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Kullu News: आपदा ने घर तोड़े, प्रशासन ने उम्मीदें, पड़ोसी न होते तो खुले आसमान के नीचे ही कटतीं रातें

Fri, 05 Sep 2025 11:03 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू
संवाद न्यूज एजेंसी, कुल्लू Updated Fri, 05 Sep 2025 11:03 PM IST
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The disaster destroyed homes, the administration destroyed hopes, if neighbors were not there, nights would have been spent under the open sky
कुल्लू के अखाड़ा बाजार में भुस्खलन में अपसा मकान गंवा चुकी बुजुर्ग महिला मुख्यमंत्री सुखविंद्र 
आपदा प्रभावितों का छलका दर्द... बोले- राहत तो दूर की बात, प्रशासन से कोई पूछने तक नहीं आया
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राहत कैंप तक की नहीं दी जानकारी, कहा- ये तीन दिन हमने कैसे गुजारे हैं, यह हम ही जानते हैं

युवक, संस्थाएं लोगों और रेस्क्यू अभियान में जुटे जवानों को खिला रहे खाना, प्रशासन ने नहीं किए खास प्रबंध

संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। भूस्खलन ने कुल्लू के इनर अखाड़ा बाजार में लोगों की जिंदगी तहस-नहस कर दी लेकिन प्रशासन की चुप्पी ने जख्मों को और गहरा कर दिया है।
राहत कैंप की जानकारी तक पीड़ितों को नहीं दी गई। जरूरत की इस घड़ी में सरकार नदारद दिख रही है। स्थानीय युवाओं और संस्थाओं ने जो किया, वह जिम्मेदार तंत्र की पोल खोलता है। भूस्खलन प्रभावितों ने प्रशासन की भूमिका पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि तीन दिन बाद भी न तो उन्हें फौरी राहत मिली है और न ही कोई पूछने आया।
प्रभावित मंजू सूद ने कहा कि उनका मकान पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। प्रशासन से किसी ने नुकसान के बारे में नहीं पूछा। वह किस हाल में रह रहे हैं, प्रशासन को इसकी कोई चिंता नहीं है। उन्होंने पड़ोसियों के घर में शरण ली है। न कोई अधिकारी उनसे बात करने आया और न ही राहत दी गई है। राहत शिविर के बारे में भी अधिकारियों ने कोई जानकारी नहीं दी। प्रभावित सीता देवी ने कहा कि तीन दिन पहले उनका मकान भूस्खलन की चपेट में आ गया है। उन्हें भी प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि प्रशासन को कायदे से प्रभावितों से बातचीत कर उनके ठहरने और खाने-पीने की व्यवस्था करनी चाहिए थी। प्रशासन के अधिकारी सिर्फ मौका ही देख रहे हैं। राहत के नाम पर कोई कार्य नहीं किया जा रहा है। ये तीन दिन हमारे कैसे गुजरे हैं, यह हम ही जानते हैं। अगर पड़ोसी और रिश्तेदार न होते तो शायद प्रशासन के भरोसे उन्हें खुले आसमान के नीचे ही रातें गुजारनी पड़तीं।
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सीता के अनुसार वह अपनी बेटी के रह रही हैं। बेटी का घर यहां न होता तो शायद खुले आसमान तले रातें गुजारनी पड़तीं। स्थानीय युवक और संस्थाएं लोगों के साथ रेस्क्यू अभियान में जुटे जवानों को खाना खिला रहे हैं। प्रशासन की ओर से कोई खास प्रबंध नहीं किए गए हैं। उपरोक्त महिलाओं के मकान तीन दिन पहले हुए भूस्खलन की चपेट में आए हैं इस घटना में एनडीआरएफ के जवान सहित दो लोग दफन हुए हैं।
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