{"_id":"611feace8ebc3e6ee339fe80","slug":"even-today-three-villages-of-sainj-are-being-illuminated-with-torches-kullu-news-sml3806154102","type":"story","status":"publish","title_hn":"विद्युत नगरी सैंज के तीन गांव आज भी मशालों से हो रहे रोशन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विद्युत नगरी सैंज के तीन गांव आज भी मशालों से हो रहे रोशन
विज्ञापन
सड़क सुविधा से वंचित मरोड़ गांव।
- फोटो : Kullu
सैंज (कुल्लू)। जिला कुल्लू की विद्युत नगरी सैंज घाटी में स्थित ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क में बसे शाक्टी, मरोड़ और शुगाड़ गांव के लोग आजादी के 75 साल बाद भी विकास की बाट जोह रहे हैं। और को रोशन करने वाली घाटी के तीनों गांवों आज भी अंधेरे में हैं। सरकारें घर-द्वार शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली और पानी देने का दावा करती हैं। लेकिन इन सुदूर गांवों की खस्ता हालत सरकारी दावों को खोखला साबित करने के लिए काफी है। इन गांवों में जीवन यापन के लिए मूलभूत सुविधाएं नाममात्र हैं।
विकास खंड बंजार की गाडापारली पंचायत के इन गांव में अभी तक सड़क और बिजली जैसी सुविधा नहीं मिल पाई है। रात को सैकड़ों लोगों का सहारा लालटेन या लकड़ियों की रोशनी होती है। बच्चों को भी इसी की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती है। हालांकि पंचायत ने बीते वर्ष गांव में सोलर लाइटें लगा कर कुछ राहत दी है। लेकिन ग्रामीण अभी भी टीवी, कंप्यूटर जैसे मनोरंजन के साधनों से अनजान हैं। 114 वर्षीय शाढ़ी देवी का कहना है कि उन्होंने अपने गांव में अभी तक सड़क और बिजली नहीं देखी। क्षेत्र के युवा प्रकाश ठाकुर, केहर सिंह, राकेश ठाकुर, धर्म सिंह, सोनू, कर्म चंद, सुनील, लायक राम बताया कि आज देश भारत की आजादी के 75 साल होने पर अमृत महोत्व मना रही है। लेकिन बिजली परियोजनाओं की नगरी सैंज घाटी में बसे इस गांव में सरकारी सुविधा के नाम पर मात्र एक प्राथमिक पाठशाला है। मरोड़ गांव की फुला देवी, डोला सिंह, राम लाल, लगन चंद, हरादासी, तेज राम, भाग चंद, गोविंद, राम चंद, जीत राम, दुर्गी देवी और शुकरी देवी ने बताया कि गांव का जनजीवन खासा कठिन है। इस दौरान कई सरकारें आई और गई। लेकिन इन गांवों की हालात नहीं बदली। आलम यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और खाद्य सामग्री के लिए लोगों को मीलों दूर तक पैदल चलकर अपनी पीठ पर सामान लाना पड़ता है। विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के नियम यहां के विकास में बाधा बने हुए हैं। मरोड़ गांव तक पहुंचने के लिए लगभग नौ घंटे दुर्गम रास्तों से पैदल चलना ग्रामीणों की मजबूरी है। शत प्रतिशत विद्युतीकरण का दावा करने वाली सरकारें तीनों गांव में बिजली की व्यवस्था अभी तक नहीं कर पाई है। गांव में जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे कुर्सी या चारपाई पर उठाकर लाने के अलावा दूसरी कोई सुविधा नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को 40 किमी दूर सैंज जाना पड़ता है। ग्रामीण पेयजल के लिए प्रकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। यहां के लोगों का रहना-सहन, खान-पान और तौर-तरीके भी अभी पारंपरिक हैं। देव आस्था में ग्रामीण अधिक विश्वास रखते हैं। स्थानीय देवता श्री आदि ब्रम्हा और ध्रव ऋषि यहां के बाशिंदों के लिए सर्वोपरि हैं। इन देवताओं का आदेश ही इनके लिए सब कुछ है। देवता के बनाए कानून का अनुसरण होता है। इन गांवों में शराब पूरी तरह से निषेध है। यहां के लोगों की एक ही इच्छा है कि इन गांवों को मूलभूत सुविधाएं दी जाए। वयोवृद्ध भी हर बार मतदान कर सरकार से राहत देने की अपील करने में जुटे हैं।
कोरे आश्वासन से छल रही सरकार
बंजार कांग्रेस अध्यक्ष दुष्यंत ठाकुर ने कहा कि वर्तमान सरकार इन गांव के लोगों को कोरे आश्वासन देकर छल रही है। कांग्रेस की सरकार सत्ता में आते ही यहां के लिए सुविधाएं दी जाएंगी।
विज्ञापन
नशनल पार्क के अधिकारियों से चल रही बात
बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी ने कहा कि वह गांव का दौरा कर आए है। यहां तक सड़क और बिजली पहुंचाने के लिए संभावना तलाशी जा रही है। नेशनल पार्क के अधिकारियों से बात चल रही है।
विज्ञापन
विकास खंड बंजार की गाडापारली पंचायत के इन गांव में अभी तक सड़क और बिजली जैसी सुविधा नहीं मिल पाई है। रात को सैकड़ों लोगों का सहारा लालटेन या लकड़ियों की रोशनी होती है। बच्चों को भी इसी की रोशनी में पढ़ाई करनी पड़ती है। हालांकि पंचायत ने बीते वर्ष गांव में सोलर लाइटें लगा कर कुछ राहत दी है। लेकिन ग्रामीण अभी भी टीवी, कंप्यूटर जैसे मनोरंजन के साधनों से अनजान हैं। 114 वर्षीय शाढ़ी देवी का कहना है कि उन्होंने अपने गांव में अभी तक सड़क और बिजली नहीं देखी। क्षेत्र के युवा प्रकाश ठाकुर, केहर सिंह, राकेश ठाकुर, धर्म सिंह, सोनू, कर्म चंद, सुनील, लायक राम बताया कि आज देश भारत की आजादी के 75 साल होने पर अमृत महोत्व मना रही है। लेकिन बिजली परियोजनाओं की नगरी सैंज घाटी में बसे इस गांव में सरकारी सुविधा के नाम पर मात्र एक प्राथमिक पाठशाला है। मरोड़ गांव की फुला देवी, डोला सिंह, राम लाल, लगन चंद, हरादासी, तेज राम, भाग चंद, गोविंद, राम चंद, जीत राम, दुर्गी देवी और शुकरी देवी ने बताया कि गांव का जनजीवन खासा कठिन है। इस दौरान कई सरकारें आई और गई। लेकिन इन गांवों की हालात नहीं बदली। आलम यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और खाद्य सामग्री के लिए लोगों को मीलों दूर तक पैदल चलकर अपनी पीठ पर सामान लाना पड़ता है। विश्व धरोहर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के नियम यहां के विकास में बाधा बने हुए हैं। मरोड़ गांव तक पहुंचने के लिए लगभग नौ घंटे दुर्गम रास्तों से पैदल चलना ग्रामीणों की मजबूरी है। शत प्रतिशत विद्युतीकरण का दावा करने वाली सरकारें तीनों गांव में बिजली की व्यवस्था अभी तक नहीं कर पाई है। गांव में जब कोई बीमार पड़ता है तो उसे कुर्सी या चारपाई पर उठाकर लाने के अलावा दूसरी कोई सुविधा नहीं है। उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को 40 किमी दूर सैंज जाना पड़ता है। ग्रामीण पेयजल के लिए प्रकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। यहां के लोगों का रहना-सहन, खान-पान और तौर-तरीके भी अभी पारंपरिक हैं। देव आस्था में ग्रामीण अधिक विश्वास रखते हैं। स्थानीय देवता श्री आदि ब्रम्हा और ध्रव ऋषि यहां के बाशिंदों के लिए सर्वोपरि हैं। इन देवताओं का आदेश ही इनके लिए सब कुछ है। देवता के बनाए कानून का अनुसरण होता है। इन गांवों में शराब पूरी तरह से निषेध है। यहां के लोगों की एक ही इच्छा है कि इन गांवों को मूलभूत सुविधाएं दी जाए। वयोवृद्ध भी हर बार मतदान कर सरकार से राहत देने की अपील करने में जुटे हैं।
विज्ञापन
कोरे आश्वासन से छल रही सरकार
बंजार कांग्रेस अध्यक्ष दुष्यंत ठाकुर ने कहा कि वर्तमान सरकार इन गांव के लोगों को कोरे आश्वासन देकर छल रही है। कांग्रेस की सरकार सत्ता में आते ही यहां के लिए सुविधाएं दी जाएंगी।
विज्ञापन
नशनल पार्क के अधिकारियों से चल रही बात
बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी ने कहा कि वह गांव का दौरा कर आए है। यहां तक सड़क और बिजली पहुंचाने के लिए संभावना तलाशी जा रही है। नेशनल पार्क के अधिकारियों से बात चल रही है।