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लवी मेले में व्यापार के लिए कभी आते थे विदेशी
Updated Fri, 10 Nov 2017 09:36 PM IST
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lavi mela rampur
- फोटो : lavi mela rampur
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रामपुर बुशहर।
मध्य शताब्दी में रामपुर रियासत के तत्कालीन राजा केहर सिंह के समय शुरू हुए लोई मेले में तिब्बत, अफगानिस्तान और कुजवेकिस्तान के व्यापारी रामपुर में कारोबार के लिए पहुंचते थे। मेले में व्यापारी ड्राई फ्रूट, ऊन, पशम और पशुओं सहित घोड़े लेकर रामपुर पहुंचते थे, जिसके बदले ये लोग रामपुर से नमक जोकि मंडी जिला के गुम्मा से यहां लाया जाता था और गुड़ सहित अन्य राशन लेकर जाते थे।
अब समय के साथ लवी मेले का पूरा स्वरूप ही बदल गया है। अब यह मेला किन्नौर के व्यापारियों के अलावा पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के व्यापारियों का बन कर रह गया है। क्षेत्र के शेर सिंह और बीआर नेगी ने बताया कि पहले लवी मेले के दौरान आपस में काफी मेलजोल होता था। किन्नौर के विभिन्न गांव से लोग पूरे परिवार सहित पदम छात्र स्कूल में रहते थे और राजा के साथ पदम पैलेस में नाच गाने का दौर चलता था।
सभी लोग एक साथ अपने ढोल नगाड़ों से सारी रात नाच-गाना करते थेेे, लेकिन आज के दौर में सारी गतिविधियां विलुप्त हो चुकी है। भीमाकाली मंदिर न्यास के कार्यकारी अधिकारी बीआर नेगी ने बताया कि 1911 से कुछ वर्ष पूर्व रामपुर में तिब्बत और हिंदुस्तान के बीच व्यापार शुरू हुआ। उस समय के राजा केहर सिंह ने तिब्बत सरकार के साथ व्यापार को लेकर संधि की थी। व्यापार मेले में कर मुक्त व्यापार होता था।
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लवी मेले में किन्नौर, लाहौल स्पीति, कुल्लू और प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से व्यापारी पैदल सफर कर व्यापार के लिए पहुंचते थे। मेले में विशेष रूप से ऊन, पशम, भेड़ बकरियां और घोड़ों का व्यापार होता था। वस्त्र में जिला किन्नौर के सुन्नम गांव का गुदमा (भेड़ की ऊन से बना कंबल) का व्यापार काफी मात्रा में होता था।
लोगों का कहना है कि मध्य शताब्दी से चल रहे लवी मेले को पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद वीरभद्र सिंह ने 1985 में अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया था। अब समय के साथ-साथ लवी मेले ने अपना स्वरूप भी बदला है। अब यह मेला पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और किन्नौर के व्यापारियों तक ही सिमट कर रह गया है।
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मध्य शताब्दी में रामपुर रियासत के तत्कालीन राजा केहर सिंह के समय शुरू हुए लोई मेले में तिब्बत, अफगानिस्तान और कुजवेकिस्तान के व्यापारी रामपुर में कारोबार के लिए पहुंचते थे। मेले में व्यापारी ड्राई फ्रूट, ऊन, पशम और पशुओं सहित घोड़े लेकर रामपुर पहुंचते थे, जिसके बदले ये लोग रामपुर से नमक जोकि मंडी जिला के गुम्मा से यहां लाया जाता था और गुड़ सहित अन्य राशन लेकर जाते थे।
अब समय के साथ लवी मेले का पूरा स्वरूप ही बदल गया है। अब यह मेला किन्नौर के व्यापारियों के अलावा पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों के व्यापारियों का बन कर रह गया है। क्षेत्र के शेर सिंह और बीआर नेगी ने बताया कि पहले लवी मेले के दौरान आपस में काफी मेलजोल होता था। किन्नौर के विभिन्न गांव से लोग पूरे परिवार सहित पदम छात्र स्कूल में रहते थे और राजा के साथ पदम पैलेस में नाच गाने का दौर चलता था।
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सभी लोग एक साथ अपने ढोल नगाड़ों से सारी रात नाच-गाना करते थेेे, लेकिन आज के दौर में सारी गतिविधियां विलुप्त हो चुकी है। भीमाकाली मंदिर न्यास के कार्यकारी अधिकारी बीआर नेगी ने बताया कि 1911 से कुछ वर्ष पूर्व रामपुर में तिब्बत और हिंदुस्तान के बीच व्यापार शुरू हुआ। उस समय के राजा केहर सिंह ने तिब्बत सरकार के साथ व्यापार को लेकर संधि की थी। व्यापार मेले में कर मुक्त व्यापार होता था।
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लवी मेले में किन्नौर, लाहौल स्पीति, कुल्लू और प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से व्यापारी पैदल सफर कर व्यापार के लिए पहुंचते थे। मेले में विशेष रूप से ऊन, पशम, भेड़ बकरियां और घोड़ों का व्यापार होता था। वस्त्र में जिला किन्नौर के सुन्नम गांव का गुदमा (भेड़ की ऊन से बना कंबल) का व्यापार काफी मात्रा में होता था।
लोगों का कहना है कि मध्य शताब्दी से चल रहे लवी मेले को पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद वीरभद्र सिंह ने 1985 में अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया था। अब समय के साथ-साथ लवी मेले ने अपना स्वरूप भी बदला है। अब यह मेला पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और किन्नौर के व्यापारियों तक ही सिमट कर रह गया है।