सीमित रही है। अभी तक नाशपाती के करीब 1 लाख 40 हजार बॉक्स बाहरी मंडियों को भेजे गए हैं।
सोमवार को पराला मंडी में सेब के दाम गुणवत्ता के हिसाब से 400 रुपये से लेकर 2,800 रुपये तक रहे। वहीं, नाशपाती के दाम 400 रुपये से लेकर 2,200 रुपये तक रहे। बाजार में बेहतर गुणवत्ता वाले सेब को अपेक्षाकृत अच्छे दाम मिल रहे हैं, लेकिन मध्यम और निम्न गुणवत्ता के सेब के दाम काफी नीचे हैं। यही वजह है कि मंडी में बेहतर भाव मिलने के बावजूद बागवानों की कुल आमदनी पर इस बार फसल की कमी का असर साफ दिखाई दे रहा है।
मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों ने सेब के आकार, रंग और गुणवत्ता को भी प्रभावित किया है। ऐसे में प्रीमियम श्रेणी के सेब की मात्रा कम होने से औसत दाम भी प्रभावित हो रहे हैं। दूसरी ओर, बागवानों की लागत पहले की तरह बनी हुई है। खाद, दवाइयों, मजदूरी, पैकेजिंग और परिवहन पर खर्च होने के बावजूद जब बगीचे से कम पेटियां निकलती हैं तो कुल आय में बड़ी गिरावट आना स्वाभाविक है।