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हिमाचल: लाहौल के सेब ने बाजार में मचाई धूम, 20 किलो की पेटी 1500 रुपये में बिकी; 90% तुड़ान पूरा
Thu, 05 Nov 2026 10:24 AM IST
Ankesh Dogra
संवाद न्यूज एजेंसी, उदयपुर (लाहौल-स्पीति)।
संवाद न्यूज एजेंसी, उदयपुर (लाहौल-स्पीति)।
Published by: Ankesh Dogra
Updated Thu, 05 Nov 2026 10:24 AM IST
सार
लाहौल घाटी के बागवानों के लिए इस बार सेब सीजन अच्छा रहा है। बाजार में 20 किलो की पेटी के 1300 से 1500 रुपये तक दाम मिले हैं और करीब 90 फीसदी तुड़ान पूरा हो चुका है। घाटी में सेब उत्पादन का रकबा 1000 हेक्टेयर से अधिक पहुंच गया है।
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लाहौल के सेब ने कमाया नाम!
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विस्तार
जनजातीय क्षेत्र लाहौल घाटी में सेब सीजन अब अंतिम चरण में पहुंच गया है। करीब 90 फीसदी तुड़ान पूरा हो चुका है और बागवान ग्रेडिंग व पैकिंग में जुटे हैं। इस बार शिमला और कुल्लू में सेब की पैदावार कम रहने के चलते लाहौल के बागवानों को बाजार में अच्छे दाम मिले हैं। पेटी के हिसाब से सेब बेचने वाले उत्पादकों को 20 किलो की पेटी के 1300 से 1500 रुपये तक मिले हैं।
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बागवानों ने इन दामों को संतोषजनक बताया है। राहुल ठाकुर, महेंद्र और सुरेश कुमार के अनुसार लाहौल का सेब गुणवत्ता के लिहाज से बेहतर है। इसका छिलका मोटा और फल रसदार होने के कारण इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है। घाटी में अब करीब 10 फीसदी सेब की तुड़ान बाकी है। बागवानी विभाग के अनुसार लाहौल घाटी में सेब की खेती तेजी से विस्तार कर रही है। शुरुआती वर्षों में करीब 450 हेक्टेयर क्षेत्र से 125 मीट्रिक टन उत्पादन होता था। अब हर साल लगभग 60 हजार पौधे लगाए जा रहे हैं, जिससे करीब 120 हेक्टेयर नए क्षेत्र में बागवानी का विस्तार हो रहा है।
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वर्तमान में पट्टन घाटी सेब उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरी है। जिले में सेब का कुल रकबा 1000 हेक्टेयर से अधिक हो चुका है, जबकि वार्षिक उत्पादन करीब 3000 से 4000 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। जलवायु परिवर्तन के चलते अब उन क्षेत्रों में भी सेब की खेती संभव हो रही है, जिन्हें पहले इसके लिए अनुकूल नहीं माना जाता था। उधर, एपीएमसी कुल्लू एवं लाहौल-स्पीति के सचिव दीक्षित जरियाल ने बताया कि घाटी में सेब सीजन अब अंतिम दौर में है और करीब 10 फीसदी तुड़ान ही शेष रह गया है।
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बागवानों ने लाहौल एप्पल को अलग ब्रांड पहचान देने की उठाई मांग
उत्पादन बढ़ने के बावजूद लाहौल के सेब को देश की प्रमुख मंडियों में अलग पहचान नहीं मिल पाई है। बागवानों का कहना है कि उनके उत्पाद को कई जगह किन्नौर एप्पल के नाम से बेचा जा रहा है। उन्होंने सरकार और बागवानी विभाग से लाहौल एप्पल के नाम से अलग ब्रांड विकसित करने की मांग की है। बागवानों के अनुसार अलग पहचान मिलने से उत्पाद की बाजार में विशिष्ट पहचान बनेगी और उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इससे लाहौल घाटी को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्र के रूप में पहचान बनाने में मदद मिलेगी।
उत्पादन बढ़ने के बावजूद लाहौल के सेब को देश की प्रमुख मंडियों में अलग पहचान नहीं मिल पाई है। बागवानों का कहना है कि उनके उत्पाद को कई जगह किन्नौर एप्पल के नाम से बेचा जा रहा है। उन्होंने सरकार और बागवानी विभाग से लाहौल एप्पल के नाम से अलग ब्रांड विकसित करने की मांग की है। बागवानों के अनुसार अलग पहचान मिलने से उत्पाद की बाजार में विशिष्ट पहचान बनेगी और उन्हें अपनी मेहनत का बेहतर मूल्य मिल सकेगा। इससे लाहौल घाटी को भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्र के रूप में पहचान बनाने में मदद मिलेगी।