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निरमंड से 200 किमी दूर से पहुंचे पांच देवी-देवता
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कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में इस साल कोरोना काल में भी रिकॉर्ड 282 देवी-देवता भाग ले रहे हैं। मौसम खुलने के बाद देवलू और हारियान दूर-दूर से देवता के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। दशहरा उत्सव में 200 किलोमीटर दूर से निरमंड क्षेत्र से भी पांच देवी-देवता परंपरा निभाने पहुंचे हैं। इन पांचों देवी-देवताओं के अस्थायी शिविरों में श्रद्धालुओं का तांता लगा है।
बता देें कि जिले के निरमंड खंड के विभिन्न क्षेत्रों से आठ देवी-देवता लाव-लश्कर के साथ उत्सव की शोभा बढ़ाने आते हैं। इस साल चार देवता और एक माता ही दशहरा में पहुंची हैं। दूर-दूर से आए देवी-देवताओं के दर्शन के लिए लोग उत्साहित हैं। पूरा दिन अस्थायी शिविरों में भक्तों का तांता लगा रहता है।
इस बार निरंमड के देवता सप्त ऋषि, देवता कुई कंडा नाग तथा माता भुवनेश्वरी दुराह, देवता चंभू कशोली तथा उनके भाई देवता चंभू रंदल आए हैं। ये सभी देवी-देवता निरमंड के अलग-अलग क्षेत्रों से हैं। दशहरा के लिए भी यह सभी अलग-अलग मंदिरों से निकलते हैं। बावजूद इसके दशहरा के लिए भगवान रघुनाथ की रथयात्रा से पहले जिला मुख्यालय ढालपुर में हाजिरी भरते हैं। इसके बाद एक सप्ताह तक अस्थायी शिविरों में रहकर उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। सातवें और अंतिम दिन रथयात्रा पूर्ण होते ही अपने मूल मंदिर के लिए रवाना हो जाते हैं। देवता सप्त ऋषि और चंभू रंदल के कारदार मोहर सिंह विष्ट और देवी सरण शर्मा ने कहा कि दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं को एक सप्ताह पहले मंदिर से निकलना पड़ता है। एक सप्ताह कुल्लू में रुकने के बाद दोबारा सात दिन का समय वापस पहुंचने में लग जाता है। करीब 21 दिन के बाद ही देवी-देवता अपने मंदिरों में लौटते हैं।
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बता देें कि जिले के निरमंड खंड के विभिन्न क्षेत्रों से आठ देवी-देवता लाव-लश्कर के साथ उत्सव की शोभा बढ़ाने आते हैं। इस साल चार देवता और एक माता ही दशहरा में पहुंची हैं। दूर-दूर से आए देवी-देवताओं के दर्शन के लिए लोग उत्साहित हैं। पूरा दिन अस्थायी शिविरों में भक्तों का तांता लगा रहता है।
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इस बार निरंमड के देवता सप्त ऋषि, देवता कुई कंडा नाग तथा माता भुवनेश्वरी दुराह, देवता चंभू कशोली तथा उनके भाई देवता चंभू रंदल आए हैं। ये सभी देवी-देवता निरमंड के अलग-अलग क्षेत्रों से हैं। दशहरा के लिए भी यह सभी अलग-अलग मंदिरों से निकलते हैं। बावजूद इसके दशहरा के लिए भगवान रघुनाथ की रथयात्रा से पहले जिला मुख्यालय ढालपुर में हाजिरी भरते हैं। इसके बाद एक सप्ताह तक अस्थायी शिविरों में रहकर उत्सव की शोभा बढ़ाते हैं। सातवें और अंतिम दिन रथयात्रा पूर्ण होते ही अपने मूल मंदिर के लिए रवाना हो जाते हैं। देवता सप्त ऋषि और चंभू रंदल के कारदार मोहर सिंह विष्ट और देवी सरण शर्मा ने कहा कि दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए देवी-देवताओं को एक सप्ताह पहले मंदिर से निकलना पड़ता है। एक सप्ताह कुल्लू में रुकने के बाद दोबारा सात दिन का समय वापस पहुंचने में लग जाता है। करीब 21 दिन के बाद ही देवी-देवता अपने मंदिरों में लौटते हैं।
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