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Kangra News: मिठाई के डिब्बों में भरी कामयाबी की मिठास
Mon, 06 Apr 2026 11:45 PM IST
शिमला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
संवाद न्यूज एजेंसी, कांगड़ा
Updated Mon, 06 Apr 2026 11:45 PM IST
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जाहू खुर्द की बीना देवी मिठाई के डब्बे बनाते हुए। संवाद
-जाहू खुर्द की बीना ने बेरोजगारी से पार पाकर बदली किस्मत
-गांव की अन्य महिलाओं को भी बनाया स्वावलंबी
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संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। आज के समय में जहां युवा नौकरी की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे हैं वहीं जाहू खुर्द की बीना ने नौकरी न मिलने की स्थिति को अवसर में बदल दिया। घर से ही एक छोटा लेकिन सफल कारोबार खड़ा कर लिया। बीना ने मिठाई के डिब्बे बनाने का काम शुरू किया जो आज न केवल उनके लिए आय का स्रोत बन गया है बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुका है। वह हर महीने सात से आठ हजार रुपये तक की कमाई कर रही हैं।
बीना बताती हैं कि उन्होंने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया लेकिन सफलता नहीं मिली। परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। स्थानीय बाजार में मिठाई के डिब्बे की मांग को देखते हुए उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया। शुरुआत में संसाधनों की कमी थी लेकिन धीरे-धीरे काम को आगे बढ़ाया।
2024 में पति की मृत्यु के बाद उन्होंने घर के एक छोटे से कमरे को ही कार्यस्थल बना लिया। कागज, गत्ता और अन्य जरूरी सामग्री स्थानीय बाजार से खरीदकर डिब्बे बनाना शुरू किया। त्योहारों और शादी-ब्याह के दौरान डिब्बों की मांग काफी बढ़ जाती है।
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-गांव की अन्य महिलाओं को भी बनाया स्वावलंबी
संवाद न्यूज एजेंसी
हमीरपुर। आज के समय में जहां युवा नौकरी की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रहे हैं वहीं जाहू खुर्द की बीना ने नौकरी न मिलने की स्थिति को अवसर में बदल दिया। घर से ही एक छोटा लेकिन सफल कारोबार खड़ा कर लिया। बीना ने मिठाई के डिब्बे बनाने का काम शुरू किया जो आज न केवल उनके लिए आय का स्रोत बन गया है बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुका है। वह हर महीने सात से आठ हजार रुपये तक की कमाई कर रही हैं।
बीना बताती हैं कि उन्होंने कई जगह नौकरी के लिए आवेदन किया लेकिन सफलता नहीं मिली। परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत नहीं थी। स्थानीय बाजार में मिठाई के डिब्बे की मांग को देखते हुए उन्होंने छोटे स्तर पर काम शुरू किया। शुरुआत में संसाधनों की कमी थी लेकिन धीरे-धीरे काम को आगे बढ़ाया।
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2024 में पति की मृत्यु के बाद उन्होंने घर के एक छोटे से कमरे को ही कार्यस्थल बना लिया। कागज, गत्ता और अन्य जरूरी सामग्री स्थानीय बाजार से खरीदकर डिब्बे बनाना शुरू किया। त्योहारों और शादी-ब्याह के दौरान डिब्बों की मांग काफी बढ़ जाती है।
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