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Mandi News: मौसम की मार से पहाड़ी राजमा की फसल तबाह
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जंजैहली में पकी राजमाह। संवाद
थुनाग (मंडी)। सराज घाटी के ऊंचाई और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली पहाड़ी राजमा की फसल इस बार मौसम की बेरुखी की शिकार हो गई है। अनुकूल मौसम न रहने और अत्यधिक बारिश के कारण फसल की पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। इससे स्थानीय किसानों की सालभर की आजीविका पर संकट गहरा गया है।
स्थानीय किसानों चिरंजी लाल, चतर सिंह, कुशाल सिंह आदि का कहना है कि पहाड़ी राजमा की खेती में बहुत अधिक शारीरिक मेहनत लगती है। यही वजह है कि किसान इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक (व्यापारिक) रूप से उगाने के बजाय मुख्यतः अपने परिवार के सालभर के गुजारे के लिए ही बीजते हैं। बाजार में पहाड़ी राजमा 150 से लेकर 200 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जिससे किसानों को थोड़ी-बहुत अतिरिक्त आय भी हो जाती थी। इस बार उत्पादन घटने से हमें भी खाने के लिए भी बाजार से राजमा खरीदना पड़ रहा है। फसल होने पर मेहमानों को राजमा उपहार स्वरूप भी देने का रिवाज है।
सराज क्षेत्र में राजमा केवल एक फसल नहीं, बल्कि संस्कृति का अहम हिस्सा है। यहां के लोग राजमा की दाल को बेहद चाव से खाते हैं। सराज क्षेत्र में शादी-ब्याह हो या कोई अन्य मांगलिक या सामाजिक आयोजन राजमा और चावल के बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं माना जाता। धाम में अब राजमा की जगह दूसरे व्यंजन परोसे जाने लगे हैं।
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जंजैहली क्षेत्र के किसान सुरेश, कृष्ण कुमार और गीतानंद ने बताया कि इस बार बेमौसम बारिश और खराब मौसम के कारण राजमा की फलियां सही से नहीं पक पाईं और फसल को भारी नुकसान हुआ है। हर साल इस फसल से पूरे परिवार का सालभर का गुजारा आसानी से हो जाता था, लेकिन इस बार पैदावार बेहद कम रहने से बाजार से खरीदी दालों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
इस साल शुरू में कम बारिश हुई जिससे फ्लावरिंग सही नहीं हो पाई और सर्दी का स्पेल जल्दी आ गया और दाने नहीं बन पाए। मौसम असामान्य रहने से राजमा की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
- पंकज सूद, विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर
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स्थानीय किसानों चिरंजी लाल, चतर सिंह, कुशाल सिंह आदि का कहना है कि पहाड़ी राजमा की खेती में बहुत अधिक शारीरिक मेहनत लगती है। यही वजह है कि किसान इसे बड़े पैमाने पर व्यावसायिक (व्यापारिक) रूप से उगाने के बजाय मुख्यतः अपने परिवार के सालभर के गुजारे के लिए ही बीजते हैं। बाजार में पहाड़ी राजमा 150 से लेकर 200 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, जिससे किसानों को थोड़ी-बहुत अतिरिक्त आय भी हो जाती थी। इस बार उत्पादन घटने से हमें भी खाने के लिए भी बाजार से राजमा खरीदना पड़ रहा है। फसल होने पर मेहमानों को राजमा उपहार स्वरूप भी देने का रिवाज है।
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सराज क्षेत्र में राजमा केवल एक फसल नहीं, बल्कि संस्कृति का अहम हिस्सा है। यहां के लोग राजमा की दाल को बेहद चाव से खाते हैं। सराज क्षेत्र में शादी-ब्याह हो या कोई अन्य मांगलिक या सामाजिक आयोजन राजमा और चावल के बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं माना जाता। धाम में अब राजमा की जगह दूसरे व्यंजन परोसे जाने लगे हैं।
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जंजैहली क्षेत्र के किसान सुरेश, कृष्ण कुमार और गीतानंद ने बताया कि इस बार बेमौसम बारिश और खराब मौसम के कारण राजमा की फलियां सही से नहीं पक पाईं और फसल को भारी नुकसान हुआ है। हर साल इस फसल से पूरे परिवार का सालभर का गुजारा आसानी से हो जाता था, लेकिन इस बार पैदावार बेहद कम रहने से बाजार से खरीदी दालों पर निर्भर रहना पड़ेगा।
इस साल शुरू में कम बारिश हुई जिससे फ्लावरिंग सही नहीं हो पाई और सर्दी का स्पेल जल्दी आ गया और दाने नहीं बन पाए। मौसम असामान्य रहने से राजमा की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
- पंकज सूद, विशेषज्ञ कृषि विज्ञान केंद्र सुंदरनगर