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Mandi News: वन विभाग के पास ट्रेंड स्टाफ पर ट्रेंकुलाइजर गन ही नहीं

Thu, 25 Dec 2025 06:45 AM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी
संवाद न्यूज एजेंसी, मंडी Updated Thu, 25 Dec 2025 06:45 AM IST
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The Forest Department does not have trained staff but tranquilizer guns.
मंडी। पहाड़ी प्रदेश में तेंदुए के आदमखोर होने व जंगली जानवरों के हिंसक होने पर वन विभाग के पास इन जानवरों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने के लिए आधुनिक उपकरण नहीं है। वही परंपरागत पिंजरे लगा कर विभाग तेंदुओं को पकड़ने को मजबूर है। बल्ह घाटी के मलवाणा में एक बार फिर वन विभाग तेंदुए को पकड़ने में असहाय नजर आया।
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बल्ह घाटी की भड़याल पंचायत के मलवाणा, चंडयाल व भड़याल गांव में आदमखोर तेंदुए को बेहोश कर सुरक्षित तरीके से काबू नहीं किया जा सका। वन विभाग के पास ट्रेंकुलाइजर गन न होने की एक बार फिर कमी खली। सुंदरनगर से वन्य प्राणी विंग के स्टाफ के पहुंचने से पहले ही ग्रामीणों ने तेंदुए को अपने स्तर पर ठिकाने लगा दिया। समय रहते अगर ट्रेंकुलाइजर गन मलवाणा गांव में पहुंच जाती तो तेंदुए को बेहोश कर पकड़ लिया जाता। वन विभाग के पास हालांकि ट्रेंकुलाइजर गन को चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ है लेकिन गन नहीं है।
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गांव में तेंदुए के हमले से एक व्यक्ति की मौत व छह ग्रामीणों के घायल होने की सूचना मिलने पर वन मंडलाधिकारी मंडी वासु डोगर भी स्टाफ के साथ पहुंचे। जंगली जानवरों के हमले से व्यक्ति की मौत होने पर आश्रितों को चार लाख रुपये मुआवजे का प्रावधान है। इसके अलावा स्थायी अपंगता की स्थिति में दो लाख रुपये, मेजर इंजरी पर 75 हजार रुपये तथा माइनर इंजरी पर 15 हजार रुपये के साथ मेडिकल आदि का खर्च वन विभाग प्रदान करता है। वन मंडलाधिकारी ने बताया कि तेंदुए के शव को कब्जे में ले लिया है। पोस्टमार्टम के बाद विभागीय कमेटी की निगरानी में शव को जलाया जाएगा।
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क्या है ट्रेंकुलाइजर गन
ट्रेंकुलाइजर गन के माध्यम से हमलावर व आदमखोर हो चुके जंगली जानवरों को काबू किया जाता है। इसके सिरे पर हाइपोडर्मिक सुई लगी होती है और उसमें बेहोशी की दवा, टीका या एंटीबायोटिक भरी होती है। बेहोशी की दवा वाली गन को ट्रेंकुलाइजर गन कहा जाता है। यह गन काफी कीमती रहती है। वन्य प्राणी विंग के पास यह गन उपलब्ध रहती है।
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