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Mandi News: शादी के बाद नहीं टूटा सपना, लता ने मेहनत से बदली तकदीर
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नर्सरी अध्यापिका से प्रधानाचार्य बनने तक का तय किया सफर
शिक्षा, संगीत और समाजसेवा में बनाई अलग पहचान
संवाद न्यूज एजेंसी
टिहरा (मंडी)। पहाड़ की बेटियों के लिए लता पठानिया केवल एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सफलता की मिसाल है। सीमित संसाधनों, कम उम्र में विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने यह साबित किया कि यदि इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकती। शिक्षा के प्रति उनकी लगन, निरंतर मेहनत और समाज के प्रति समर्पण ने उन्हें न केवल एक सफल शिक्षिका और प्रधानाचार्य बनाया, बल्कि संगीत, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र में भी एक प्रेरणादायी पहचान दिलाई।
सरकाघाट क्षेत्र के झडियार गांव में 14 अप्रैल 1973 को जन्मीं लता पठानिया ने दसवीं कक्षा के बाद नर्सरी अध्यापिका का प्रशिक्षण प्राप्त किया। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह तनिहार निवासी हाकम चंद पठानिया से हो गया। आमतौर पर विवाह के बाद महिलाओं के लिए शिक्षा जारी रखना कठिन हो जाता है, लेकिन लता ने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय अपने सपनों को नई दिशा दी।
अप्रैल 1990 में उन्होंने अजय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला सरौन में नर्सरी अध्यापिका के रूप में अपना शिक्षण का सफर शुरू किया। नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर, बीएड और एमएड जैसी उच्च शिक्षाएं प्राप्त कीं। उनकी मेहनत का परिणाम यह रहा कि वर्ष 2019 में वह उसी शिक्षण संस्थान की प्रधानाचार्य नियुक्त हुईं।
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शिक्षा के साथ-साथ लता पठानिया ने संगीत और खेल के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कोर्फबॉल कोच के रूप में उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अलावा वह विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से बेटियों की शिक्षा, स्वच्छता अभियान और जरूरतमंद लोगों की सहायता के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं। लता पठानिया का मानना है कि सफलता किसी एक दिन में नहीं मिलती। इसके लिए निरंतर मेहनत, धैर्य और सीखते रहने की इच्छा सबसे जरूरी होती है। उनकी कहानी आज पहाड़ की हर बेटी को यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, यदि हौसले बुलंद हों तो हर सपना सच किया जा सकता है।
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शिक्षा, संगीत और समाजसेवा में बनाई अलग पहचान
संवाद न्यूज एजेंसी
टिहरा (मंडी)। पहाड़ की बेटियों के लिए लता पठानिया केवल एक नाम नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सफलता की मिसाल है। सीमित संसाधनों, कम उम्र में विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने यह साबित किया कि यदि इरादे मजबूत हों तो कोई भी बाधा सपनों की उड़ान को रोक नहीं सकती। शिक्षा के प्रति उनकी लगन, निरंतर मेहनत और समाज के प्रति समर्पण ने उन्हें न केवल एक सफल शिक्षिका और प्रधानाचार्य बनाया, बल्कि संगीत, खेल और समाजसेवा के क्षेत्र में भी एक प्रेरणादायी पहचान दिलाई।
सरकाघाट क्षेत्र के झडियार गांव में 14 अप्रैल 1973 को जन्मीं लता पठानिया ने दसवीं कक्षा के बाद नर्सरी अध्यापिका का प्रशिक्षण प्राप्त किया। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह तनिहार निवासी हाकम चंद पठानिया से हो गया। आमतौर पर विवाह के बाद महिलाओं के लिए शिक्षा जारी रखना कठिन हो जाता है, लेकिन लता ने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय अपने सपनों को नई दिशा दी।
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अप्रैल 1990 में उन्होंने अजय मॉडल वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला सरौन में नर्सरी अध्यापिका के रूप में अपना शिक्षण का सफर शुरू किया। नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। कठिन परिश्रम और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर, बीएड और एमएड जैसी उच्च शिक्षाएं प्राप्त कीं। उनकी मेहनत का परिणाम यह रहा कि वर्ष 2019 में वह उसी शिक्षण संस्थान की प्रधानाचार्य नियुक्त हुईं।
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शिक्षा के साथ-साथ लता पठानिया ने संगीत और खेल के क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कोर्फबॉल कोच के रूप में उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अलावा वह विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से बेटियों की शिक्षा, स्वच्छता अभियान और जरूरतमंद लोगों की सहायता के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। समाजसेवा और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई संस्थाएं उन्हें सम्मानित कर चुकी हैं। लता पठानिया का मानना है कि सफलता किसी एक दिन में नहीं मिलती। इसके लिए निरंतर मेहनत, धैर्य और सीखते रहने की इच्छा सबसे जरूरी होती है। उनकी कहानी आज पहाड़ की हर बेटी को यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, यदि हौसले बुलंद हों तो हर सपना सच किया जा सकता है।