{"_id":"22-64750","slug":"Mandi-64750-22","type":"story","status":"publish","title_hn":"कामाक्षा देवी मंदिर में शांतिपूर्वक हुआ बड़ा फेर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कामाक्षा देवी मंदिर में शांतिपूर्वक हुआ बड़ा फेर
Mandi
Updated Sat, 04 Oct 2014 05:32 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कामाक्षा देवी मंदिर में शांतिपूर्वक हुआ बड़ा फेर
करसोग (मंडी)। करसोग क्षेत्र के सिद्धपीठ मां कामाक्षा मंदिर में तीसरे वर्ष भी पशु बलि नहीं दी गई। अष्टमी को कामाक्षा माता मंदिर में शांतिपूर्वक तरीके से कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर करीब तीन किलोमीटर का बड़ा फेर हुआ। रात्रि फेर में मशालें जलाकर वाद्य यंत्रों की थाप पर शक्ति का नियंत्रण श्रद्धापूर्वक किया गया।
पूर्व में पांगणा के महामाया मंदिर, घंडयारा भगवती मंदिर, कामाक्षा मंदिर में भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन अब श्रद्धालु यहां केवल नारियल ही चढ़ा रहे हैं। शारदीय नवरात्रों पर हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। ऐतिहासिक तथा पौराणिक के आधार पर मां कामाक्षा परसूराम के समय से कामाख्या नगर में स्थापित हैं।
महाभारत काल में काली की मूर्ति काले रंग की थी। चंद्रसेन राजा के शासनकाल में इस मूर्ति पर आवरण चढ़ा दिया था। मां कामाक्षा के पुजारी मुन्ना लाल ने बताया कि काली की मूर्ति को अब आवरण चढ़ाया है। इससे पहले मूर्ति को कोई भी स्पर्श नहीं करता था। पहले इस मूर्ति को स्पर्श करने वाले की अकाल मृत्यु हो जाती थी। अष्टमी को रात्रि को सभी धर्मों के लोग मां कामाक्षा के मंदिर के अंदर जाते हैं तथा मां कामाक्षा की शक्ति जिस व्यक्ति पर आती है वो अचेत हो जाता है।
विज्ञापन
इस बार कामाक्षा की छाया श्याम लाल के ऊपर आई। जिसे श्रद्धालुओं ने हाथों में उठाकर रात्रि फेर में ले गए। जहां हजारों लोग शामिल हुए। इस मौके पर प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। प्रशासन की ओर से तहसीलदार जेएस नेगी, नायब तहसीलदार रविंद्र सिंह बोध, थाना प्रभारी सुनील कुमार तथा पुजारी मुन्ना लाल प्रधान प्रेमलाल शर्मा सहित अन्य कारदार मौजूद थे।
विज्ञापन
करसोग (मंडी)। करसोग क्षेत्र के सिद्धपीठ मां कामाक्षा मंदिर में तीसरे वर्ष भी पशु बलि नहीं दी गई। अष्टमी को कामाक्षा माता मंदिर में शांतिपूर्वक तरीके से कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर करीब तीन किलोमीटर का बड़ा फेर हुआ। रात्रि फेर में मशालें जलाकर वाद्य यंत्रों की थाप पर शक्ति का नियंत्रण श्रद्धापूर्वक किया गया।
पूर्व में पांगणा के महामाया मंदिर, घंडयारा भगवती मंदिर, कामाक्षा मंदिर में भैंसे की बलि दी जाती थी, लेकिन अब श्रद्धालु यहां केवल नारियल ही चढ़ा रहे हैं। शारदीय नवरात्रों पर हिमाचल प्रदेश के शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। ऐतिहासिक तथा पौराणिक के आधार पर मां कामाक्षा परसूराम के समय से कामाख्या नगर में स्थापित हैं।
विज्ञापन
महाभारत काल में काली की मूर्ति काले रंग की थी। चंद्रसेन राजा के शासनकाल में इस मूर्ति पर आवरण चढ़ा दिया था। मां कामाक्षा के पुजारी मुन्ना लाल ने बताया कि काली की मूर्ति को अब आवरण चढ़ाया है। इससे पहले मूर्ति को कोई भी स्पर्श नहीं करता था। पहले इस मूर्ति को स्पर्श करने वाले की अकाल मृत्यु हो जाती थी। अष्टमी को रात्रि को सभी धर्मों के लोग मां कामाक्षा के मंदिर के अंदर जाते हैं तथा मां कामाक्षा की शक्ति जिस व्यक्ति पर आती है वो अचेत हो जाता है।
विज्ञापन
इस बार कामाक्षा की छाया श्याम लाल के ऊपर आई। जिसे श्रद्धालुओं ने हाथों में उठाकर रात्रि फेर में ले गए। जहां हजारों लोग शामिल हुए। इस मौके पर प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। प्रशासन की ओर से तहसीलदार जेएस नेगी, नायब तहसीलदार रविंद्र सिंह बोध, थाना प्रभारी सुनील कुमार तथा पुजारी मुन्ना लाल प्रधान प्रेमलाल शर्मा सहित अन्य कारदार मौजूद थे।